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"भारत की युवाशक्ति को सकारात्मक दिशा पाने के लिए स्वामी विवेकानंद जी जैसे पथ प्रदर्शकों के अनुसरण की आवश्यकता"- IPS अशोक कुमार, DGP उत्तराखंड

देश की युवाशक्ति को सहेजने और संजोने के साथ देश के हित में सदुपयोग करने के तौर तरीको और विकल्पों को विस्तार से रेखांकित करते पुलिस महानिदेशक उत्तराखंड IPS अशोक कुमार.

Rahul Pandey
  • Jan 15 2021 11:08AM

युवा किसी भी देश और समाज में बदलाव के मुख्य वाहक होते हैं. इतिहास गवाह है कि आज तक दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी परिवर्तन (सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक व वैज्ञानिक) हुए हैं उनके मुख्य आधार युवा ही रहे हैं। भारत में भी युवाओं का एक समृद्धशाली इतिहास रहा है.

प्राचीन काल में आदि शंकराचार्य जी से लेकर गौतमबुद्ध जी व महावीर स्वामी जी ने अपनी युवावस्था में ही धर्म, व समाज सुधार का बीड़ा उठाया था। आचार्य कौटिल्य ने मगध की जनता को नन्दवंश के कुशासन से मुक्ति दिलाने व अपने अपमान का बदला लेने के लिये युवा चन्द्रगुप्त मौर्य को अपना प्रमुख साधन बनाया था। 

पुनर्जागरण काल में भी राजा राममोहन राय जी, स्वामी दयानंद सरस्वती जी के साथ स्वामी विवेकानन्द जी जैसे युवा विचारको ने धर्म व समाज सुधार आन्दोलन का नेतृत्व किया। स्वामी विवेकानंद जी ने तो शिकागो धर्म सम्मलेन (1893) में अपनी ओजस्वी भाषण शैली के बलबूते भारतीय धर्म- दर्शन की विजय पताका फहरा दिया था। 

उनके ओजस्वी भाषण के बाद पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के वो सभी लोग भारतीय ज्ञान परम्परा से अचंभित हो गये थे जो अपने आपको दुनिया में सबसे सभ्य व् विकसित मानते थे। स्वामी विवेकानंद जी ने 39 वर्ष की अल्पायु में जो योगदान दे दिया वो आज भी व् भविष्य में भी सदा युवाओं के लिये प्रेरणास्रोत बना रहेगा. 

आधुनिक काल में रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा क्रांतिकारियों ने अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिये थे. यदि आजादी से लेकर अब तक के सात दशकीय समकालीन भारत के इतिहास की बात की जाय, तो इस काल में भी होते कई आन्दोलनों व परिवर्तनों का नेतृत्व युवाओं ने ही किया है। 

भारत को खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने (हरित क्रांति) से लेकर परमाणु शक्ति संपन्न बनाने तक का जिम्मा युवा कन्धों ने उठाया। कंप्यूटर क्रांति व नई आर्थिक नीति भी युवा मष्तिष्क की ही उपज थी. यदि वर्तमान भारत की बात की जाय तो यह दुनिया का सबसे युवा देश है .. 

जनसँख्या के आंकड़ों के अनुसार भारत में 25 वर्ष तक की आयु वाले लोग कुल जनसंख्या का 50 फीसदी हैं,  वहीं 35 वर्ष तक वाले कुल जनसंख्या का 65 फीसदी है। यही कारण है कि इसे दुनिया भर में उम्मीद की नजरों से देखा जा रहा है और 21वीं सदी की महाशक्ति होने की भविष्यवाणी भी की जा रही है। 

युवा आबादी ही देश की तरक्की को रफ्तार प्रदान कर सकती है। जैसा कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति व महान वैज्ञानिक डॉ APJ अब्दुल कलाम जी ने कहा था कि हमारे पास युवा संसाधन के पास में अपार सम्पदा है और यदि समाज के इस वर्ग को सशक्त बनाया जाय तो हम बहुत जल्द ही महाशक्ति बनने के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।

यह बात शत प्रतिशत सत्य है कि बिना खनिज संसाधन के भी किसी देश का विकास संभव नहीं है लेकिन बिना मानव संसाधन के देश के विकास के बारे में सोचना भी मुश्किल है. इसका प्रत्यक्ष उदहारण हम जापान के रूप में ले सकते हैं, जिसने खनिज संसाधनों के अभाव के बावजूद अपने मानव संसाधन के दम पर विकास की गाथा लिखी और आज दुनिया की तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। 

यदि भारत के राज्यों की बात की जाय तो बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ व ओड़िसा जैसे राज्य संसाधनों के बावजूद भी आशानुरूप अपेक्षाकृत विकसित नही हैं, वहीं केरल, कर्नाटक जैसे राज्य विकास के मामले में आगे हैं. यदि ‘चिकित्सा, स्वास्थ्य, व कौशल विकास में निवेश करके मानव संसाधन को मानव पूंजी में तब्दील कर दिया जाय तो निश्चय ही भविष्य में इसका बेहतर प्रतिफल मिलेगा। 

यदि मानव संसाधन का उचित दोहन व् प्रबंधन नहीं किया जाता तो यही विकास में सबसे बड़ी बाधा भी उत्पन्न करता है। उदाहरण के रूप में हम आतंकवाद, नक्सलवाद व उग्रवाद में संलिप्त युवाओं को ले सकते हैं। आतंकवाद, नक्सलवाद, व उग्रवाद जैसे नकारात्मक तत्व भी अपने गलत मंसूबों को कायमाब करने के लिये गुमराह युवाओं को ही अपना माध्यम बनाते हैं । 

आतंकवाद के लिये जम्मू- कश्मीर का उदहारण भी ले सकते हैं जहाँ के युवाओं को बरगलाकर आतंकवादी अपनी नापाक हरकतों को अंजाम देते हैं। अस्सी के दशक में पंजाब भी कुछ ऐसी ही स्थिति से जूझ रहा था। पश्चिम बंगाल, छतीसगढ़ व झारखंड जैसे राज्यों में फैला नक्सलवाद भी गुमराह युवाओं के कन्धों पर ही बन्दूक रखकर अपना निशाना साधता है. 

पूर्वोत्तर के राज्यों का उग्रवाद भी भटके युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करते रहे हैं। देश और दुनिया में तेजी से फैलता नशाखोरी का जाल भी कई युवाओं को अपने चपेट में ले रहा है जिसमें पंजाब का उदाहरण प्रमुख है. ऐसी मुश्किल स्थिति में युवाओं को सही दिशा निर्देश और उपयुक्त मार्गदर्शन की अति आवश्यकता है। 

भारत की युवा शक्ति को सकारात्मक कार्यों में प्रयुक्त करने की जरुरत है। आवश्यकता है ऐसे प्रेरणास्रोतों व पथ- प्रदर्शको की जो युवा पीढी को सकारात्मक और बेहतर रास्ता दिखा सकें. युवाओं के दिग्भ्रमित होने और गलत रास्ते पर जाने कारक कई लोग बेरोजगारी को मानते हैं लेकिन युवाओं को अपनी ये मानसिकता बदलनी होगी कि सरकारी नौकरी ही रोजगार का एकमात्र जरिया है। 

इसमें समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। भारतीय समाज में यह आमधारणा है कि सरकारी नौकरी ही जीवन की सफलता का पैमाना है। समाज के लोगों को इस धारणा को बदलना होगा.. उदारीकरण व् सूचना क्रांति के आधुनिक युग रोजगार व स्वरोजगार की संभावनाओं की कमी नहीं है। 

इसका उदाहरण अमेरिका और यूरोपीय देशो से ले सकते हैं जहाँ के युवा इन संभावनाओं का भरपूर लाभ ले रहे हैं। भारत में भी गुजरात का उदाहरण लिया जा सकता है जहाँ के लोग उद्यमशीलता के बूते स्वयं को और देश के अन्य लोगो को भी रोजगार प्रदान किये हुये हैं।

हमें अपनी युवा शक्ति को खेल के क्षेत्र में भी ताकत लगानी चाहिये। युवा जनसँख्या के लिहाज से हम दुनिया में पहले स्थान पर हैं लेकिन जब ओलम्पिक व कॉमनवेल्थ जैसे खेलों में पदक जीतने की बात होती है तो हम अक्सर उसमें फिसड्डी साबित होते हैं। 

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है और इसकी गणना दुनिया के सबसे सफलतम लोकतंत्र में की जाती है। इसके बावजूद भारत की राजनीति में युवाओं की भागीदारी बेहद कम है। अक्सर देखा गया है कि राजनीति को लेकर युवाओं में नकारात्मकता का भाव होता है और इसलिये वे राजनीति में आना नहीं चाहते है.

लेकिन उन्हें ये समझना चाहिये कि जब तक वे राजनीति में भागीदारी नहीं करेंगे तब तक राजनीति से नकारात्मकता दूर नहीं होगी। भारतीय संविधान ने 18 साल से अधिक उम्र के युवाओं को मतदान का अधिकार दिया हुआ है। ऐसे में युवाओं की भूमिका काफी अहम हो जाती है। 

युवाओं को अपने मताधिकार का प्रयोग अवश्य करना चाहिये और अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव सोच समझकर करना चाहिये. अगर हम राजनीति में स्वच्छ व ईमानदार छवि के लोगों का चुनाव करेंगे तो देश की शासन व्यवस्था साफ और सुथरी हो जायेगी. 

इसके अलावा युवाओं को बेहतर मानव संसाधन में बदलने के लिये शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार की जरुरत है। हमारे देश के विद्यालयों व  विश्व विद्यालयों में अभी भी परम्परागत तरीके से ही पढाई हो रही है जिसके कारण हमारे विश्वविद्यालय वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपेक्षाकृत पिछड़े हुए हैं. 

हमारी शिक्षा व्यवस्था में प्राप्तांकों को बहुत महत्व दिया जाता है जिसकी वजह से बच्चों में रटने की प्रवृत्ति हो जाती है और उनमें मौलिकता व रचनात्मकता का विकास नहीं हो पाता है। यही कारण है कि हम नवाचार में पिछड़े हुए हैं .. इसके लिये हमें शिक्षा के प्राथमिक व उच्च दोनों ही स्तर पर सुधार के प्रयास करने होंगे। 

नई शिक्षा नीति इस क्षेत्र कारगर सिद्ध हो सकती है। शोध व अनुसन्धान की भी स्थिति हमारे देश में बहुत अच्छी नहीं है। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी है। हमारे देश के ही युवा जब अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशो में जाते हैं तो वहां अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं और नोबेल जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार भी पाते हैं। 

विज्ञान व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तो हमारे युवाओं का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है, लेकिन प्रतिभा-पलायन की वजह से हम उनका लाभ नहीं ले पा रहे हैं। अतः भारत में शिक्षा को व्यावसायिकता से जोड़ने की जरुरत है और यहाँ की प्रतिभाओं को उचित माहौल व अवसर भी उपलब्ध कराने की भी जरूरत है. तभी हम अपनी युवा प्रतिभाओं का समुचित सदुपयोग कर पायेंगे. 

हमें यह समझना होगा कि युवाओं की तरक्की से ही देश की भी तरक्की होगी. जिस दिन राजनीति से लेकर प्रशासन तक,  समाज से लेकर विज्ञान तक, खेल से लेकर कारोबार तक युवाओं की जितनी अधिक भागीदारी होगी, उस दिन देश का भविष्य उतना ही उज्ज्वल होगा.

आपका -

अशोक कुमार

पुलिस महानिदेशक, उत्तराखंड

 

 

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