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5 मई- परमवीर मेजर होशियार सिंह जयंती. अपना लहू बहा कर स्वतंत्र करवाया था उस बंग्लादेश को जिसके घुसपैठी आज उन्ही के देश के लिए बन गए हैं नासूर

किसी की वीरता तो किसी का विश्वासघात भी याद करें आप..

Sudarshan News
  • May 5 2020 9:14AM

जिन्ना की भक्ति में चूर वो पाकिस्तान परस्त शायद ही जानते हों इन वीरों के अतुल बलिदान को जिन्होंने जिन्ना के ही बनाए भूखंड से भारत माता को इतने घाव देने वाले पाकिस्तानी आक्रान्ताओं को धूल चटाई अपने प्राण दे कर . जिन्ना के लिए सडको पर लाठियां खाते और खुद को देशभक्त हिन्दुस्तानी बताते हुए वो तथाकथित राष्ट्र भक्त शायद ही जानते हो जिन्ना के पाकिस्तान से पराक्रम से लडे इस महायोद्धा को जिनका आज है जन्मदिवस . जिन्ना के बनाए भूखंड से अपने रक्त को बहा कर लडे उन तमाम वीरों में से एक थे मेजर होशियार सिंह जी जिनका आज जन्मदिवस है .

वीरता, त्याग, तपस्या की भावनाएं भारतभूमि की परंपरा रही हैं। भारतमाता के सपूतों के लिए वीरगति को प्राप्त होना स्वर्ग प्राप्त होने के बराबर माना गया है। इस धरती पर एक से एक वीर हुए जिन्होंने मुल्क की सरहद की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी। हमारे परमवीर चक्र विजेता स्तम्भ के अन्तर्गत हम कुछ ऐसे ही शौर्य के प्रतिमान वीर सपूतों का स्मरण कर रहे हैं। इस अंक में प्रस्तुत है परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले मेजर होशियार सिंह की वीरगाथा, जिन्होंने लड़ाई के दौरान सेना की समृद्ध परम्पराओं के अनुकूल उत्कृष्ट वीरता, असाधारण युद्ध कौशल और कुशल नेतृत्व का प्रदर्शन किया था। उन्होंने समर्पण के साथ भारतीय सेना की सेवा की। उनका प्राकृतिक कारणों से 6 दिसम्बर, 1998 को जयपुर में निधन हो गया। किन्तु उनका दाह-संस्कार उनकी इच्छानुसार हरियाणा के रोहतक जिले में किया गया।

होशियार सिंह का जन्म आज ही के दिन अर्थात 5 मई, 1936 को हरियाणा जिले के सोनीपत के सिसाना गांव में चौधरी हीरा सिंह जी के घर हुआ था। उनकी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा स्थानीय हाई स्कूल में तथा उसके बाद जाट सीनियर सेकेण्डरी स्कूल में हुई। वह एक मेधावी छात्र थे। उन्होंने मेटिकुलेशन की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी। पढ़ाई के साथ-साथ वह खेलकूद में भी आगे रहते थे। होशियार सिंह पहले राष्ट्रीय चैम्पियनशिप के लिए वॉलीबॉल की पंजाब कंबाइंड टीम के लिए चुने गए और वह टीम फिर राष्ट्रीय टीम चुन ली गई जिसके कैप्टन होशियार सिंह थे। इस टीम का एक मैच जाट रेजिमैटल सेंटर के एक उच्च अधिकारी ने देखा और होशियार सिंह उनकी नजरों में आ गए। इस तरह होशियार सिंह के फौज में आने की भूमिका बनी। 1957 में उन्होंने 2 जाट रेजिमेंट में प्रवेश लिया, बाद में वे 3 ग्रेनेडियर्स में कमीशन लेकर अफसर बन गए। 1971 के युद्ध के पहले, होशियार सिंह ने 1965 में भी पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते हुए अपना करिश्मा दिखाया था। बीकानेर सेक्टर में अपने क्षेत्र में आक्रमण पेट्रोलिंग करते हुए उन्होंने ऐसी महत्वपूर्ण सूचना लाकर सौंपी थी, जिसके कारण बटालियन की फतह आसानी से हो गई थी और इसके लिए उनका उल्लेख 'मैंशंड इस डिस्पैचेज' में हुआ था। फिर, 1971 का युद्ध तो उनके लिए निर्णायक युद्ध था जिसमें उन्हें देश का सबसे बड़ा सम्मान प्राप्त हुआ।

इस युद्ध को भारत ने कई मोर्चों पर लड़ा जिसमें एक मोर्चे पर मेजर होशियार सिंह ने भी कमान संभाली। भारत की सैन्य दक्षता तथा शौर्य के आगे पाकिस्तान को घुटने टेकने पड़े और अंतत: पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा समूचे पाकिस्तान से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बन गए, जो बांग्लादेश कहलाया। इस युद्ध में भारत ने न केवल विजय हासिल की वरन् पूर्वी पाकिस्तान के निरीह, निहत्थे नागरिकों को बर्बरता का शिकार होने से भी बचाया। अब इसी युद्ध के मोर्चे की बात करें। शकरगढ़ पठार भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण ठिकाना था। भारत अगर इस पर कब्जा जमा लेता है, तो वह एक ओर जम्मू कश्मीर तथा उत्तरी पंजाब को सुरक्षित रख सकता है, दूसरी ओर पाकिस्तान के ठीक मर्मस्थल पर प्रहार कर सकता है। इसी तरह अगर पाकिस्तान इस पर कब्जा रखे तो वह भारत के भीतर घुस सकता था। जाहिर है कि यह बेहद मौके का ठिकाना था, जिस पर दोनों ओर के सैनिकों की नजर थी। शकरगढ़ पठार का 900 किलोमीटर का वह संवदेनशील क्षेत्र पूरी तरह से प्राकृतिक बाधाओं से भरा हुआ था जिस पर दुश्मन ने टैंक भेदी बहुत सी बारूदी सुरंगें बिछाई हुई थीं। 14 दिसम्बर, 1971 को 3 ग्रेनेडियर्स के कमांडिंग ऑफिसर को सुपवाल खाई पर ब्रिगेड का हमला करने के आदेश दिए गए। इस 3 ग्रेनेडियर्स को जरवाल तथा लोहाल गांवों पर कब्जा करना था। 15 दिसम्बर, 1971 को दो कम्पनियां, जिनमें से एक का नेतृत्व मेजर होशियार सिंह संभाल रहे थे, हमले का पहला दौर लेकर आगे बढ़ीं। दोनों कम्पनियों ने अपनी फतह दुश्मन की भारी गोलाबारी, बमबारी तथा मशीनगन की बौछार के बावजूद हासिल कर ली। इन कम्पनियों ने दुश्मन के 20 जवानों को युद्ध बंदी बनाया और भारी मात्रा में हथियार और गोला बारूद अपने कब्जे में ले लिया। उन हथियारों में उन्हें मीडियम मशीनगन तथा रॉकेट लांचर्स मिले। स्वतन्त्र भारत ने अब तक पांच युद्ध लड़े जिनमें से चार में उसका सामना पाकिस्तान से हुआ। ये युद्ध शुरू भले ही पाकिस्तान ने किए हों, उनका समापन भारत ने किया और विजय का सेहरा उसी के सिर बंधा। इन चार युद्धों में एक युद्ध जो 1971 में लड़ा गया वह महत्वपूर्ण कहा जा सकता है क्योंकि इस लड़ाई ने पाकिस्तान को पराजित करके एक ऐसे नए राष्ट्र का उदय किया, जो पाकिस्तान का हिस्सा था और वर्षों से पश्चिम पाकिस्तान की फौजी सत्ता का अन्याय सह रहा था।

वही हिस्सा, पूर्वी पाकिस्तान, 1971 के युद्ध के बाद बांग्लादेश बना। अगले दिन 16 दिसम्बर, 1971 को 3 ग्रेनेडियर्स को घमासान युद्ध का सामना करना पड़ा। पाकिस्तान जवाबी हमला करके अपना गंवाया हुआ क्षेत्र वापस पाने के लिए जूझ रहा था। उसके इस हमले में उसकी ओर से गोलीबारी तथा बमबारी में कोई कमी नहीं छूट रही थी। 3 ग्रेनेडियर्स का भी मनोबल ऊंचा था। वह पाकिस्तान द्वारा किए जा रहे जवाबी हमलों को नाकाम किए जा रहे थे। 17 दिसम्बर, 1971 को सूरज की पहली किरण के पहले ही दुश्मन की एक बटालियन ने बम और गोलीबारी से मेजर होशियार सिंह की कम्पनी पर फिर हमला किया। मेजर होशियार सिंह ने इस हमले का जवाब एकदम निडर होकर दिया और वह अपने जवानों को पूरे जोश से जूझने के लिए उनका हौसला बढ़ाते रहे। हालांकि वह घायल हो गए थे, फिर भी वह एक खाई से दूसरी खाई तक जाते और अपने जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। उन्होंने खुद भी एक मीडियम मशीनगन उस समय थाम ली, जब उसका गनर वीरगति को प्राप्त हो गया। उस दिन दुश्मन देश पाकिस्तान के 89 जवान मारे गए, जिनमें उनका कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल मोहम्मद अकरम राजा भी शमिल था। 35 फ्रंटियर फोर्स राइफल्स का यह ऑफिसर अपने तीन और अधिकारियों के साथ उसी मैदान में मारा गया था। सारा दिन दुश्मन की बटालियन की फौज के बचे-कुचे सैनिक मेजर होशियार सिंह की फौज से जूझते रहे। शाम 6 बजे आदेश मिले कि 2 घण्टे बाद युद्ध विराम हो जाएगा। दोनों बटालियन इन 2 घण्टों में ज्यादा-से-ज्यादा वार करके दुश्मन को परे कर देना चाहते थे। जब युद्ध विराम का समय आया उस समय तक मेजर होशियार सिंह की 3 ग्रेनेडियर्स का एक अधिकारी तथा 32 फौजी मारे जा चुके थे। इसके अलावा 3 अधिकारी 4 जूनियर कमीशंड अधिकारी तथा 86 जवान घायल थे। मेजर होशियार सिंह दर्द से कराह रहे थे, उनका काफी रक्त बह चुका था, फिर भी वे मोर्चा छोडऩे के लिए तैयार नहीं थे। वे वहां तब तक डटे रहे जब तक कि युद्धविराम की घोषणा नहीं कर दी गई। इसी पराक्रम के कारण उस दिन हमें विजय मिली। 17 दिसम्बर, 1871 के युद्ध विराम के बाद बांग्लादेश के उदय की वार्ता शुरू हुई। आज उस पाकिस्तान निर्माता जिन्ना के भक्त शायद ही जानते हों पराक्रम की उस महान प्रतिमूर्ति को जिनके चलते राष्ट्र को इतने जांबाज़ खोने पड़े हैं ..

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