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अयोध्या नरसंहार ही नहीं पुलिस थानों में जन्माष्टमी कार्यक्रमों पर भी रोक लगा दी थी मुलायम सरकार ने

कृष्ण जन्माष्टमी को जितनी धूमधाम से मंदिरों में मनाया जाता है उससे कई ज्यादा धूमधाम से लोग इसे जेल में मानते हैं लेकिन सबसे बड़ी विडंबना देखिए कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस अद्भुत पर्व को थानों में मनाने तक के लिए रोक लगा दी थी।

रजत के.मिश्र, Twitter - rajatkmishra1
  • Oct 10 2022 1:52PM

इनपुट- श्वेता सिंह, लखनऊ, [email protected]

श्री कृष्ण जन्माष्टमी को जितनी धूमधाम से मंदिरों में मनाया जाता है उससे कई ज्यादा धूमधाम से लोग इसे जेल में मानते हैं लेकिन सबसे बड़ी विडंबना देखिए कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस अद्भुत पर्व को थानों में मनाने तक के लिए रोक लगा दी थी।
 
हिंदू धर्म में कई त्योहार मनाएं जाते हैं और सभी त्योहारों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी जाती है। जिसकी वजह से पुलिस के अधिकारी और कर्मचारी होली, दिपावली, दशहरा जैसे सभी त्योहार पर अपना कर्तव्य निभाते हैं और त्योहार का आनंद नहीं ले पाते। लेकिन जन्माष्टमी एक ऐसा त्योहार है जिसे देश के लगभग सभी थानों में जरुर मनाया जाता है। इस त्योहार के लिए महीनों पहले से तैयारियां होती हैं। आठवीं बार श्री कृष्ण का जन्म जेल में ही हुआ और यही वजह है कि आज भी देशभर के जेलों में इस दिन को बड़े खास तरीके से मनाया जाता है। दरअसल बताया जाता है कि उस युग में जिस तरह कारागार था अब पुलिस जेल की पहरेदारी करती है और इस दिन जन्माष्टमी मना कर सभी पुलिसवाले भगवान कृष्ण से प्राथर्ना करते हैं कि उनके साथ इस तरह कभी कोई घटना घटित न हो जाए।
 
दिवंगत मुलायम सिंह की सरकार ने उस वक्त उत्तर प्रदेश में पुलिस लाइन में होने वाले जन्माष्टमी के कार्यक्रमों पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद लोगों में काफी आक्रोश देखने को मिला था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी हाल ही में इस बात का जिक्र करते हुए पूर्ववर्ती सपा सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि सड़क पर ईद की नमाज नहीं रोक सकते तो थानों, पुलिस लाइन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने पर रोक लगाने का हक नहीं है। यदुवंशी कहलाने वालों ने थानों पर पुलिस लाइन में जन्माष्टमी के आयोजनों पर रोक लगा दी थी। श्रीकृष्ण के नाम पर एक ही तो पर्व है। आगे उन्होंने कहा था कि यह हैरानी थी कि कांवड़ यात्रा में माइक, डीजे नहीं बज सकता था। यह कांवड़ यात्रा थी, शव यात्रा नहीं, जो डमरू, ढोल और चिमटे भी नहीं बज सकते।

 

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