सुदर्शन के राष्ट्रवादी पत्रकारिता को सहयोग करे

Donation

शाहीनबाग से सिंघु बॉर्डर : स्क्रिप्ट वही, चेहरे वही, प्रायोजक भी वही ! क्या अंजाम भी होगा वही ?

नए किसान कानूनों का विरोध करने वाले किसानों के आंदोलन और शाहीन बाग में सीएए का विरोध करने वालों काफी समानता है । दानों ही आंदोलनों के कारण भले ही अलग-अलग हों लेकिन दोनों के स्टाइ...,दोनों के पीछे जुटे लोग राजनीतिक पार्टियां एसे ढ़ेरो वजह हैं जो इन दोनो आंदोलन को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाती है और यही एक वजह है कि शाहीनबाग आंदोलन की तरह किसान आंदोलन भी बेअसर साबित हो रही है।

Mukesh
  • Jan 8 2021 12:47PM

CAA को लेकर शाहीनबाग से पूरे देश में जो डर फैलाने की कोशिश की गई वो डर एक झूठ था यह साबित हो चुका है। शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी देश के मुसलमानों के बीच यह झूठ फैलाने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे कि CAA  के जरिये मुसलमानों को देश से बाहर कर दिया जाएगा यह कानून देश के मुसलमानों की नागरिकता छीनने के लिए बनाया गया है जबकि बिल में मुसलमानों को नागरिकता देने या छीनने का किसी भी तरह से कोई जिक्र तक नहीं है। लेकिन बिल का विरोध करने वाले जामिया और जेएनयू गैंग के तथाकथित बुद्धिजिवी और अरबन नक्सलियों के गैंग ने इस झूठ को फैलाने के लिए पूरा स्वांग रचा। अब इस शाहीनबाग के प्रदर्शन को खत्म हुए 9 महीनों से ज्यादा का वक्त होने जा रहा है और CAA को लागू हुए भी

एक साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है। ना तो देश के किसी मुसलमानों की नागरिकता छिनी और ना ही किसी मुसलमान को देश से बाहर ही किया गया। वो जिस ठसक के साथ भारत में रह रहे थे उसी ठसक के साथ अभी भी रह रहे हैं । शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी का असल मकसद मोदी सरकार का विरोध करना था ना कि सीएए का। उन्हें मोदी सरकार के हर सही फैसले को गलत ठहराने के लिए देश में माहौल तैयार करना था जो कम से कम CAA मामले में सफल नहीं हो सका। लेकिन इस विरोध के कारण देश का लाखों का नुकसान हुआ, देश के मुसलमानों के दिल में मोदी सरकार के प्रति मुस्लिम विरोधी होने का भ्रम पैदा हुआ। राजधानी दिल्ली की जनता को जो असुविधा हुई वो अलग। क्या शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों और उनके पीछे खड़े होने वालों को सजा नहीं होने चाहिए ? क्या देश में सच को झूठ बताने और झूठ का डर या दहशत फैलाने का षड्यंत्र रचने वालों को सलाखों के पीछे नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होता तो शायद किसाना बिल का विरोध करने वाले शाहीनबाग से निकल कर सिंघु बॉर्डर पर जमा नहीं हो पाते। सिंघु बॉर्डर पर किसान बिल का विरोध करने के लिए जमा हुए किसानों को भी बिल के प्रावधानो को लेकर डराया जा रहा है। उन्हें सच जानने नहीं दिया जा रहा है। आखिर बिल में कहां लिखा है कि सरकार MSP खत्म कर रही है ? अखिर बिल में कहा लिखा है कि मंडिया खत्म हो जाएगी ? बिल में कहा लिखा है कि किसान की जमीन पर अदानी और अंबानी का कब्जा हो जाएगा ? किसानों से उसकी जमीन छिन जाएगी ? दरअसल सच इसके उलट है जिसे किसानों से छिपाया जा रहा है उसे सच जानने नहीं दिया जा रहा है। जिन लोगों की दुकान इस बिल के आने से बंद होगी वही इसका विरोध कर रहे हैं। बिल से किसानों की आमदनी बढ़ेगी उनकी आय 2022 तक दोगुनी करने का मोदी का जो प्रण है उसे पूरा करने में यह बिल महती भुमिका अदा करेगी। बिल के विरोध से यह साबित हो जाता है कि विपक्ष भी इस बात को लेकर आश्वसत है कि इस बिल से किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी हो जाएगी। इसी वजह से वो किसानों को बिल के खिलाफ भड़का रहे हैं। उन्हें इस बिल का डर दिखा रहे हैं। दरअसल विपक्ष को डर यह लग रहा है कि यदि किसान सचमुच आत्मनिर्भर हो गए, सम्पन्न हो गए तो फिर उनकी राजनीतिक जमीन जो खिसकी पड़ी वो सदा के लिए खिसक जाएगी। इसीलिए वो अपनी पूरी ताकत से इस बिल का विरोध कर रहे हैं और किसानों के कंधों पर रख कर अपनी बंदूक चला रहे हैं।

झूठे डर के आगे हार होती है 

शाहीनबाग और सिंघु बॉर्डर पर सरकार के बिल का विरोध करने वाले कुछ चेहरे अलग जरूर हैं लेकिन उनके पीछे का दिमाग एक है। साजिश रचने वाले लोग एक हैं। दोनों आंदोलन एक जैसे हैं एक ही तरीके के ऑपरेट हो रहे हैं इसलिए इसका अंजाम भी एक जैसा ही होगा। शाहीनबाग में जिस तरह से प्रदर्शनकारियों का झूठ बेनकाब हुआ सिंघु बॉर्डर पर आंदोलन करवाने वालों का झूठ भी उसी तरह बेनकाब होगा । आंदोलनकारियों को सलाह है कि जिस तरह सीएए के लागु होने के एक साल बाद भी मुसलमानों की नागरिकता खत्म नहीं हुई उन्हें देश निकाला नहीं मिला, बिल को लेकर उनका डर झूठा साबित हुआ उसी तरह किसान बिल के प्रति जो आशंका या डर है वो झूठा साबित होगा। किसानों को भी कम से कम एक साल तक इस बिल के साथ जी कर देखना चाहिए । इतना तो तय है कि इस बिल से फायदा यदि नहीं हुआ तो नुकसान तो बिल्कुल ही नहीं होगा। फिर यदि वो चाहे तो एक साल बिल के साथ जीने बाद इसका विरोध कर सकते हैं। तक के विरोध में उनका बिल के साथ जीने का अनुभव भी होगा और तब उनके विरोध को आम जन भी गंभीरता से लेंगे। लेकिन विरोध को प्रायोजित करने वाले लोग ऐसा होने देना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें पता है कि यदि ऐसा हुआ तो किसान बिल को गले लगा लेंगे। बिल के फायदे का अनुभव करने के बाद वो उसका समर्थन करने लगेंगे और फिर उनकी राजनीतिक रोटियां नहीं सेंकी जा सकेगी। विरोध को प्रायोजित करने वालों को भी यह तो लगता ही है कि यदि एक साल बिल के साथ किसान रह लेगा तो उनके डर फैलाने का कारोबार खत्म हो जाएगा। डर के आगे जीत है यह तो सच है लेकिन जिस डर के आगे जीत होती है उस डर का सच होना बहुत जरूरी है। झूठे डर के आगे जीत नहीं हार होती है। और बिल के विरोध को प्रायोजित करने वालों को यह पता है। क्योंकि शाहीनबाग के मामले में वो इस हार का सामना कर चुके हैं। 

एक नजर शाहीनबाग और सिंघु बॉर्डर के बीच समानतापर

नए किसान कानूनों का विरोध करने वाले किसानों के आंदोलन और शाहीनबाग में सीएए का विरोध करने वालों के बीच काफी समानता है। दोनों ही आंदोलनों के कारण भले ही अलग-अलग हों लेकिन दोनों आंदोलनों की स्टाइल,,,दोनों के प्रायोजकों का दिमाग, दोनों के पीछे जुटी राजनीतिक पार्टियां एसी ढ़ेरो वजह हैं जो इन दोनां आंदोलन को एक प्लेटफॉर्म पर लाती है और यही एक वजह है कि शाहीनबाग आंदोलन की तरह किसान आंदोलन भी बेअसर साबित हो रही है। अब आपको बारी-बारी से बताते हैं कि शाहीनबाग और सिंघु बॉर्डर पर बैठे किसानों के आंदोलन में क्या समानता है ?

दोनों आंदोलन अचानक शुरू हुए

शाहीनबाग प्रोटेस्ट जिस तरह से अचानक शुरू हुआ । किसानों का सिंघु बॉर्डर पर बिल के विरोध में जमा होने को भी उसी तरह अचानक शुरू हुआ बाताया गया। जिस तरह शाहीनबाग में प्रोटेस्ट वाली जगह पर लोग धीरे-धीरे पहुंच रहे थे वो एक प्लालिंग का हिस्सा थी। ठीक उसी तरह सिंघु बॉर्डर पर भी किसान किस्तों में पहुंच रहे हैं। धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ रही है।
कानून को लेकर डर या आशंका

जिस तरह सीएए कानून को लेकर शाहीनबाग के प्रदर्शनकारी आशंका व्यक्त कर रहे थे। जो प्रावधान कही भी सीएए कानून में था नहीं उसे लेकर लोगों को बरगलाया जा रहा था। ठीक उसी तर्ज पर तीनों किसान बिल के प्रावधानों को लेकर भी आशंका व्यक्त की जा रही है। एमएसपी और मंडियो के खत्म होने की जो अफवाहे फैलायी जा रही है वो निराधार है। शाहीनबाग और सिंघु बॉर्डर का विरोध दोनों ही आशंकाओं पर आधारित है।दोनों ही आंदोलनों को खत्म करवाने के लिए सरकार को जो पहल करनी चाहिए थी वो पहल करने में देरी हुई। जिस कारण आंदोलन लंबा खिंचा।
आंदोलन का स्वरूप

शाहीनबाग आंदोलन की शुरूआत ओखला में सीएए का विरोध कर रहे जामिया मीलिया इस्लामिया के छात्रों के खिलाफ हुए पुलिसिया कार्रवाई से हुई। पहले कुछ लोगों ने प्रोटेसट शुरू किया फिर धीरे-धीरे दिल्ली एनसीआर और पूरे देश के लोगों ने समर्थन में जुटना शुरू कर दिया। इसी तर्ज पर किसाना बिल का विरोध पहले पंजाब और हरियाना के किसानों के गुटों ने शुरू किया । वो दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर विरोध करने के लिए जमा हुए और बाद में मध्यप्रदेश , उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र और राजस्थान के किसान भी उनके साथ आए।

अंतर्राष्ट्रीय समर्थन

किसान बिल का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों के समर्थन में जिस तरह से कनाड के प्रधानमंत्री ने आवाज उठाई और भारत सरकार से कहा कि उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए। ठीक उसी तरह शाहीनबाद प्रदर्शनकारियों ने भी दूसरे देशों का ध्यान अपनी ओर खींचा। कुछ अरब देशों ने शाहीनबाद की स्थिति पर अपनी चिंता जाहिर की थी।

महिला ढाल

शाहीनबाग विरोध प्रदर्शन में महिलाओं ने फ्रंट सीट से आंदोलन को ड्राइव किया था ताकि पुलिसिया कार्रवाई से बचते हुए आंदोलन को लंबा खींचा जा सके। शहीनबाग आंदोलन को पुरूषों ने पीछे रह कर समर्थन किया था। शाहीनबाग की ही तर्ज पर सिंघु बॉर्डर पर भी पहले तो केवल पुरूष किसानों ने ही विरोध शुरू किया लेकिन अब धीरे-धीरे महिलओं की संख्या बढ़ती जा रही है। पंजाब और हरियाना से महिलाएं आंदोलन के समर्थन में जमा हो रही है।
नो बैनर

शाहीनबाग के आंदोलन को समर्थन भले ही देश के सभी बड़े बैनरवाले कर रहे हों लेकिन प्रदर्शन स्थल पर किसी भी तरह का कोई एक बैनर नहीं था। प्रदर्शनकारियों की कोशिश आंदोलन को आम लोगों का आंदोलन दिखाने की थी। यही अंदाज किसान आंदोलन में  अपनाया गया। आंदोलनकारी किसान किसी एक बैनर के तले जमा नहीं हुए है। इनके पीछे कोई एक बैनर नहीं है इनकी कोशिश भी आंदोलन को आम किसानों का आंदोलन बनाने की है।

मोदी विरोध

शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों के समर्थन में जितनी राजनीतिक पार्टियां थी वो सभी बीजेपी की राजनीतिक विरोधी पार्टियां थी। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वामपंथी दल और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी। यही सब राजनीतिक पर्टियां और लोग किसान आंदोलन की आग को भी हवा दे रहे हैं। बिल के प्रति अफवाह फैलाने में इन राजनीतिक पार्टियां का ही हाथ है। जो किसानों के कंधों पर बंदूक रख कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं।
आत्मनिर्भर आंदोलन

शाहीनबाग में प्रदर्शन के दौरान आंदोलनकारियों को केवल चाय पानी और बिस्कुट ही नहीं बल्कि बिरयानी और दोनों टाइम फुल मील की व्यवस्था थी। यह सरी व्यवस्था प्रदर्शन स्थल पर बनाये गये अस्थायी किचेन से की जाती रही। यही तरीका सिंघु बॉर्डर पर जमे किसान भी अपना रहे हैं यहां तो किचेन के साथ-साथ पिज्जा बनाने की मशीनों का भी इंतजाम है। इसके साथ-साथ आंदोलन को लंबा खींचने के लिए जरूरी सभी इंतजाम भी आंदोलन के प्रायोजको ने किसानों के लिए किया हुआ है।

 

 

Comments

संबंधि‍त ख़बरें

अभी अभी