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सुहेल देव जी के शौर्य स्थल पर बन गई है एक मजार जहाँ लगती है भीड़. गाजी मियाँ के नाम पर वहां आने वाले अधिकतर को नही पता होता राजा सुहेल देव के बारे में

दर्शन करने वालों में से अधिकतर को पता ही नहीं है कि वहां का असल इतिहास क्या है.

Sudarshan News
  • Jun 10 2020 10:44AM
ये वही जगह है जहाँ आज हर दिन कईयों की इबादतगाह का स्वरूप ले लिया है और मन्नत और दुआओं का केंद्र .. अफ़सोस कईयों को अपना इतिहास ही नहीं पता है .. उन्हें नहीं पता की हमारे पूर्वजो का गौरवशाली अतीत क्या रहा है और अपने सर को जहाँ भी पाया झुका दिया .. ये इतिहास भी उसकी एक छोटी सी कड़ी है . जिस स्थल पर वीर हिन्दू नरेश सुहेल देव जी ने सलार गाजी को मार गिराया था उसी जगह पर अब एक बहुत बड़ी मजार बन चुकी है जिसको स्थानीय ही नहीं बल्कि भारत के कई हिस्सों के हर मत मजहब के लोग पूजने आते हैं. वहां बाकायदा मेला भी लगता है और उसको दरगाह शरीफ नाम से जाना जाता है .. भारत के तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने भी इसमें बखूबी रोल निभाया और उसी जगह के नाम से मुहल्ला और यहाँ तक कि पुलिस थाने का भी नाम रख दिया. फिर धीरे धीरे सुहेल देव जी के इतिहास से दूर करने की कोशिश होने लगी और सालार गाजी को पूरे भारत में गाजी मियाँ के नाम से प्रसिद्ध कर दिया गया .. 

शुरुआत में क्षेत्रीय जनता को सच्चे इतिहास की जानकारी थी इसीलिए वो इस दिन चित्तौरा (बहराइच) में विजयोत्सव मनाने लगी.  महान हिन्दू सम्राट सुहेल देव जी की इस विजय के परिणामस्वरूप अगले 200 साल तक मुस्लिम हमलावरों का इस ओर आने का साहस नहीं हुआ. पिता और पुत्र के वध के लगभग 300 साल बाद दिल्ली के शासक फीरोज तुगलक ने बहराइच के बालार्क मंदिर व कुंड को नष्ट कर वहां मजार बना दी. अज्ञानवश हिन्दू लोग उसे सालार मसूद गाजी की दरगाह कहकर विजयोत्सव वाले दिन ही पूजने लगे, जबकि उसका वध स्थल चित्तौरा वहां से पांच कि.मी दूर है. कालान्तर में इसके साथ कई अंधविश्वास जुड़ गये. यहाँ एक बाकायदा तालाब आदि की बात कही जाने लगी जिस पर लोगों को विश्वास करवाने के सभी प्रयास किये गये. यहाँ बड़े बड़े नेताओं ने भी चादरें आदि चढानी शुरू कर दी और बाद में ये जगह लोगों की आस्था का केंद दरगाह शरीफ के नाम से बनती चली गई. यद्दपि यहाँ आने वालों में बहुत कम लोगों को ही यहाँ का इतिहास पता है..

धीरे धीरे वह कथित चमत्कारी तालाब तो नष्ट हो गया था; पर एक छोटे पोखर में ही लोग चर्म रोगों से मुक्ति के लिए डुबकी लगाने लगे. ऐसे ही अंधों को आंख और निःसंतानों को संतान मिलने की बातें होने लगीं. माना जा रहा है कि ऐसे लोगों को ही समझाने के लिए और इस प्रकार की हरकतों को देख कर ही तुलसी बाबा ने कहा था – लही आंख कब आंधरो, बांझ पूत कब जाय कब कोढ़ी काया लही, जग बहराइच जाय. कालान्तर में राजा सुहेल देव के नाम से राजनैतिक दल बन गये. उनके विजय स्थल से लगभग 200 किलोमीटर दूर उन्हें बहुत संक्षिप्त रूप में स्थापित किया गया . उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राजा सुहेलदेव की वीर वेष में घोड़े पर सवार मनमोहक प्रतिमा स्थापित है. आज महाराजा सुहेलदेव जी के उस विजयोतसव पर तमाम धर्मनिष्ठ जनता को शुभकामाएं देते हुए इस पावन दिन के असल स्वरूप को सुदर्शन परिवार ने सबके आगे रखा है . 

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1 Comments

I'm Bahraich sir thanks this matter sir AAP Hindu Ko jagoge sir

  • Guest
  • Jun 10 2020 12:54:34:563PM

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