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19 अक्टूबर:- जन्मजयंती वीरांगना मातंगिनी हाजरा जी.. जिन्होंने तीन गोलियां लगने के बाद भी वंदेमातरम बोलते हुए ली थी अंतिम सांस

अगर आप मातंगिनी हाजरा जैसी भारत की वीरांगनाओं के शौर्य की गाथा सुनोगे तो शायद आपको “दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल” वाले गीत को गाते हुए एक बार को तो शर्मिंदगी महसूस हो ही जायेगी.

Rahul Pandey
  • Oct 19 2020 9:52AM
अगर आप मातंगिनी हाजरा जैसी भारत की वीरांगनाओं के शौर्य की गाथा सुनोगे तो शायद आपको “दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल” वाले गीत को गाते हुए एक बार को तो शर्मिंदगी महसूस हो ही जायेगी. भारत की वीरांगना मातंगिनी हाजरा का देश के त्याग, शौर्य तथा बलिदान आपको ये बात बताने के लिए काफी है कि देश को आजादी बिना खड़ग या बिना ढाल के नहीं मिली है.

बल्कि इस आजादी के लिए अनगिनत युवा, बच्चे, बुजर्ग तथा महिलाओं तक ने अपना सर्वस्व समर्पित किया है, अपने अपने प्राणों का बलिदान दिया है. मातंगिनी हाजरा भारत की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछाबर करने वालीं वो वीरांगना हैं जिन्होंने  71 वर्ष की आयु में जल्लाद अंग्रेजों की गोलियां अपने सीने पर झेलीं थीं. 

इसके बाद भी उन्होंने तिरंगे को हाथ से गिरने नहीं दिया तथा वन्देमातरम कहते हुए अपने अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था. एक गोली उनके बायें हाथ में लगी. उन्होंने तिरंगे झण्डे को गिरने से पहले ही दूसरे हाथ में ले लिया. तभी दूसरी गोली उनके दाहिने हाथ में और तीसरी उनके माथे पर लगी.

मातंगिनी हाजरा गिर पडीं लेकिन तिरंगे को हाथ से नहीं गिरने दिया. तीन गोलियां लगने के बाद भी वन्दे मातरम का उद्घोष करती रहीं तथा आख़िरी सांस ली. मातंगिनी का जन्म 19 अक्टूबर 1870 में ग्राम होगला, जिला मिदनापुर, पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में एक अत्यन्त निर्धन परिवार में हुआ था. 

गरीबी के कारण 12 वर्ष की अवस्था में ही उनका विवाह ग्राम अलीनान के 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया; पर दुर्भाग्य उनके पीछे पड़ा था. छह वर्ष बाद वह निःसन्तान विधवा हो गयीं. पति की पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र उससे बहुत घृणा करता था. 

अतः मातंगिनी अपने मायके आकर एक अलग झोपड़ी में रहकर मजदूरी से जीवनयापन करने लगी. गाँव वालों के दुःख-सुख में सदा सहभागी रहने के कारण वे पूरे गाँव में माँ के समान पूज्य हो गयीं.हमेशा से ही स्वतंत्रता सैनानियों के बारे में सुनने-जानने में दिलचस्पी रखने वाली मातंगिनी कब एक सेनानी बन गई.

शायद उन्हें खुद भी पता नहीं चला. लेकिन साल 1905 से उन्होंने सामने स्वतंत्रता के आंदोलनों में भाग लेना शुरू किया. वह लगातार आजादी की अलख जगाती रहीं. उनके जीवन का महत्वपूर्ण पल आया 1932 में जब देश भर में स्वाधीनता आन्दोलन चला. वन्देमातरम् का घोष करते हुए जुलूस प्रतिदिन निकलते थे. 

जब ऐसा एक जुलूस मातंगिनी के घर के पास से निकला, तो उसने बंगाली परम्परा के अनुसार शंख ध्वनि से उसका स्वागत किया और जुलूस के साथ चल दी. तामलुक के कृष्णगंज बाजार में पहुँचकर एक सभा हुई. वहाँ मातंगिनी ने सबके साथ स्वाधीनता संग्राम में तन, मन, धन पूर्वक संघर्ष करने की शपथ ली.

उसी साल, मातंगिनी ने अलीनान नमक केंद्र पर नमक बनाकर, ब्रिटिश सरकार के नमक कानून की अवहेलना की। इसके लिए उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार किया तथा जेल में डाल दिया. उस समय उनकी उम्र 62 साल थी. जेल से रिहाई के बाद भी मातंगिनी अपने लक्ष्य पर डटी रहीं. 

उन्होंने एक पल के लिए भी स्वतंत्रता संग्राम को छोड़ने के बारे में नहीं सोचा. इतना ही नहीं, साल 1933 में जब सेरमपुर (इसे श्रीरामपुर भी कहा जाता है) में कांग्रेस के अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार ने लाठीचार्ज किया तो उन्हें काफ़ी चोटें भी आयीं. उस उम्र में भी, अपने दर्द को सहते हुए उन्होंने हमेशा भारत के बारे में ही सोचा.

17 जनवरी, 1933 को ‘कर बन्दी आन्दोलन’ को दबाने के लिए तत्कालीन गर्वनर एण्डरसन तामलुक आया, तो उसके विरोध में प्रदर्शन हुआ. वीरांगना मातंगिनी हाजरा सबसे आगे काला झण्डा लिये डटी थीं. वह ब्रिटिश शासन के विरोध में नारे लगाते हुई दरबार तक पहुँच गयीं. 

इस पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और छह माह का सश्रम कारावास देकर मुर्शिदाबाद जेल में बन्द कर दिया. इन कारावास और जेल की यातनाओं ने मातंगिनी के इरादों को और मजबूत किया.साल 1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ तो मातंगिनी इस आंदोलन की मुख्य महिला सेनानियों में से एक बनकर उभरीं. 

8 सितम्बर को तामलुक में हुए एक प्रदर्शन में पुलिस की गोली से तीन स्वाधीनता सेनानी मारे गये. लोगों ने इसके विरोध में 29 सितम्बर को और भी बड़ी रैली निकालने का निश्चय किया. 29 सितंबर 1942 को मातंगिनी ने 6,000 लोगों की एक रैली का नेतृत्व किया और तामलुक पुलिस चौकी को घेरने के लिए निकल पड़ीं. 

लेकिन जैसे ही वे लोग सरकारी डाक बंगला पहुंचे तो पुलिस ने इन क्रांतिकारियों को रोकने के लिए दमनकारी नीति शुरू कर दीं. ब्रिटिश पुलिस अफ़सरों ने निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाना शुरू कर दिया. मातंगिनी एक चबूतरे पर खड़े होकर, अपने हाथ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का झंडा लेकर नारे लगवा रही थीं, जब उनके बाएं हाथ में गोली लगी. 

फिर भी वह रुकी नहीं, बल्कि पुलिस स्टेशन की तरफ आगे बढ़ने लगीं. उन्हें बढ़ता देखकर, पुलिस ने और गोलियाँ उन पर चलाई, जिनमें से एक उनके दूसरे हाथ में लगी और एक उनके सिर में. इसके बाद मातंगिनी जमीन पर गिर पडीं. उस समय उनकी आयु 71 वर्ष थी. 

अपने आख़िरी पलों में भी देश की इस महान वीरांगना ने तिरंगे को गिरने नहीं दिया और वन्दे मातरम का उद्घोष करते हुए भारत को आजादी के यज्ञ कुंड में अपने प्राणों की आहुति दे दी.ऐसी वीरांगना के चरणों में आज उनकी जन्मजयंती पर सुदर्शन न्यूज बारम्बार नमन और वंदन करता है साथ ही उनके बलिदान की गौरव गाथा को दुनिया के आगे समय समय पर लाने के संकल्प को भी दोहराता है .

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2 Comments

shat shat vandan naman hai aise veeron ki aatma ko VANDE-MAATRAM

  • Guest
  • Oct 24 2020 1:40:06:557PM

shat shat vandan naman hai aise veeron ki aatma ko

  • Guest
  • Oct 24 2020 1:38:22:247PM

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