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3 फरवरी- 1954 प्रयागराज कुम्भ भगदड़ में दिवंगत लगभग 1 हज़ार हिंदू संत व श्रद्धालुओं को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि.. तब सुरक्षा हो रही थी केवल VVIP की और शासन था जवाहरलाल नेहरु का

सुदर्शन परिवार उन सभी की आत्मा की शांति के लिए परमात्मा से प्रार्थना करता है और इस अक्षम्य अपराध के दोषियों को दुनिया के सामने लाने का वर्तमान शासन से आशा भी .

Rahul Pandey
  • Feb 3 2021 10:31AM
बहुत कम लोग ही जानते होंगे आज का इतिहास . ये वो काला दिन है जब अपनी आस्था को जीवंत रखने और देवताओं का मानवों का मिलन करने की कामना ले कर तीर्थराज प्रयागराज आये लगभग 1 हज़ार सन्त व श्रद्धालु काल के गाल में चले गये थे.. 

इस अभूतपूर्व सामूहिक मृत्यु की जिम्मेदारी तत्कालीन शासन की थी जिसके मुखिया जवाहर लाल नेहरु हुआ करते थे और सबसे खास बात ये है कि वो खुद भी जन्म से प्रयागराज के ही रहने वाले थे जिनको बचपन से ही पता था कि प्रयागराज कुम्भ की भव्यता और विशालता कितनी है. 

पर उसके बाद भी ऐसी अनहोनी किसी के भी गले नहीं उतरी ..ज्ञात हो कि वो दिन आज का थी था अर्थात ३ जनवरी और वर्ष था सन 1954 .. तीर्थराज प्रयागराज कुम्भ की तरफ पवित्र मौनी अमावस्या के दिन लगभग 5 करोड़ लोगों का हुजूम बढ़ता जा रहा था. 

उसको संभालने के लिए तैनात सुरक्षा कर्मी उस समय व्यस्त थे कांग्रेस काल के ही VVIP लोगों की सुरक्षा और सुविधा में. वो सभी VVIP अपने राजनैतिक फायदों के चलते उस समय वहां पर मौजूद थे और इसके चलते ही सुरक्षाकर्मियों का ध्यान जनता से ज्यादा उन ख़ास लोगों पर था .

फिर अचानक ही नदी के तट पर ऐसा कुछ हुआ कि भगदड़ मच गयी.. इस भगदड़ को मचाने वाले का आज तक पता नहीं चला और ये भी नहीं पता चला कि इसके लिए मुख्य जिम्मेदार कौन था . लेकिन उसके बाद महिलाओं और बच्चो को रौंदती हुई लाखों की भीड़ बेकाबू हो गयी थी. 

दुधमुहे बच्चो तक को रौंद कर जब भीड़ बदहवास हो कर बढती जा रही थी तब उनको रोकने वाला कोई भी नहीं था . अचानक ही भगवान् के भजन से गूँज रहा प्रयागराज कुम्भ क्षेत्र महिलाओं की कराह और बच्चो की चीखों से भर गया था . जब तक भीड़ थमी तब तक नीचे जमीन में लाशों का ढेर लग चुका था .

लाशो के उस ढेर में तमाम साधु, सन्त, बच्चे , कई महिलाएं , युवा और वृद्ध भी शामिल थे . तीर्थराज कुम्भ ही नहीं , अब तक किसी भी हिन्दू आस्था के केंद्र पर लाशो का ऐसा सामूहिक ढेर शायद कभी भी नहीं लगा था . निश्चित तौर पर ये सामूहिक मौतें उस समय के कांग्रेस शासित शासन की बहुत बड़ी लापरवाही थी जिस पर आज तक शायद ही किसी ने कभी माफ़ी मांगी हो या प्रायश्चित किया हो . 

यहाँ तक कि उस संख्या को तत्कालीन एकपक्षीय मीडिया के ख़ास वर्ग ने कम कर के बताने और शासकीय गुनाह छिपाने का कुत्सित प्रयास किया था जो बाद में जगजाहिर भी हो गया था .उन तमाम मृतको में से कई के परिजों को उस समय सहायता , मुआवजा या कोई अनुदान भी नहीं दिया गया था . 

कई परिवार तो ऐसे थे जो सामूहिक रूप से समाप्त हो गये थे और उनके घरों में चिराग जलाने वाले तक नहीं बचे थे . आज तीर्थराज कुम्भ के पावन अवसर पर 1954 के उन तमाम दिवंगतों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देते हुए सुदर्शन परिवार उन सभी की आत्मा की शांति के लिए परमात्मा से प्रार्थना करता है और इस अक्षम्य अपराध के दोषियों को दुनिया के सामने लाने का वर्तमान शासन से आशा भी .

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