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2 अक्टूबर-: दृढ़ता और सादगी के प्रतीक राष्ट्रपुत्र लाल बहादुर शास्त्री जी की जन्मजयंती पर बारम्बार नमन. जय जवान जय किसान

राष्ट्र आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, सादगी और दृढ़ता के प्रतीक लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती मना धूमधाम से रहा है.

Rahul Pandey
  • Oct 2 2020 12:02PM
राष्ट्र आज भारत के दूसरे प्रधानमंत्री, सादगी और दृढ़ता के प्रतीक लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती मना धूमधाम से रहा है. देश के लिए निष्कलंक जीवन जीने वाले इस महापुरुष के कार्यो से आज भी सर नतमस्तक हो जाता है . बेहद सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले शास्त्री जी एक शांत चित्त व्यक्तित्व भी थे. 

शास्त्री जी का जन्म उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में 2 अक्टूबर 1904 को मुंशी लाल बहादुर शास्त्री के रूप में हुआ था. वह अपने घर में सबसे छोटे थे तो उन्हें प्यार से नन्हें बुलाया जाता था. उनकी माता का नाम राम दुलारी था और पिता का नाम मुंशी प्रसाद श्रीवास्तव था. शास्त्री जी की पत्नी का नाम ललिता देवी था.

बनारस के हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान उन्होंने साइंस प्रैक्टिकल में इस्तेमाल होने वाले बीकर को तोड़ दिया था. स्कूल के चपरासी देवीलाल ने उनको देख लिया और उन्‍हें जोरदार थप्पड़ मार दिया. रेल मंत्री बनने के बाद 1954 में एक कार्यक्रम में भाग लेने आए शास्त्री जब मंच पर थे, तो देवीलाल उनको देखते ही हट गए. 

शास्त्री ने भी उन्हें पहचान लिया और देवीलाल को मंच पर बुलाकर गले लगा लिया था . ये उनकी महानता का ऐसा परिचायक था जो आज भी शायद किसी में देखने को नहीं मिलता. 10 जनवरी 1966 की उस सुबह ‘ताशकंद’ में ठंडक कुछ ज्यादा ही थी. यूं भी कह सकते हैं कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल को ऐसी ठंडक झेलने की आदत नहीं थी, इसलिये उनकी दुश्वारी कुछ ज्यादा ही थी. मुलाकात का वक्त पहले से तय था. 

शास्त्री जी और अयूब खान तय वक्त पर मिले. बातचीत काफी लंबी चली और दोनों देशों के बीच शांति समझौता भी हो गया. ऐसे में दोनों मुल्कों के शीर्ष नेताओं और प्रतिनिधिमंडल में शामिल अधिकारियों का खु़श होना लाजिमी था, लेकिन वह रात भारत पर भारी पड़ी.

10-11 जनवरी की दरम्यानी रात प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध परिस्थितों में मौत हो गई. यद्दपि उनकी असमयिक मृत्यु आज भी देश के लिए रहस्य है लेकिन उनके सुकर्मो की गूँज उभरते भारत की नीव में रहेगी .. आज उनकी जयंती पर उन्हें बारम्बार नमन करते हुए उनके यशगान को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प सुदर्शन परिवार लेता है.

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