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4 अप्रैल- 1905 के विनाशकारी भूकम्प में दिवंगत 20 हजार हिमांचल वासियों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

जानिए हिमाचल प्रदेश के जुझारू लोगों के संघर्ष की अथक गाथा को..

Rahul Pandey
  • Apr 4 2021 2:38PM

इतिहास में घट चुकी कई घटनाएँ ऐसी हैं जिनकी कल्पना मात्र से ही किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं और बरबस ही मन से प्रार्थना निकलने लगती है की भविष्य में उन सबकी पुनरावृत्ति न हो.. लेकिन कभी कभी आपदाएं और विपदाएं भी प्रेरणा और आत्मबल का संदेश देती हैं, ऐसे में उन प्रसंगो की चर्चा समय समय पर अपरिहार्य लगती है.

देवभूमि हिमाचल प्रदेश के इतिहास में आज वो दिन है जो सम्भवतः हिमाचल ही नही बल्कि भारत के आपदा की तमाम घटनाओं में सबसे अधिक भयावह हो पर यहाँ उन जुझारू हिमाचल वासियों की भूरि भूरी प्रसंशा भी करनी होगी जिन्होंने देवभूमि को फिर से उसके असली रूप में पहुचा दिया.. 

113 साल पहले आज के दिन तबाह हुआ था ह‍िमाचल का कांगड़ा. एक ऐसी प्रारकृतिक आपदा जिसने न सिर्फ धरती हिलाई थी अपितु संसार को हिला कर रख दिया था और 20 हजार से ज्यादा लोगों ने अगली सुबह नहीं देखी . उस समय इससे करीब 20 हजार लोग काल का ग्रास बन गए थे। 

7.8 मैग्नीच्यूड के सुबह के समय आए इस भूकंप ने यहां के मुख्य शहरों सहित गांवों में भारी तबाही मचाई थी। इससे पालमपुर का बाजार भी पूरी तरह से तबाह हो गया था। अगर इतिहासकारों की लिखी किताबों को मानें तो जिला कांगड़ा का अंग्रेजों द्वारा निर्मित ट्रेजरी कार्यालय 1847 के बाद कांगड़ा में बनाया गया था। 

उस वक्त कांगड़ा में ही जिला मुख्यालय हुआ करता था। फिर अंग्रेजों ने मार्च 1855 में इसे कांगड़ा से धर्मशाला जिला मुख्यालय स्थापित कर दिया था। इतिहासकारों की मानें तो 1905 के दौरान कांगड़ा में आए भूकंप में कांगड़ा में ही स्थित तारा देवी मंदिर भी भूकंप से सुरक्षित रहा था लेकिन इस मंदिर का निर्माण कब और कैसे हुआ था इस बात का कोई भी उल्लेख कहीं भी नहीं है। 

इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर 1905 से पहले का निर्मित है।एक केंद्र कांगड़ा कुल्लू और दूसरा मसूरी-देहरादून इलाके में था। इस भूकंप से कई जगह भूस्खलन हुए, चट्टानें गिर गईं। धर्मशाला कस्बे की सारी की सारी इमारतें जमींदोज हो गई थीं।

मैक्लोडगंज और कांगड़ा में ज्यादातर इमारतें ध्वस्त गईं थीं। ब्रिटिश गजेटियर के अनुसार कुल्लू-मनाली, शिमला, सिरमौर और देहरादून तक इस भूकंप ने अपनी विनाशलीला दिखाई थी भूकंप से कांगड़ा घाटी में सड़कों से लेकर पुल भी टूट गए थे। इस कारण समय पर मदद भी उपलब्ध नहीं हो सकी थी। 

भूकंप से जिला कांगड़ा में केवल बैजनाथ का ऐतिहासिक शिव मंदिर भी बचा था। इस मंदिर को आंशिक रूप से नुकसान पहुंचा था। भूकंप से कांगड़ा के इतिहास को बताने वाला कांगड़ा का एतिहासिक किला भी पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था। साल 1905 में आए भूकंप के 2 झटकों ने ही पूरी घाटी को तहस-नहस कर दिया था। 

सडक़ें, पुल, बिजली तार व्यवस्था आदि सब कुछ छिन्न-भिन्न हो गए थे। अकेले कांगड़ा नगर में मरने वाले लोगों का आंकड़ा 10257 था। कुल 13 लाख, 51 हजार 750 रुपए की राशि सहायता के रूप में पूरे देश से एकत्रित की गई थी। लेकिन सराहना करनी होगी हिमांचल के जीवट लोगों की जिन्होंने इस आपदा के बाद भी अपना धैर्य नहीं खोया और अपने पैरों कर खड़े हो कर एक बार फिर से हिमांचल को बसाया , बनाया और फिर से सजाया.. 

एक बार फिर से हिमांचल भारत के सबसे सुन्दर प्रदेशो में शामिल हो गया जिसका श्रेय निश्चित रूप से हिमांचल प्रदेश की जीवट जनता को जाता है . आज उस प्रलय रूपी दिवस को नम आँखों से याद करते हुए सुदर्शन परिवार उस समय दिवंगत हुए उन सभी हिमांचल वासियों को अश्रुपूर्ण श्रद्दांजलि अर्पित करता है और फिर से हिमांचल को शांत और सुन्दर बनाने वाले जीवट साहसी व्यक्तियों की सराहना भी ... ईश्वर उन सभी को अपने चरणों में स्थान दें ...

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