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2 जुलाई- बलिदान दिवस क्रांतिकारी असित भट्टाचार्य.. न तस्वीर सहेज पाए, न घर का पता. कुछ ऐसी थी अहिंसा की आंधी

देश के लिए चढ़ गए थे फांसी लेकिन ऐसे होंगे गुमनाम ये सोचा भी नही था..

Rahul Pandey
  • Jul 2 2020 5:46AM
अफसोस इनकी एक तस्वीर भी हम सहेज कर ना रख पाए क्योंकि उस समय तथाकथित अहिंसा का ऐसा बोलबाला था जब कोई हथियार उठाने की बात करता तो उसको क्रांतिकारी नहीं बल्कि डकैत घोषित कर दिया जाता था। चलिए वह समय तो ब्रिटिश काल था लेकिन आजादी के बाद रस्सी सहेजे जाने लगी जिससे अहिंसा के सिद्धांत को लागू करवाने वाले बड़े-बड़े लोग अपनी बकरियां बाधा करते थे। इतना ही नहीं धोती चरखा सब कुछ राष्ट्रीय धरोहर बना दिया गया पर देश के लिए अंग्रेजों से लड़ जाने वाले और हंसते-हंसते फांसी पर झूल जाने वाले क्रांतिकारी असित भट्टाचार्य की एक फोटो भी सहेज की नहीं रख पाए।

अब इन बातों से सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद सुभाष चंद्र बोस खुदीराम बोस राम प्रसाद बिस्मिल जैसे सुर वीरों ने अपने अस्तित्व की रक्षा मिलने की रही होगी । यद्यपि आजादी के बाद अहिंसा के उत्सव कथित पुजारी एक लक्ष्य पर लग गए और वह लक्ष्य था वीर सावरकर को अपमानित करना। क्रांतिकारी असित भट्टाचार्य जैसे सूर्य हीरो की एक निशानी खोजने के बजाय सावरकर के खिलाफ अपना महाअभियान आज भी आजादी के नकली ठेकेदारों और अहिंसा के तथाकथित पुजारी आज भी ज्यों का त्यों जारी रखे हुए हैं। यदि थोड़ा बहुत समय जो मिलता है उसमें संसाधनों पर पहला हक किसी वर्ग विशेष का बताया जाता है और भारत की सेना और पुलिस बल के शौर्य को कम करके उनसे उनके बहादुरी भरे कार्यों के सबूत मांगे जाते हैं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ऐसे क्रांतिकारों के कारनामों से भरा है जिन्होंने अपनी चिंगारी से युगों को रौशन किया है परंतु जिनका नाम इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया है। असित भट्टाचार्य भारत के ऐसे ही एक महान क्रांतिकारी थे। वे प्रारंभ से ही क्रांतिकारी गतिविधियों से जुडे़ हुए थे। वे क्रांति दल के सदस्य भी थे। इनके जन्म तथा जन्मस्थान के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं हो पाया है। इन्होंने अधिकांशतः खुद को अज्ञात रखने का ही प्रयास किया है। यद्यपि हमारे तथाकथित इतिहासकारों ने इनके बलिदान के बाद इन और गुमनाम कर दिया। खुद को अज्ञात रखने के पीछे इनकी मनसा ब्रिटिश पुलिस से दूर रहने और अपने क्रांतिकारी गतिविधियों के चलते अपने परिवार पर दबाव ना आने देने की थी परंतु यकीनन उन्हें यह नहीं पता होगा कि जिस राष्ट्र के लिए वह स्वयं को स्वाहा करते जा रहे हैं उस राष्ट्र के कुछ वामपंथी कलमकार उन्हें सदा के लिए गुमनाम कर देंगे।

इसी कारण इतिहास में इनके बारे में बहुत कम बातें वर्णित हैं। 13 मार्च 1933 में हबीबगंज में हुई अंग्रेजो के हिसाब से डाक डकैती और सच्चे इतिहास के रूप में देश का पैसा देशवासियों को वापस दिलाने की मनसा और उसी पैसे से क्रांतिकारियों के लिए हथियार खरीदने की सोच जिससे जबरन कब्जा जमाए लुटेरे अंग्रेजों को मारकर भगाया जा सके,  में वीर असित भट्टाचार्य ने महत्त्वपूर्ण रूप से भाग लिया। इसने देश के कुछ धन की रखवाली करते पहरेदार मार गिराए गए थे और उस धन को वापस भारत वालों का था और भारत वालों का बना दिया गया था । इसी के चलते उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और हत्या तथा डकैती के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई। 2 जुलाई 1934 में सिलहट जेल में इन्हें फांसी दे दी गई तथा इस प्रकार भारत के एक वीर सपूत के जीवन का अंत हो गया। आज भी रसिक भट्टाचार्य के बलिदान दिवस सुदर्शन परिवारों में बारंबार नमन करते हुए उनकी यशोगाथा को वामपंथी कलम कारों के तमाम साजिशों के बाद भी सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है।

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