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25 जनवरी- “तालीकोटा युद्ध” में हिन्दू सम्राट रामराय का सिर काट कर आदिलशाह ने खत्म कर दिया विजयनगर साम्राज्य. गद्दारी थी “गिलानी भाईयों” की जिन्हें पाला था उन्होंने बच्चे की तरह

आज अधर्मियों के विरुद्ध वीरता से लड़ कर अमरता को प्राप्त हुए उन सभी वीर बलिदानियों को सुदर्शन परिवार बारंबार नमन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है.

Sudarshan News
  • Jan 25 2021 12:45PM
ये अतिजरूरी इतिहास शायद ही आपने पढ़ा हो.. ढंग से लिखा ही नही गया क्योंकि इसमें बेरहमी से हत्या थी एक हिन्दू सम्राट की और हत्यारा था एक धर्मपरिवर्तित मुस्लिम शासक को अपने मूल नाम से बदल कर बाद में बन चुका था अली आदिलशाह…

ये कहानी है दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य की जो हिंदुओं का ऐसा अभेद्य गढ़ था जिसमें हमलावर घुसने की सोच भी नही सकता था .  खास तौर पर मुगल लुटेरे जो लगभग 300 वर्ष तक इस ससाम्राज्य के बगल भी नही फटक पाए थे..

ये वही साम्राज्य था जिसको कभी अथक परिश्रम से खड़ा किया था राजा कृष्णदेवराय जी ने जिनका नाम आपने जरूर सुना होगा .. उनकी हिंदुत्व की छवि व उनके साम्राज्य की मजबूती से हमलावर आक्रांताओं को इतनी चिढ़ थी कि उनके कई पीढ़ी बाद जब आदिलशाह इस नगर को जीतने में सफल हुआ तब उसने सबसे पहले उन्ही के वंशज राजा रामराय का सिर काट कर अपने सैनिको को दिया.. 

ये वही घटना के समान थी जब भारत के वीर सैनिक हेमराज का सिर काट कर पाकिस्तानी अपने देश ले गए थे और वहां उसको फुटबॉल बना कर खेला भी गया था ..  आदिलशाह की रामराय पर जीत उसकी वीरता नहीं बल्कि रामराय के साथ हुई गद्दारी के चलते हो पाई .. 

रामराय ने जिन गिलानी भाईयों को अपनी औलादों की तरफ पाल कर सभी सुख सुविधाएं दी थीं, वही मिल गए थे बाद में आदिलशाह से और बाद में उन्ही की गद्दारी कारण बनी पूरे दक्षिण भारत से हिन्दूओ के सबसे बड़े व वैभवशाली साम्राज्य के पतन का ..

यहां एक और बात थी जो महत्वपूर्ण है .. इस युद्ध अर्थात तालीकोटा की लड़ाई के समय छोटी छोटी हिन्दू रियासतें बिखरी हुई थीं लेकिन उन पर हमला करने वाले आदिलशाह के साथ उसकी विचारधारा के लोग खुल कर खड़े थे.. इसी वजह से आगे चल कर वो सभी रियासतें भी एक एक कर के खत्म हो गईं और वो सभी सल्तनतों में बदल गयी..

इस हार के बाद विजयनगर साम्राज्य का जो बुरा हाल हुआ वो लिखा भी नही जा सकता .. दुधमुहे बच्चो को पटक कर मार डाला गया, औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार किये गए और नगर को शंशब जैसा बना डाला गया जहां शोर सिर्फ लोगों के चीखने का सुनाई दे रहा था . 

इस नगर के लोग अपनी सेना पर इतना विश्वास करते थे कि हार के समाचार पर इन्हें विश्वास भी नही हुआ था लेकिन जब उन्हें उनके राजा का कटा सिर दिखाया गया तब वो सब टूट गए..उन्हें विश्वास भी नही हो रहा था कि उनके राजा की हत्या, उनके नगर की लूट, उनके बच्चों का नरसंहार उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार उन गिलानी भाईयों के चलते हो रहा था जिन्हें उन लोगों ने कई अन्य मुस्लिमो के साथ अपने बच्चो की तरह पाला था.. 

तालीकोटा का युद्ध आज के ही दिन अर्थात 25 जनवरी 1565 ई. को लड़ा गया था. विजयनगर साम्राज्य एवं दक्षिण के राज्यों के बीच हुए इस युद्ध के कारण ही विजयनगर साम्राज्य का पतन हो गया था.इस युद्ध को ‘राक्षसी तंगड़ी का युद्ध’ और बन्नीहट्टी का युद्ध  के नाम से भी जाना जाता है.  

भारतीय इतिहास का यह सबसे विनाशकारी युद्ध बताया गया है. एक बूढ़ा राजा जिसने मरने से पहले अपने महल को मुस्लिम शासक को नहीं सौपा था. यही वजह इस राजा की मौत का कारण बनी और बाद में विजय नगर साम्राज्य को बर्बरता पूर्वक लूट लिया गया था.

राजा रामराय की सेना में दो लाख सिपाही थे. 300 साल तक कोई भी मुस्लिम शासक विजय नगर पर हमला करने की हिम्मत नहीं दिखा पाया था. राजा रामराय की उम्र 70 के पास पहुँच गयी थी. इनकी दयालुता की खबरें दूर-दूर तक फैली हुई थीं. 

ऐसी ही एक कहानी के बारें में बताया जाता है कि राजा ने दो अनाथ मुस्लिम बच्चों को पाला था. उनको अपने बेटे की तरह पढ़ाया था. सबसे बड़ी बात यह थी कि इन्होनें इन बच्चों के लिए घर के आँगन में ही मस्जिद का भी निर्माण करवाया था. ताकि यह बच्चे अपने धर्म को समझ और अपना सकें.

दक्षिण भारत के कुछ बुजुर्गों द्वारा बताया जाता रहा कि जिहाद के नारे के साथ कुछ मुस्लिम राज्यों ने विजय नगर पर हमला कर दिया था. हमला करने वाले राज्यों में अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा और बीदर शामिल थे. इन मुस्लिम राज्यों के सम्मिलित आक्रमण के बावजूद विजयनगर युद्ध जीत चुका था. 

लेकिन अंतिम समय पर राजा रामराय के गोद लिये दोनो लड़कों ने रामराय पर पीछे से वार कर दिया और इनका कत्ल कर दिया था. ये ही दोनों गिलानी भाई थे.. तालीकोटा की लड़ाई के पश्चात् दक्षिण भारतीय राजनीति में विजयनगर राज्य की प्रमुखता समाप्त हो गयी.

विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 सीई में भारत के इतिहास में एक अशांत अवधि के दौरान हुई थी, और अंत में यह पूरे दक्षिण भारत को शामिल करने के लिए बढ़ी। यह 1336 में हरिहर प्रथम और संगमा राजवंश के उनके भाई बुक्का राय प्रथम द्वारा स्थापित किया गया था। अन्य तीन सालुवा, तुलुवा और अरविदु थे। 

साम्राज्य 13 वीं शताब्दी के अंत तक इस्लामिक हमलों को रोकने के लिए दक्षिणी शक्तियों के प्रयासों की समाप्ति के रूप में प्रमुखता के रूप में उभरा। 1529 में कृष्णदेवाराय की मृत्यु के बाद, उनके छोटे भाई अच्युत राय ने उनका उत्तराधिकारी बना लिया। 

यद्यपि उनका शासन कृष्णदेवराय के अधीनता के समय की तरह गौरवशाली नहीं था, लेकिन साम्राज्य को दक्कन सल्तनत से किसी भी खतरे का सामना नहीं करना पड़ा। अच्युत राय का उत्तराधिकारी वेंकट राय था, जिसे जल्द ही मारा गया था। 

सदाशिवा राय 1542 में वेंकट राय उनके उत्तराधिकारी बन गए। हालांकि, असली शक्ति उनके मंत्री राम राय के हाथों में थी, जिन्होंने साम्राज्य की महिमा बहाल की, जो कृष्णदेवाराय के बाद कम हो गई थी। 25 जनवरी 1565 को, सेनाओं ने रक्षसी और तंगाडी के गांवों के पास मैदानी इलाकों पर संघर्ष किया। 

वेंकटरात्री के तहत विजयनगर पैदल सेना ने बरिद शाह के विभाजन के माध्यम से उन्हें नष्ट कर दिया। हमला इतना जोरदार था कि ऐसा लगता था कि विजयनगर विजय की उम्मीद थी.  सुल्तानों ने मुस्लिम जनरलों के साथ विजयनगर साम्राज्य के गिलानी ब्रदर्स के साथ सौदा किया था। 

इस बिंदु पर सुल्तानों ने एक विध्वंसक हमले शुरू करने के लिए गिलानी ब्रदर्स से संकेत दिया। लगभग 140,000  आदिलशाह के सैनिकों ने विजयनगर सेना पर जोरदार पिछला हमला किया गया था। लगता है कि यह लड़ाई दक्कन सल्तनत की तोपखाने और सत्तारूढ़ मंत्री राम राय के कब्जे और निष्पादन द्वारा तय की गई थी। 

युद्ध में एक महत्वपूर्ण बिंदु पर विजयनगर सेना के दो मुस्लिम कमांडरों (गिलानी ब्रदर्स) द्वारा विश्वासघात हार का मुख्य कारण था। राम राय को कैदी बना लिया गया था और आदिल शाह के सामने पेश किया गया था। राम राय को जल्द ही मौत की सजा दी गयी और उनका सिर सैनिकों को प्रदर्शित किया गया।

राजधानी शहर हम्पी के लोगों को खबर मिली कि राम राय की हत्या हुई थी और सेना ने युद्ध हार गयी थी। लेकिन उनको इस खबर पर विश्वास नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने कभी ऐसा परिदृश्य नहीं देखा था और न ही विजयनगर की खबर पिछले 200 सालों से युद्ध में हार गई थी। 

आदिलशाह के सैनिकों ने राजधानी के बाहर तीन दिनों तक इंतजार किया और विश्राम किया। उन तीन दिनों के दौरान शहर में चोरी और ड़कैती का परिदृश्य था। तीन दिनों के बाद आदिलशाह के सैनिकों ने शहर में प्रवेश किया। उन्हें रोकने के लिए कोई नहीं था। उन्होंने लूट लिया, डाका डाला गया और शहर को नष्ट कर दिया। 

पुरुष, महिलाएं और बच्चे मारे गए थे। दुकानें, मंदिर और घर जला दिए गए और हिंदू मंदिर नष्ट हो गए। आदिलशाह की सेना द्वारा हम्पी को लूटना छह महीने तक चलाया गया था, जिसके बाद आदिलशाह ने शहर में आग लगा दी थी। आज उस युद्ध को याद करने का दिवस है.

आज अधर्मियों के विरुद्ध वीरता से लड़ कर अमरता को प्राप्त हुए उन सभी वीर बलिदानियों को सुदर्शन परिवार बारंबार नमन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेते हुए गिलानी बंधुओ की नीचता को भी सदा समान रूप से बताने और हिन्दू समाज को सतर्क करने का संकल्प लेता है. 

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