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5 जून- पुण्यतिथि द्वितीय सर संघ चालक श्री गुरूजी गोवलकर जी.. जानिये उनके बारे में वो सब जो दिखाएगा आपको राष्ट्र-धर्म का जीवंत रास्ता

धर्म और राष्ट्र की रक्षा हेतु पूर्ण समर्पित जीवन के बारे में जानिए विस्तार से.

Sudarshan News
  • Jun 5 2020 6:16AM

जिन्हें हम सब प्रेम से  गुरूजी कहकर पुकारते हैं ऐसे महान ओजवान और राष्ट्रवादी व्यक्तित्व का जन्म 19 फरवरी, 1906 को नागपुर में अपने मामा के निवास स्थान पर हुआ था. गुरु जी के पिता श्री सदाशिव राव गोलवलकर जी प्रारम्भ में डाक-तार विभाग में कार्यरत थे परन्तु बाद में सन् 1908 में उनकी नियुक्ति शिक्षा विभाग में अध्यापक पद पर हो गयी. गुरु जी  बचपन से ही मेधावी छात्र थे.  उन्होंने अपनी समस्त परीक्षाएं सदा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं  गुरूजी  अपनी कक्षा मे हर प्रश्न का उत्तर देते थे. अतः उन पर उत्तर देने के लिए तब तक के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया जब तक कि कक्षा का कोई अन्य छात्र उन प्रश्नों का उत्तर न दे दे.

उच्च शिक्षा के लिए काशी जाने पर उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से हुआ. तदुपरांत गुरूजी  नियमित रूप से शाखा जाने लगे. जब डा. हेडगेवार काशी आये तो हेडगेवार जी के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गुरु जी का संघ के प्रति विश्वास और दृढ़ हो गया. गुरूजी उसके बाद  कुछ समय काशी में रहने के बाद  वे नागपुर कानून की परीक्षा देने के लिए आये उन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की. इस दौरान गुरूजी का सम्पर्क रामकृष्ण मिशन से हुआ और वह  बंगाल के सारगाछी आश्रम चले गए और स्वामी अखण्डानंद जी से दीक्षा ली और तत्पश्चात पूरी शक्ति से संघ कार्य में जुट गये.

पूरे देश में उनका प्रवास होने लग गया उनकी योग्यता को देखकर डा. हेडगेवार ने उन्हें 1939 में सरकार्यवाह का दायित्व दिया था.  21 जून, 1940 को डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद श्री गुरूजी सरसंघचालक बने तो उन्होंने संघ कार्य को गति प्रदान करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी. गुरूजी ने संघ को अखिल भारतीय सुदृढ़ अनुशासित संगठन का रूप दिया  पूरे देश में संघ कार्य बढ़ने लगा. जब 1947 में देश विभाजन हुआ तब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवकों की संख्या आबादी के अनुसार नाम मात्र थी. फिर भी भारत विभाजन के समय संघ के स्वयं सेवकों ने गुरु जी के नेतत्त्व में पकिस्तान के अन्दर जाकर हिन्दू भाई बहनों को वहां से लाने में अपना सहयोग दिया जिसमे ना जाने कितने स्वयं सेवकों ने अपने प्राणों का बलिदान कर माँ बहिनों की इज्जत और जान माल की रक्षा की. सिख , पंजाबी , हिन्दू सभी के साथ मिलकर स्वयं सेवक दिन रात शरणार्थी कैम्पों की रक्षा हेतु पहरा दिया करते थे .

1948 में गांधी की हत्या का आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया और गुरूजी को भी जेल में डाल दिया गया. इस आक्षेप को भी श्री गुरूजी ने झेला लेकिन वे विचलित नहीं हुए ना ही कभी हार मानी. गुरूजी का अध्ययन व चिंतन इतना सर्वश्रेष्ठ था कि वे देश भर के युवाओं के लिए ही प्रेरक पुंज नहीं बने अपितु पूरे राष्ट्र के प्रेरक पुंज व दिशा निर्देशक हो गये थे. वे युवाओं को ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रेरित करते रहते थे वे विदेशों में ज्ञान प्राप्त करने वाले युवाओं से कहा करते थे कि युवकों को विदेशों में वह ज्ञान प्राप्त करना चाहिए जिसका स्वदेश में विकास नही हुआ है वह ज्ञान सम्पादन कर उन्हें शीघ्र स्वदेश लौट आना चाहिए.

वे कहा करते थे कि युवा शक्ति अपनी क्षमता का एक एक क्षण दांव पर लगाती हैं. अतः मैं आग्रह करता हूं कि स्वयं प्रसिध्दि संपत्ति एवं अधिकार की अभिलाषा देश की वेदी पर न्योछावर कर दें | वे युवाओं से अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा करते थे वे युवाओं को विदेशी संस्कृति का अंधानुकरण न करने के लिए भी प्रेरित करते थे. श्री गुरूजी को प्रारम्भ से ही आध्यात्मिक स्वभाव होने के कारण सन्तों के श्री चरणों में बैठना, ध्यान लगाना, प्रभु स्मरण करना ,संस्कृत व अन्य ग्रन्थों का अध्ययन करने में उनकी गहरी रूचि थी.

गुरूजी धर्मग्रन्थों एवं विराट हिन्दूु दर्शन पर इतना अधिकार था कि एक बार शंकराचार्य पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया गया था जिसे उन्होंने राष्ट्र सेवा और संघ के दायित्व की वजह से सहर्ष अस्वीकार कर दिया यदि वो चाहते तो शंकराचार्य बन कर पूजे जा सकते थे किन्तु उन्होंने राष्ट्र और धर्म सेवा दोनों के लिए संघ का ही मार्ग उपयुक्त माना | श्री गुरूजी को अनेकों आध्यात्मिक विभूतियों का प्यार व सानिघ्य प्राप्त था ।

संघ कार्य करते हुए श्री गुरूजी निरंतर राष्ट्रचिंतन किया करते थे. चाहे आधी अधूरी स्वतंत्रता के बाद कश्मीर विलय का मसला हो या फिर अन्य कोई महत्वपूर्ण प्रकरण श्री गुरूजी को राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा की भारी चिंता लगी रहती थी. गुरु जी मानते थे कि भारत कर्मभूमि, धर्मभूमि और पुण्यभूमि है तथा यहां का जीवन विश्व के लिए आदर्श है. भारत राज्य नहीं राष्ट्र है राष्ट्र बनाया नहीं गया अपितु यह तो सनातन राष्ट्र ही है.

श्री गुरूजी की आध्यात्मिक शक्ति इतनी प्रबल थी कि ध्यान इत्यादि के माध्यम से उन्हें आने वाले संकटों का आभास भी हो जाता था. गुरूजी निरंतर राष्ट्र श्रध्दा के प्रतीकों का मान, रक्षण करते रहे  वे सदैव देशहित में स्वदेशी चेतना स्वदेशी व्रत स्वदेशी जीवन पध्दति, भारतीय वेशभूषा तथा सुसंस्कार की भावना का समाज के समक्ष प्रकटीकरण करते रहे. गुरूजी सदैव  अंग्रेजी तिथि के स्थान पर हिंदी तिथि के प्रयोग को स्वदेशीकरण का आवश्यक अंग मानते थे. गौरक्षा के प्रति चिंतित व क्रियाशील रहते थे.  गुरूजी की प्रेरणा से ही गोरक्षा का आंदोलन संघ ने प्रारम्भ किया था.

विश्व भर के हिंदुओं को संगठित करने के उददेश्य से विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की गयी तथा  विद्या भारती के नेतृत्व में अनेकानेक शिक्षण संस्थाओं का श्री गणेश हुआ. उनकी प्रेरणा से सम्भवतः सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ऐसा ही कोई क्षेत्र छूटा हो जहां संघ के आनुषांगिक संगठनों का प्रादुर्भाव न हुआ हो. गुरूजी अपने उदबोधनों में प्रायः यह कहा करते थे कि यदि देश के मात्र तीन प्रतिशत लोग भी समर्पित होकर देश की सेवा करें तो देश की बहुत सी समस्यायें स्वतः समाप्त हो जायेंगी. श्री गुरूजी ने लगभग 33 वर्षों तक संघ कार्य किया और पूरे देश भर में फैला दिया उनकी ख्याति पूरे देश में ही नहीं अपितु विश्व में भी फैल चुकी थी.

1970 में वे कैंसर से पीड़ित हो गये शल्य चिकित्सा से कुछ लाभ तो हुआ पर पूरी तरह नहीं , इसके बाद भी वे प्रवास करते रहे.  अपने समस्त कार्यों का सम्पादन करते हुएश्री गुरूजी ने 5 जून, 1973 को रात्रि में शरीर छोड़ दिया और माँ भारती की पुण्य भूमि के आँचल में पंचतत्व में विलीन हो गए. सुदर्शन न्यूज आज उनके निर्वाण दिवस पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राष्ट्र व धर्म हेतु उनके कार्यों के लिए उन्हें नमन करता है.

 

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1 Comments

जय श्री राम

  • Guest
  • Jun 5 2020 7:23:00:690AM

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