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5 सितम्बर- इस्लामिक आतंकियों से 400 प्राणों को बचा खुद के प्राण गंवा गयी नीरजा बलिदान दिवस. तब नारीशक्ति को महाशक्ति अमेरिका ने भी जोड़े थे हाथ

बचपन से ही इस बच्ची को वायुयान में बैठने और आकाश में उड़ने की प्रबल इच्छा थी।नीरजा ने अपनी वो इच्छा एयर लाइन्स पैन एम ज्वाइन करके पूरी की।

Rahul Pandey
  • Sep 5 2020 11:15AM
अक्सर प्रचार स्वरूप भले ही किसी को भारत की सबसे ताकतवर महिला का ख़िताब आज़ादी के बाद दिया जाता हो पर बिना प्रचार के ही नीरजा जो कर गयी वो भी विदेशी जमीन पर वो अपने आप में ही एक इतिहास बन गया और बिना शक के कहा जा सकता है कि वो शौर्य अब शायद ही कहीं देखने या सुनने को मिले .

5 सितम्बर 1986 को आधुनिक भारत की एक वीरांगना जिसने इस्लामिक आतंकियों से लगभग 400 यात्रियों की जान बचाते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया। आइये हम बताते हैं इस महान वीरांगना के बारे में। 7 सितम्बर 1964 को चंडीगढ़ के हरीश भनोत जी के यहाँ जब एक बच्ची का जन्म हुआ था तो किसी ने भी नहीं सोचा था कि भारत का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान इस बच्ची को मिलेगा। 

बचपन से ही इस बच्ची को वायुयान में बैठने और आकाश में उड़ने की प्रबल इच्छा थी।नीरजा ने अपनी वो इच्छा एयर लाइन्स पैन एम ज्वाइन करके पूरी की। 16 जनवरी 1986 को नीरजा को आकाश छूने वाली इच्छा को वास्तव में पंख लग गये थे। नीरजा पैन एम एयरलाईन में बतौर एयर होस्टेस का काम करने लगी। 5 सितम्बर 1986 की वो घड़ी आ गयी थी जहाँ नीरजा के जीवन की असली परीक्षा की बारी थी। 

पैन एम 73 विमान करांची, पाकिस्तान के एयरपोर्ट पर अपने पायलेट का इंतजार कर रहा था। विमान में लगभग 400 यात्री बैठे हुये थे। अचानक 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले कर अपहरण कर लिया .. असल में ये वही आतंकी थे जिन्हें पाकिस्तान सरकार ने अपने देश की आतंक के लिये उपजाऊ जमीन में पाला पोशा था जबकि ये असल में लीबिया के इस्लामिक आतंकी थे जिन्हें शायद पाकिस्तान भारत के खिलाफ उपयोग करना चाहता था पर ये अंत में पाकिस्तान सरकार के लिए ही भस्मासुर बन गए.

पाकिस्तानी सरकार ने आतंकियों की किसी भी शर्त को मानने से मना कर दिया जिसमे उनकी पहली शर्त थी विमान में पायलट भेज कर लीबिया भेजने की. तब आतंकियों ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को बुलाया कि वो सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करें ताकि वो किसी अमेरिकन नागरिक को मारकर पाकिस्तान पर अपनी शर्त को मनवाने का दबाव बना सके। 

नीरजा ने सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित किए और विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी आतंकियों को सौंप दिये।उसके बाद आतंकियों ने एक ब्रिटिश को विमान के गेट पर लाकर पाकिस्तान सरकार को धमकी दी कि यदि पायलट नहीं भेजा तो वह उसको मार देंगे। किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से बात करके उस ब्रिटिश नागरिक को भी बचा लिया। 

धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गए। पाकिस्तान सरकार और आतंकियों के बीच बात का कोई नतीजा नहीं निकला। अचानक नीरजा को ध्यान आया कि काफी समय से स्टार्ट प्लेन में ईंधन किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद पूरे विमान में अंधेरा हो जायेगा जबकि पहले से ही रात थी वहां . 

जल्दी उसने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना बांटने के लिए कहा और साथ ही विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा। नीरजा को पता लग चुका था कि आतंकवादी सभी यात्रियों को मारने की सोच चुके हैं। उसने सर्वप्रथम खाने के पैकेट आतंकियों को ही दिए क्योंकि उसका सोचना था कि भूख से पेट भरने के बाद शायद वो शांत दिमाग से बात करें। 

इसी बीच सभी यात्रियों ने आपातकालीन द्वारों की पहचान कर ली। नीरजा ने जैसा सोचा था वही हुआ। प्लेन का फ्यूल समाप्त हो गया और चारों ओर अंधेरा छा गया। नीरजा तो इसी समय का इंतजार कर रही थी। तुरन्त उसने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये। योजना के अनुरूप ही यात्री तुरन्त उन द्वारों से नीचे कूदने लगे। वहीं आतंकियों ने भी अंधेरे में फायरिंग शुरू कर दी।

किन्तु नीरजा ने अपने साहस से लगभग सभी यात्रियों को बचा लिया था। कुछ घायल अवश्य हो गये थे किन्तु ठीक थे | अब विमान से भागने की बारी नीरजा की थी, किन्तु तभी उसे बच्चों के रोने की आवाज़ सुनाई दी। इधर नीरजा उन तीन बच्चों को खोज चुकी थी और उन्हें लेकर विमान के आपातकालीन द्वार की ओर बढ़ने लगी। 

अचानक नीरजा के आगे एक आतंकवादी आ खड़ा हुआ। नीरजा ने बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल दिया और स्वयं उस आतंकी से भिड़ गई। कहां वो दुर्दांत इस्लामिक आतंकवादी और कहाँ वो 23 वर्ष की पतली-दुबली लड़की। आतंकी ने कई गोलियां उसके सीने में उतार डाली। नीरजा ने अपना बलिदान दे दिया। 

नीरजा भी अगर चाहती तो वो आपातकालीन द्वार से सबसे पहले भाग सकती थी। किन्तु वो भारत माता की सच्ची बेटी थी। उसने सबसे पहले सारा विमान खाली कराया और स्वयं को उन दुर्दांत राक्षसों के हाथों सौंप दिया। 17 घंटे तक चले इस अपहरण की त्रासदी ख़ून ख़राबे के साथ ख़त्म हुई थी जिसमें 20 लोग मारे गए थे.

मारे गए लोगों में से 13 भारतीय थे. शेष अमरीका और मैक्सिको के नागरिक थे. इस घटनाक्रम में सौ से अधिक भारतीय घायल हुए थे, जिनमें से कई गंभीर रूप से घायल थे. भारतीय पीड़ितों की ओर से 178 लोगों ने ओबामा को लिखे पत्र में लिखा है कि वर्ष 2004 में इस बात का पता चला कि पैन एम 73 के अपहरण के पीछे लीबिया के चरमपंथियों का हाथ है.

इसके बाद वर्ष 2006 में उन्होंने मुआवज़े के लिए अमरीकी अदालत में एक मुक़दमा दर्ज किया था. नीरजा के बलिदान के बाद भारत सरकार ने नीरजा को सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र प्रदान किया . पाकिस्तान की आतंक के लिए उपजाऊ जमीन पर नीरजा ने हिन्दुस्तानी प्रतिकार का जो स्वरूप दिखाया उसे युगों युगों तक याद रखा जाएगा .. 

आज उस शक्ति स्वरूपा को उनके बलिदान दिवस पर सुदर्शन परिवार सादर व् बारम्बार नमन करता है और नकली प्रचार की इस आंधी में ऐसी वीरांगनाओं के वास्तविक इतिहास को समय समय पर संसार के सामने लाने का अपना संकल्प भी दोहराता है .

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2 Comments

Sahibaat

  • Guest
  • Sep 23 2020 4:58:44:340PM

Aise balidani logon ke bare me koi rabish prasunji abhsaar brasant.yogesndra Yadav Kabhi baat bhi Nahi karte..wa mere desh ke budhijiviyon va

  • Guest
  • Sep 5 2020 4:04:48:347PM

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