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न्यायपालिका के 'अ न्याय' के 33 साल...1988 में हुआ गैंगरेप, 2021 में मिली सजा..

ये खबर आपको झकझोर कर रख देगी, ये खबर आपको ये सोचने के लिए मजबूर कर देगी कि जिस न्यायालय से हम न्याय की उम्मीद करते है उसकी पूरी व्यवस्था कितनी धीमी है। यह घटना यूपी के श्रावस्ती जनपद की है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट

रजत के.मिश्र , Twitter - rajatkmishra1
  • May 14 2021 7:18AM

ये खबर आपको झकझोर कर रख देगी, ये खबर आपको ये सोचने के लिए मजबूर कर देगी कि जिस न्यायालय से हम न्याय की उम्मीद करते है उसकी पूरी व्यवस्था कितनी धीमी है। यह घटना यूपी के श्रावस्ती जनपद की है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट और सोचिए कि कई मामलों में दूसरी संस्थाओं के अधिकार का अतिक्रमण करने वाली न्याययिक व्यवस्था अपने कार्य क्षेत्र में कितनी धीमी है। 33 वर्ष से सामाजिक तिरस्कार झेलने वाली लड़की क्या इसको न्याय माने, क्या किसी न्यायाधीश की परिवार के किसी सदस्य के साथ इतना घिनौना अपराध होता ऐसा तब भी कोर्ट 33 साल लगाता?

वो बारह वर्ष की हंसती खेलती छोटी सी बच्ची थी जब उसके ननिहाल में उसे जीवन भर का दर्द मिल गया। परिवार कोर्ट पहुंचा तो मिली तो सिर्फ तारीख पर तारीख और ऐसा करते करते 33 साल बीत गए। तब तक पांच आरोपियों में से चार की मौत मुकदमे के दौरान हो गई। अपने घर की किलकारी के आंसुओ के लिए न्याय की आस लगाए परिवार को क्या पता था कि ये लड़ाई लड़ते लड़ते उम्र का एक पड़ाव पार करना पड़ जायेगा क्योंकि न्याय का मंदिर तो अपने कार्यों से इतर अन्य मामलों पर स्वत: संज्ञान लेने में व्यस्त था।

पहले जानिए क्या था पूरा मामला-

घटना 30 जून 1988 यानी कि करीब 33 वर्ष पूर्व भिनगा कोतवाली के ग्राम लोनियन पुरवा दाखिला लालपुर महरी में घटी थी। यहां एक महिला अपने मायके में आई हुई थी। उसके साथ उसकी बारह वर्षीय पुत्री भी थी। घटना की रात आरोपी फूलमता व उसकी पुत्री रामावती नाबालिग को बहला फुसला कर भगा ले गई। इसके बाद नाबालिग बालिका के साथ मक्कू उर्फ जगदीश, पूसू व लहरी ने बलात्कार किया। घटना की शिकायत पीड़िता की मां ने कोतवाली भिनगा में की। मामले में पुलिस ने सभी पांचों आरोपियों के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल किया। जिसकी सुनवाई तभी से लगातार न्यायालय में चल रही थी। 

अब आखिर इस न्याय का क्या औचित्य-

वर्तमान समय में पीड़िता भले ही विवाह करके जीवन में आगे बढ़ गई है लेकिन उस अवस्था में वहशी दरिंदों की हैवानियत आज भी उसे झकझोर देती है। इस केस की पैरवी कर रहे वकील सतेंद्र सिंह ने बताया कि पीड़िता के माता पिता अनपढ़ और  मजदूर तबके के थे और इस जंग में उन्होंने बराबर अपनी बेटी का साथ दिया। आज 33 साल बाद जब पीड़िता को न्याय मिला है तो हर कदम पर साथ देने वाले उसके माता पिता उसके पास नहीं हैं। न्याय की आस लगाए वृद्ध मजदूर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 1988 के इस मामले में पॉक्सो एक्ट भी नहीं लगा था और ये मामला साधारण मामला ही बन कर रह गया था। बता दें कि पॉक्सो एक्ट को वर्ष 2014 में बनाया गया था। यदि इस केस में ये एक्ट लगा होता तो शायद वहशी आरोपी प्राकृतिक मृत्यु को न प्राप्त कर इस संगीन अपराध की सजा काटकर मरते।

इन 33 वर्षों में पीड़िता और उसके परिवार को कितनी सामाजिक और मानसिक यातनाओं को झेलना पड़ा होगा इसका अंदाजा लगाना बहुत ही मुश्किल है। न्यायपालिका के मुताबिक किसी के साथ सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्वागृहो के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए लेकिन दुष्कर्म जैसे मामलों में ये सब हवा हवाई साबित हो जाता है। अपने साथ होने वाले घृणित अपराध के बाद इतने वर्षों तक लोगों की संशय भरी नजरों का सामना इस परिवार ने कैसे किया होगा क्या इसका जरा सा भी अंदाजा लगा सकती है भारतीय न्यायपालिका?

कैसे स्वीकार हो योर ऑनर का न्याय - 

33 वर्ष से सामाजिक तिरस्कार झेलने वाली लड़की क्या इसको न्याय माने? अपर जिला सत्र न्यायाधीश रेप एलांग विथ पाक्सो एक्ट के न्यायाधीश परमेश्वर प्रसाद का न्यायालय आखिर पीड़िता का 33 वर्षों का सम्मान कैसे लौटाएगा? यदि किसी न्यायाधीश की परिवार की बेटी-बहु के साथ ऐसा होता तो क्या तब भी कोर्ट 33 साल लगाता? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिसका जवाब देने शायद माननीय न्यायालय भी समर्थ नहीं होगा।

भारतीय न्याय व्यवस्था में न्याय मिलना कितना मुश्किल है, इन आंकड़ों से समझा जा सकता है-

 निचली अदालतों में 2.8 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित हैं। सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही यह आंकड़ा 58.8 लाख है जिसमें से 43.7 लाख मामले आपराधिक हैं। सर्वोच्च न्यायालय में कुल लंबित मामलों की संख्या 62,301 हैं। उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों में से 82 प्रतिशत ऐसे हैं जो दस साल से ज्यादा समय से वहां हैं और निचली अदालतों में करीब पांच हजार और उच्च न्यायालयों में करीब 45 प्रतिशत जजों के पद खाली हैं।

इस लचर व्यवस्था के पीछे का कारण क्या -


न्याय व्यवस्था की ऐसी स्थिति के कई कारण हैं। इनमें एक मुख्य कारण तो यही है कि जब भी किसी मामले में न्यायिक प्रक्रिया शुरू होती है तो उसके साथ ही उस मामले को अपराधियों के पक्ष में धकेलने की भी प्रक्रिया शुरू हो जाती है। स्वत: संज्ञान के नाम पर कामो को रोकना तो प्रथा बन गया है। स्वत: संज्ञान लेने के नाम पर न्यायालय कभी सरकार को दिशा निर्देश देती है तो कभी किसी को निर्देश देती है लेकिन अपने परिक्षेत्र में आने वाले मामूली मामलों तक में माननीय न्यायालय स्वत: संज्ञान नहीं लेती, आवश्यकता है की न्यायालय खुद पर ही आत्मवलोकन करे तभी लोगों में न्याय के मंदिर के प्रति आस्था दोबारा जाग सकती है।

इस रफ्तार से चले तो लगेंगे मामले निपटने में लगेंगे 300 साल- 

एक अनुमान के अनुसार सुनवाई इसी गति से चलती रही और मामले भी इसी गति से दर्ज होते रहे, तो पिछड़ चुके काम को पूरा करने में हमारी अदालतों को तीन सौ साल से अधिक समय लग जाएगा। कहते हैं देर से न्याय मिलने का मतलब न्याय न मिलना होता है तो सवाल उठता है, यह अन्याय कब तक चलता रहेगा। विधि सम्मत कामो के अतिरिक्त क्या न्यायिक प्रणाली भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो चुकी है? क्या भारतीय न्याय व्यवस्था सरकार के अधिकारों का अतिक्रमण करने में ही ज्यादा दिलचस्पी है? 30 जून 1988 को घटित इस घटना का फैसला 33 वर्ष बाद आया क्या ये पर्याप्त नहीं है न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाने के लिए?

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