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"समान नागरिक संहिता" लागू कर के पूरे देश मे "समान अधिकार दिवस" मनाए केंद्र सरकार... पढ़िए अश्वनी उपाध्याय जी का विस्तृत लेख

वर्तमान समय की परिस्थितियों के अनुसार समान नागरिक संहिता अपरिहार्य बता रहे हैं अश्वनी उपाध्याय जी।

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  • Mar 28 2021 9:51PM

आदरणीय प्रधानमंत्री जी,

इस पत्र के माध्यम से आपका ध्यान संविधान की आत्मा "समान नागरिक संहिता" की तरफ आकृष्ट करना चाहता हूँ।

बेटा हो या बेटी, माँ के पेट में बच्चा नौ महीने ही रहता है और प्रसव पीड़ा भी बेटा-बेटी के लिए एक समान होती है इससे स्पष्ट है कि महिला-पुरुष में भेदभाव भगवान, खुदा या जीसस नहीं बल्कि इंसान करता है। हमारे समाज में महिला-पुरुष में जो भेदभाव व्याप्त है वह रीति नहीं बल्कि मनुष्य द्वारा शुरू की गई कुरीति है, धार्मिक प्रथा नहीं बल्कि इंसान द्वारा द्वारा शुरू की गई कुप्रथा है और कुरीतियों और कुप्रथाओं को धर्म, मजहब या रिलिजन से जोड़ना बिलकुल गलत है। वैसे भी हमारा देश वेद-पुराण या बाइबिल-कुरान से नहीं बल्कि संविधान से चलता है और 'समता, समानता, समरसता, समान अवसर तथा समान अधिकार' संविधान की आत्मा है। कुछ लोग आर्टिकल 25 में प्रदत्त धार्मिक आजादी की दुहाई देकर 'समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता' का विरोध करते है लेकिन आर्टिकल 25 की शुरुआत ही होती है ‘सब्जेक्ट टू पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ एंड मोरैलिटी’ अर्थात किसी भी प्रकार की 'कुप्रथा, कुरीति, पाखंड और भेदभाव' को आर्टिकल 25 का संरक्षण प्राप्त नहीं है।

अंग्रेजो द्वारा 1860 में बनाई गई भारतीय दंड संहिता, 1961 में बनाया गया पुलिस ऐक्ट, 1872 में बनाया गया एविडेंस एक्ट और 1908 में बनाया गया सिविल प्रोसीजर कोड सहित सभी कानून बिना किसी भेदभाव के सभी भारतीयों पर समान रूप से लागू हैं। पुर्तगालियों द्वारा 1867 में बनाया गया पुर्तगाल सिविल कोड भी गोवा के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू है लेकिन विस्तृत चर्चा के बाद बनाया गया आर्टिकल 44 अर्थात समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कभी भी गंभीर प्रयास नहीं किया गया. अब तक 125 बार संविधान में संशोधन किया गया और 5 बार सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी पलटा गया लेकिन आजतक 'समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता' का एक मसौदा भी नहीं तैयार किया गया, परिणाम स्वरूप इससे होने वाले लाभ के बारे में बहुत कम लोगों को ही पता है। समान नागरिक संहिता शुरू से भाजपा के मैनिफेस्टो में है इसलिए भाजपा समर्थक इसका समर्थन करते हैं और भाजपा विरोधी इसका विरोध करते हैं लेकिन सच्चाई तो यह है कि समान नागरिक संहिता के लाभ के बारे में न तो इसके समर्थकों को पता है और न इसके विरोधियों को, इसीलिए समान नागरिक संहिता का एक ड्राफ्ट बनाना नितांत आवश्यक है।

माननीय प्रधानमंत्री जी,

समान नागरिक संहिता लागू नहीं होने से अनेक समस्याएं हैं:

1. मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहुविवाह अर्थात चार निकाह करने की छूट है लेकिन अन्य धर्मो में 'एक पति-एक पत्नी' का नियम बहुत कड़ाई से लागू है। बाझपन या नपुंसकता जैसा उचित कारण होने पर भी हिंदू ईसाई पारसी के लिए दूसरा विवाह अपराध है और भारतीय दंड संहिता की धारा 494 में 7 वर्ष की सजा का प्रावधान है इसीलिए कई लोग दूसरा विवाह करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लेते हैं. भारत जैसे सेक्युलर देश में चार निकाह जायज है जबकि इस्लामिक देश पाकिस्तान में पहली बीबी की इजाजत के बिना शौहर दूसरा निकाह नहीं कर सकता हैं. 'एक विवाह या बहुविवाह' किसी भी प्रकार से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का विषय है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।

2. विवाह की न्यूनतम उम्र भी सबके लिए एक समान नहीं है। मुस्लिम लड़कियों की वयस्कता की उम्र निर्धारित नहीं है और माहवारी शुरू होने पर लड़की को निकाह योग्य मान लिया जाता है इसीलिए 11-12 वर्ष की उम्र में भी लड़कियों का निकाह किया जाता है जबकि अन्य धर्मो मे लड़कियों की विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़कों की विवाह की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष है. विश्व स्वास्थ्य संगठन कई बार कह चुका कि 20 वर्ष से पहले लड़की शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होती है और 20 वर्ष से पहले गर्भधारण करना जच्चा-बच्चा दोनों के लिए अत्यधिक हानिकारक है, 20 वर्ष से पहले दोनों ही मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होते हैं, 20 वर्ष से पहले तो बच्चे ग्रेजुएशन भी नहीं कर पाते हैं और 20 वर्ष से पहले बच्चे आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर नहीं होते हैं इसलिए सबके लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष करना अतिआवश्यक है। 'विवाह की न्यूनतम उम्र' किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।

3. तीन तलाक अवैध घोषित होने के बावजूद तलाक-ए-हसन एवं तलाक-ए-अहसन आज भी मान्य है और इनमें भी तलाक का आधार बताने की बाध्यता नहीं है और केवल 3 महीने प्रतीक्षा करना है लेकिन अन्य धर्मो मे केवल न्यायालय के माध्यम से ही विवाह-विच्छेद किया जा सकता है. हिंदू ईसाई पारसी दम्पत्ति आपसी सहमति से भी मौखिक विवाह विच्छेद की सुविधा से वंचित है. मुसलमानों में प्रचलित तलाकों का न्यायपालिका के प्रति जवाबदेही नहीं होने के कारण मुस्लिम औरतों को हमेशा भय के वातावरण में रहना पड़ता है. टर्की जैसे मुस्लिम बाहुल्य देश में भी किसी तरह का मौखिक तलाक मान्य नहीं है. 

4. मुस्लिम कानून मे मौखिक वसीयत एवं दान मान्य है लेकिन अन्य धर्मो मे केवल पंजीकृत वसीयत एवं दान ही मान्य है. मुस्लिम कानून मे एक-तिहाई से अधिक सम्पत्ति का वसीयत नहीं किया जा सकता है जबकि अन्य धर्मो में शतप्रतिशत सम्पत्ति का वसीयत किया जा सकता है. वसीयत और दान किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।

5. मुस्लिम कानून मे 'उत्तराधिकार' की व्यवस्था अत्यधिक जटिल है, पैत्रिक सम्पत्ति में पुत्र एवं पुत्रियों के मध्य अत्यधिक भेदभाव है, अन्य धर्मो में भी विवाहोपरान्त अर्जित सम्पत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं और उत्तराधिकार के कानून बहुत जटिल हैं, विवाह के बाद पुत्रियों के पैत्रिक सम्पत्ति में अधिकार सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है और विवाहोपरान्त अर्जित सम्पत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं.  'उत्तराधिकार' किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।

6. विवाह विच्छेद (तलाक) का आधार भी सबके लिए एक समान नहीं है। व्याभिचार के आधार पर मुस्लिम अपनी बीबी को तलाक दे सकता है लेकिन बीबी अपने शौहर को तलाक नहीं दे सकती है। हिंदू पारसी और ईसाई धर्म में तो व्याभिचार तलाक का ग्राउंड ही नहीं है। कोढ़ जैसी लाइलाज बीमारी  के आधार पर हिंदू और ईसाई धर्म में तलाक हो सकता है लेकिन पारसी और मुस्लिम धर्म में नहीं। कम उम्र में विवाह के आधार पर हिंदू धर्म में विवाह विच्छेद हो सकता है लेकिन पारसी ईसाई मुस्लिम में यह संभव नहीं है।  'विवाह विच्छेद' किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।

7. गोद लेने का नियम भी हिंदू मुस्लिम पारसी ईसाई के लिए अलग अलग है। मुस्लिम गोद नहीं ले सकता और अन्य धर्मो मे भी पुरुष प्रधानता के साथ गोद व्यवस्था लागू है.  'गोद लेने का अधिकार' किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है बल्कि सिविल राइट और ह्यूमन राइट का मामला है इसलिए यह पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल और रिलिजन न्यूट्रल होना चाहिए।

उपरोक्त सभी विषय सिविल राइट और ह्यूमन राइट से सम्बन्धित हैं जिनका न तो धर्म या मजहब से किसी तरह का संबंध है और न तो इन्हें धार्मिक या मजहबी व्यवहार कहा जा सकता है लेकिन आजादी के 73 साल बाद भी धर्म या मजहब के नाम पर महिला-पुरुष में भेदभाव जारी है. हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से 'समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता' की कल्पना किया था ताकि सबको समान अधिकार मिले और देश की एकता और अखंडता मजबूत हो लेकिन वोटबैंक राजनीति के कारण 'समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता' लागू नहीं किया गया. 


समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता हमारे संविधान की आत्मा है और इसके अनेक लाभ हैं:

1. भारतीय दंड संहिता के तर्ज पर देश के सभी नागरिकों के लिए एक 'भारतीय नागरिक संहिता' लागू करने से देश और समाज को सैकड़ों जटिल कानूनों से मुक्ति मिलेगी.

2. वर्तमान समय में अलग अलग धर्म के लिए लागू अलग अलग ब्रिटिश कानूनों से सबके मन में हीन भावना पैदा होती है इसलिए सभी नागरिकों के लिए एक 'भारतीय नागरिक संहिता' लागू होने से सबको हीन भावना से मुक्ति मिलेगी.

3. ‘एक पति-एक पत्नी’ की अवधारणा सभी भारतीयों पर एक समान रूप से लागू होगी और बाझपन या नपुंसकता जैसे अपवाद का लाभ सभी भारतीयों को एक समान रूप से मिलेगा चाहे वह पुरुष हो या महिला, हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या इसाई.

4. न्यायालय के माध्यम से विवाह-विच्छेद करने का एक सामान्य नियम सबके लिए लागू होगा. विशेष परिस्थितियों में मौखिक तरीके से विवाह विच्छेद करने की अनुमति भी सभी नागरिकों को होगी, चाहे वह पुरुष हो या महिला, हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या इसाई.

5. पैतृक संपति में पुत्र-पुत्री तथा बेटा-बहू को एक समान अधिकार प्राप्त होगा और संपति को लेकर धर्म जाति क्षेत्र और लिंग आधारित विसंगति समाप्त होगी, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या इसाई.

6. विवाह-विच्छेद की स्थिति में विवाहोपरांत अर्जित संपति में पति-पत्नी को समान अधिकार होगा, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या इसाई.

7. वसीयत दान धर्मजत्व संरक्षकत्व बंटवारा गोद इत्यादि के संबंध में सभी भारतीयों पर एक समान कानून लागू होगा, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या इसाई. धर्म जाति क्षेत्र लिंग आधारित विसंगति समाप्त होगी.

8.  राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र एवं एकीकृत कानून मिल सकेगा और सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू होगा, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या इसाई.

9. जाति धर्म क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग कानून होने से पैदा होने वाली अलगाववादी मानसिकता समाप्त होगी और एक अखण्ड राष्ट्र के निर्माण की दिशा में हम तेजी से आगे बढ़ सकेंगे.

10. अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून होने के कारण अनावश्यक मुकदमेबाजी में उलझना पड़ता है. सबके लिए एक नागरिक संहिता होने से न्यायालय का बहुमूल्य समय बचेगा.

11.  'भारतीय नागरिक संहिता' से रूढ़िवाद, कट्टरवाद, जातिवाद, संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद समाप्त होगा तथा वैज्ञानिक सोच विकसित होगी. इसके लागू होने से हिंदू मुस्लिम पारसी ईसाई बहन-बेटियों के अधिकारों मे भेदभाव खत्म होगा. सच्चाई तो यह है कि इसका फायदा हिंदू-बहन बेटियों को ज्यादा नहीं मिलेगा क्योंकि हिंदू मैरिज ऐक्ट में महिला-पुरुष को लगभग समान अधिकार पहले से ही प्राप्त है. इसका सबसे ज्यादा फायदा मुस्लिम बहन-बेटियों को मिलेगा क्योंकि शरिया कानून में उन्हें पुरुषों के बराबर नहीं माना जाता है.

आर्टिकल 37 में स्पस्ट लिखा है कि नीति निर्देशक सिद्धांतों को लागू करना सरकार की फंडामेंटल ड्यूटी है. जिस प्रकार संविधान का पालन सभी नागरिकों की फंडामेंटल ड्यूटी है वैसे ही संविधान को शतप्रतिशत लागू करना सरकार की नैतिक ड्यूटी है. किसी भी सेक्युलर देश में धार्मिक आधार पर अलग-अलग कानून नहीं होता है लेकिन हमारे यहाँ आज भी हिंदू मैरिज एक्ट, पारसी मेरिज एक्ट और ईसाई मेरिज एक्ट लागू है, जब तक भारतीय नागरिक संहिता लागू नहीं होगी तब तक भारत को सेक्युलर कहना सेक्युलर शब्द को गाली देना है. यदि गोवा में एक 'समान नागरिक संहिता' सबके लिए लागू हो सकती है तो देश के सभी नागरिकों के लिए एक 'भारतीय नागरिक संहिता' क्यों नहीं लागू हो सकती है?

यह भी स्पष्ट करना बहुत जरूरी है कि समान नागरिक संहिता लागू होने से आर्टिकल 25 के अंतर्गत प्राप्त मूलभूत धार्मिक अधिकार जैसे पूजा, नमाज या प्रार्थना करने, व्रत या रोजा रखने तथा मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा का प्रबंधन करने या धार्मिक स्कूल खोलने, धार्मिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करने या विवाह-निकाह की कोई भी पद्धति अपनाने या मृत्यु पश्चात अंतिम संस्कार के लिए कोई भी तरीका अपनाने में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होगा. जिस दिन 'भारतीय नागरिक संहिता' का एक ड्राफ्ट तैयार हो जाएगा और आम जनता विशेषकर बहन बेटियों को इसके लाभ के बारे में पता चल जाएगा, उस दिन कोई भी इसका विरोध नहीं करेगा. सच तो यह है कि जो लोग समान नागरिक संहिता के बारे में कुछ नहीं जानते हैं वे ही इसका विरोध कर रहे हैं.


जाति धर्म भाषा क्षेत्र और लिंग आधारित अलग-अलग कानून 1947 के विभाजन की बुझ चुकी आग में सुलगते हुए धुंए की तरह हैं जो विस्फोटक होकर देश की एकता को कभी भी खण्डित कर सकते हैं इसलिए इन्हें समाप्त कर एक 'भारतीय नागरिक संहिता' बनाना न केवल धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए बल्कि देश की एकता-अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भी अतिआवश्यक है. दुर्भाग्य से 'भारतीय नागरिक संहिता' को हमेशा धार्मिक तुष्टिकरण के चश्मे देखा जाता रहा है.

सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट केंद्र सरकार से कानून बनाने के लिए तो नहीं कह सकता है लेकिन वह अपनी भावना व्यक्त कर सकता है और कोर्ट बार-बार यही कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट जुडिशियल कमीशन या एक्सपर्ट कमेटी बनाने का निर्देश दे सकता है जो विकसित देशों की समान नागरिक संहिता और भारत में लागू कानूनों का अध्ययन करे और सबकी अच्छाइयों को मिलाकर 'भारतीय नागरिक संहिता' का एक ड्राफ्ट तैयार कर सार्वजनिक करे, जिससे इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा शुरू हो सके.

विवाह की न्यूनतम उम्र, तलाक का आधार, गुजारा भत्ता, संपत्ति और गोद लेने का आधार एक समान करने की मांग वाली पांच जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। इसी प्रकार दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई को 'समान नागरिक संहिता' की मांग वाली मेरी जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था लेकिन सरकार ने अपना जबाब आज तक दाखिल नहीं किया। मेरा व्यक्तिगत मत है कि कोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा करने की बजाय सरकार को विकसित देशों की 'समान नागरिक संहिता' और भारत में लागू कानूनों का अध्ययन कर दुनिया का सबसे अच्छा और प्रभावी 'इंडियन सिविल कोड' ड्राफ्ट कर सार्वजनिक करना चाहिए. 

अनुच्छेद 44 पर बहस के दौरान बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था- ”व्यवहारिक रूप से इस देश में एक सिविल संहिता है जिसके प्रावधान सर्वमान्य हैं और समान रूप से पूरे देश में लागू हैं. केवल विवाह-उत्तराधिकार का क्षेत्र है जहां एक समान कानून लागू नहीं है. यह बहुत छोटा सा क्षेत्र है जिस पर हम समान कानून नहीं बना सके हैं इसलिए हमारी इच्छा है कि अनुच्छेद 35 को संविधान का भाग बनाकर सकारात्मक बदलाव लाया जाए. यह आवश्यक नहीं है कि उत्तराधिकार के कानून धर्म द्वारा संचालित हों. धर्म को इतना विस्तृत और व्यापक क्षेत्र क्यों दिया जाए कि वह संपूर्ण जीवन पर कब्जा कर ले और विधायिका को इन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने से रोके”

संविधान सभा के सदस्य के.एम. मुंशी ने कहा- “हम एक प्रगतिशील समाज हैं और ऐसे में धार्मिक क्रियाकलापों में हस्तक्षेप किए बिना हमें देश को एकीकृत करना चाहिए, बीते कुछ वर्षों में धार्मिक क्रियाकलाप ने जीवन के सभी क्षेत्रों को अपने दायरे में ले लिया है, हमें ऐसा करने से रोकना होगा और कहना होगा कि विवाह उपरांत मामले धार्मिक नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष कानून के विषय हैं. यह अनुच्छेद इसी बात पर बल देता है. मैं अपने मुस्लिम मित्रों से कहना चाहता हूं कि जितना जल्दी हम जीवन के पृथक्करणीय दृष्टिकोण को भूल जाएंगे, देश और समाज के लिए उतना ही अच्छा होगा. धर्म उस परिधि तक सीमित होना याहिए जो नियमत: धर्म की तरह दिखता है और शेष जीवन इस तरह से विनियमित, एकीकृत और संशोधित होना चाहिए कि हम जितनी जल्दी संभव हो, एक मजबूत और एकीकृत राष्ट्र में निखर सके”

संविधान सभा के सदस्य कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा- “कुछ लोगों का कहना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड बन जाएगा तो धर्म खतरे में होगा और दो समुदाय मैत्रियता के साथ नहीं रह पाएंगे. इस अनुच्छेद का उद्देश्य ही मैत्रियता बढ़ाना है. समान नागरिक संहिता मैत्रियता को समाप्त नहीं बल्कि मजबूत करेगी. उत्तराधिकार या इस प्रकार के अन्य मामलों में अलग-अलग व्यवस्थाएं ही भारतीय नागरिकों में भिन्नता पैदा करती हैं. समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य विवाह उत्तराधिकार के मामलों में एक समान सहमति तक पहुंचने का प्रयास करना है. जब ब्रिटिश हमारे देश की सत्ता पर काबिज हुए तो उन्होंने इस देश के सभी नागरिकों, चाहे हिंदू हों या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई, के लिए समान रूप से लागू होने वाली 'भारतीय दंड संहिता' लागू किया था. क्या तब मुस्लिम अपवाद बने रह पाए और क्या वे आपराधिक कानून की एक व्यवस्था को लागू करने के लिए ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ विद्रोह कर सके? भारतीय दंड संहिता हिंदू-मुसलमान पर एक समान रूप से लागू होता है. यह कुरान द्वारा नहीं बल्कि विधिशास्त्र द्वारा संचालित है. इसी तरह संपत्ति कानून भी इंग्लिश विधिशास्त्र से लिए गए हैं”.

1985 में शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- “यह अत्यधिक दुख का विषय है कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 44 मृत अक्षर बनकर रह गया है. यह प्रावधानित करता है कि सरकार सभी नागरिकों के लिए एक 'समान नागरिक संहिता' बनाए लेकिन इसे बनाने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए जाने का कोई साक्ष्य नहीं मिलता है, समान नागरिक संहिता विरोधाभासी विचारों वाले कानूनों के प्रति पृथक्करणीय भाव को समाप्त कर राष्ट्रीय अंखडता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग करेगा”.

1995 में सरला मुदगल केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत व्यक्त की गई संविधान निर्माताओं की इच्छा को पूरा करने में सरकार और कितना समय लेगी? उत्तराधिकार और विवाह को संचालित करने वाले परंपरागत हिंदू कानून को बहुत पहले ही 1955-56 में संहिताकरण करके अलविदा कर दिया गया है. देश में समान नागरिक संहिता को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित करने का कोई औचित्य नहीं है. कुछ प्रथाएं मानवाधिकार एंव गरिमा का अतिक्रमण करते हैं. धर्म के नाम पर मानव अधिकारों का गला घोटना स्वराज्य नहीं बल्कि निर्दयता है, इसलिए एक समान नागरिक संहिता का होना निर्दयता से सुरक्षा प्रदान करने और राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को ममजबूत करने के लिए नितांत आवश्यक है”.

2003 में जॉन बलवत्तम केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “यह दुख की बात है कि संविधान के अनुच्छेद 44 को आज तक लागू नहीं किया गया, संसद को अभी भी देश में एक समान नागरिक संहिता लागू के लिए कदम उठाना है. समान नागरिक संहिता वैचारिक मतभेदों को दूर कर देश की एकता-अखंडता को मजबूत करने में सहायक होगी.”

2017 में शायरा बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- “हम भारत सरकार को निर्देशित करते हैं कि वह उचित विधान बनाने पर विचार करें. हम आशा एवं अपेक्षा करते हैं कि वैश्विक पटल पर और इस्लामिक देशों में शरीयत में हुए सुधारों को ध्यान में रखते हुए एक कानून बनाया जाएगा. जब ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय दंड संहिता के माध्यम सबके लिए एक कानून लागू किया जा सकता है तो भारत के पीछे रहने का कोई कारण नहीं है”.

2019 में जोस पाउलो केस में सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार की तरफ से अबतक कोई प्रयास नहीं किया गया. कोर्ट ने अपने टिप्पणी में गोवा का उदाहरण दिया और कहा- “1956 में हिंदू लॉ बनने के 63 साल बीत जाने के बाद भी पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया.

प्रमुख समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था- “एक ही विषय पर हिंदू मुस्लिम ईसाई पारसी के लिए अलग अलग कानून, धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतांत्रिक मूल्यों और देश की एकता-अखंडता के लिए अत्यधिक खतरनाक है”

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था- “मेरी समझ में नहीं आ रहा है, जब संविधान निर्माताओं ने विवाह के लिए एक कानून बनाने की सिफारिश की है और कहा है कि राज्य इसकी तरफ ध्यान देगा, तो क्या वे साम्प्रदायिक थे, क्या यह संप्रदायिकता मुद्दा है? क्रिमिनल लॉ एक है तो सिविल लॉ क्यों नहीं एक हो सकता है?”.

अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य ताहिर महमूद कहते हैं- “परंपरागत कानून के लिए धार्मिक राजनीतिक दबाव बनाने की बजाय मुसलमानों को समान नागरिक संहिता की मांग करना चाहिये.

माननीय प्रधानमंत्री जी,

विस्तृत चर्चा के बाद 23 नवंबर 1948 को अनुच्छेद 44 हमारे संविधान में जोड़ा गया था और इसके माध्यम से सरकार को निर्देश दिया गया कि वह देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करें. संविधान निर्माताओं और विशेष रूप से बाबा साहब अंबेडकर की हार्दिक इच्छा थी कि अलग-अलग धर्म के लिए अलग-अलग कानून के स्थान पर 'भारतीय दंड संंहिता' की तरह ही सभी भारतीयों के लिए जाति धर्म भाषा क्षेत्र और लिंग निरपेक्ष एक 'भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होना चाहिए. 

सरकार को 23 नंवबर 2021 को 'समान नागरिक संहिता' लागू करना चाहिए तथा पूरे देश में “समान अधिकार दिवस” मनाना चाहिए। जागरूकता फैलाने के लिए देश के सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में भारतीय नागरिक संहिता पर वाद-विवाद और निबंध लेखन प्रतियोगिता आयोजित करना चाहिए.

 

लेख साभार- 

अश्विनी उपाध्याय जीी

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