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जन्मजयंती पर नमन कीजिए धर्मरक्षक व हिन्दू स्वाभिमान के प्रतीक महाराणा प्रताप महान जी को ... जिन्होंने घास की रोटी खाई लेकिन न झुकने दिया हिंदुत्व का भगवा ध्वज

महाराणा प्रताप को बचपन में सभी 'कीका' नाम लेकर पुकारा करते थे. राजपूताना राज्यों में मेवाड़ का अपना एक विशिष्ट स्थान है जिसमें इतिहास के गौरव बाप्पा रावल, खुमाण प्रथम, महाराणा हम्मीर, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, उदयसिंह और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने जन्म लिया है.

Abhay Pratap
  • Jun 13 2021 11:45AM

आज जन्मजजयंती है धर्म की रक्षा के लिए हर सुख का त्याग करने वाले उस अमर बलिदानी का जिनका नाम सुन कर आज भी भुजाएं खुद से ही फड़क उठती हैं. आज जन्मजयंती वीरभूमि राजस्थान में जन्मे उस गौरव महाराणा प्रताप की  जो बन गये हिंदुत्व के वो प्रतीक जो शिक्षा देते रहेंगे अनंत काल तक धर्म की रक्षा की , भले ही हालात कितने भी विषम क्यों न हो और दुश्मन कितना भी मजबूत क्यों न हो.

 महाराणा प्रताप का जन्म राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था. हिन्दू परंपरा से वीर व महान महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी संवत कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष आज के ही दिन अर्थात ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है. अंगरेजी कैलेंडर के अनुसार उनका जन्म 9 मई को हुआ था. उनके पिता महाराणा उदयसिंह और माता जीवत कंवर या जयवंत कंवर थीं.वे राणा सांगा के पौत्र थे. महाराणा प्रताप को बचपन में सभी 'कीका' नाम लेकर पुकारा करते थे. राजपूताना राज्यों में मेवाड़ का अपना एक विशिष्ट स्थान है जिसमें इतिहास के गौरव बाप्पा रावल, खुमाण प्रथम, महाराणा हम्मीर, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, उदयसिंह और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने जन्म लिया है.

 महाराणा प्रताप को राजपूत वीरता, शिष्टता और दृढ़ता की एक मिशाल माना जाता है. वह मुगलों के खिलाफ युद्ध लड़ने वाले अजेय योद्धा थे, जिन्होंने कभी स्वाभिमान से समझौता नहीं किया. उन्होंने स्वयं के लाभ के लिए भी कभी किसी के आगे हार नहीं मानी थी. वह अपने लोगों से बहुत प्यार करते थे और उनके साथ आजादी की लड़ाई में भी शामिल हुए थे. मेवाड़ की शौर्य-भूमि धन्य है जहां वीरता और दृढ प्रण वाले प्रताप का जन्म हुआ, जिन्होंने इतिहास में अपना नाम अजर-अमर कर दिया.

हिंदुत्व शिरोमणि वीर महाराणा प्रताप ने धर्म एवं स्वाधीनता के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दियाहल्दीघाटी का युद्ध अय्याश क्रूर हत्यारा अकबर और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के बीच 18 जून, 1576 ई. को लड़ा गया था. हल्दीघाटी के युद्ध में न तो दरिंदा अकबर जीत सका और न ही राणा हारे. मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी. मुगलों की असली ताकत हिन्दुओ में से टूट कर जा मिले गद्दार थे वरना अकबर जैसे अय्याश महाप्रतापी प्रताप के आगे कुछ पल भी न टिक पाते.

महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था. उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था. आपको बता दें हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सिर्फ 20000 सैनिक थे और अकबर के पास 85000 सैनिक. इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे. जब युद्ध के दौरान मुगल सेना उनके पीछे पड़ी थी तो चेतक ने महाराणा प्रताप को अपनी पीठ पर बैठाकर कई फीट लंबे नाले को पार किया था.

 हिन्दुओ को वीरता, स्वाभिमान, शौर्य की शिक्षा दे कर 19 जनवरी 1597 को वीर शिरोमणि राणा प्रताप जी अमरता को प्राप्त हो गए थे. आज भी चित्तौड़ की हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है. आज वीरता और शौर्य के उस अमर योद्धा महाराणा प्रताप को उनकी जन्मजयन्ती पर बारम्बार नमन और वंदन करते हुए उनकी गौरवगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प सुदर्शन परिवार लेता है .. वीर शिरोमणि धर्मयोद्धा महाराणा प्रताप अमर रहें .

 

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