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श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगडी जन्मशताब्दी वर्ष समापन कार्यक्रम

श्रद्धेय दत्तोपंतजी की जीवनीपर आधारित यह एक मॉडेल भाषण तयार किया है। हम जानते है की अनेक स्थानोंपर वक्ता उपलब्ध नही होनेसे कार्यक्रम नही होते । इस कमी को दूर करने हेतू यह प्रयास किया गया है। अनावश्यक लगता है उसे छोडकर, नवीन कुछ जोडकर, भाषण देना अपेक्षित है. 5 से 25 संख्या के गटों मे अधिकतम कार्यक्रम आयोजित हो ऐसी कल्पना है। जहां वक्ता उपलब्ध नही, ऐसे स्थानपर भी यह भाषण पढकर सुनाने का कार्यक्रम संपन्न करना अपेक्षित है। अधिकाधिक स्थानोंपर कार्यक्रम आयोजन का प्रयत्न करें यह प्रार्थना है। शेष कुशल, आपका स्नेहाकांक्षी : - धनंजय भिडे , नागपूर . राष्ट्रीय परिषद सदस्य , स्वदेशी जागरण मंच .

Snehal Joshi .
  • Nov 4 2020 3:34PM
दत्तोपंत ठेंगडी जी के जन्मशताब्दी वर्ष का समापन हो रहा है। वे क्या थे, यह समझकर हम उनके प्रतिरूप बने ऐसा प्रयास करने की आवश्यकता है। इस हेतू उनके जीवन कर्तृत्व को जानना होगा। सबसे प्रथम और महत्वपूर्ण बात, वे संघ प्रचारक थे। स्वाभाविक रूप से कोई वैयक्तिक परिवार और तत्-जन्य स्वार्थ का लवलेश भी उनमे नही था। प्रचारक की धारणा इस श्लोक से सुस्पष्ट होती है - "न त्वहम् कामये राज्यं, न स्वर्गम् न पुनर्-भवम् । कामये दुःख तप्तानाम्, प्राणी नाम आर्तीनाशनम् ।। स्वयं के लिए कुछ नही, समष्टी हेतू सर्वस्व समर्पण। 1920 मे जन्मे श्रद्धेय दत्तोपंत को बचपन से ही पढने मे रुची थी। जहां बचपन बिता और प्राथमिक शिक्षा पायी वह उनका छोटासा आर्वी यह गांव महाराष्ट्र के वर्धा जिला मे है। इस ग्रंथालय के 80 वर्ष आयू के श्री. देशमुखजी बताते है, पुस्तकालय मे उपलब्ध मराठी, अंग्रेजी और हिंदी तीनो भाषाओं मे लिखी सभी विषयों की सभी पुस्तके दत्तोपंतजीने पढ ली थी, और उस समय वे ऐसे एकमात्र छात्र थे। अत: ज्ञानभांडार भरा था, पर अपनी क्षमता जानते हुए भी लयमात्र अहंकार नही। इससे सहयोगी कार्यकर्ता ही उनका परिवार और स्नेहपात्र हो जाता था। नागपूर के लॉ कॉलेजसे, जो अब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरजी के नाम से जाना जाता है, वे विधिस्नातक LLB बने और संघ योजना से 1942 मे केरल के कोझिकोड (कालिकत) मे प्रचारक रहे। फिर बंगाल मे भी प्रचारक रहे। कम्युनिस्ट मानसिकता और कार्यपद्धती समझने का उनके लिये यह अवसर रहा। 1949 मे प्रथम संघबंदी के समय अ.भा.विद्यार्थी परिषद के गठन मे दत्ताजी डिडोळकर के साथ उनकी अहम भूमिका रही। मजदूर संगठन क्षेत्र मे राष्ट्रीय विचारधारा न के बराबर थी और वर्गसंघर्ष की साम्यवादी अवसरवादिता के मजबूत गढ को परखकर उन्होंने भारतीय मजदूर संघ का भोपाल (म.प्र.) मे गठन किया। "देशहित मे करेंगे काम, काम का लेंगे पुरा दाम" ऐसी घोषणा देनेवाले और अब विश्व में प्रथम क्रमांक के मजदूर संघटन का स्थापना काल बहुत ही चुनौतिभरा था। बद से बदतर होती किसानों की स्थिती को दत्तोपंतजी अनदेखा न कर सके और 1979 मे भारतीय किसान संघ की कोटा राजस्थान मे स्थापना की। संघ का कोई आर्थिक विचार ही नहीं है, कोई ब्लुप्रिंट नहीं है, ऐसा विरोधक कहते थे। हजारों वर्षोंसे आचार्य चाणक्य के "अर्थ एव प्रधान:" को समाहित करनेवाला "सर्वेपि सुखिन: संतु सर्वे संतु निरामया:" कहनेवाला सनातन हिंदु विचार ही संघ का आर्थिक विचार होना सहज स्वाभाविक था। उसी विचार को मा. दत्तोपंतजी ने आधुनिक शब्दावली मे प्रस्तुत किया। और फिर देश की आर्थिक समृद्धी स्थापित करने, बहुराष्ट्रीय कंपनियोंके चंगुल से भारत को बचाने, सर्वसामान्य नागरिक मे "अर्थसाक्षरता " बढाने हेतु, 1991 मे स्वदेशी जागरण मंच का गठन किया। यह अपने आपमे एक अनुठा प्रयोग है। स्व.जा मंच कोई "संगठन" है ही नही। भारत की आर्थिक स्वतंत्रता कायम रहे इस हेतू निरंतर चलनेवाला यह एक आंदोलन है। ना है संविधान, ना है सदस्यता, अत: चुनाव भी नही। सभी प्रासंगिक और वर्तमान समस्याओं के समाधान हेतू आंदोलन, यह इसकी विशेषता है। संयोजक सब देखते संभालते है। अपने क्षेत्र की कार्यसमिती बनाते है। आर्थिक क्षेत्र से संबंधित लघु उद्योग भारती, ग्राहक पंचायत, सहकार भारती, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ, आदी और विद्यार्थी परिषद जैसे सभी जनसंघटन इसके घटक है। उन संघटनाओं के कार्यकर्ता ही स्वदेशी के कार्यकर्ता है। किसी राजकीय पक्ष से कोई प्रतिबद्धता नही | किसी विचारधारा से परहेज नही। गंगा और व्होल्गा से इतना पानी बह गया है कि साम्यवादी भी, विश्व की बाद में, पहले अपने अपने देशों की चिंता करने लगे है। अत: सर्वोदयी, साम्यवादी, समाजवादी आदी सभी को साथ लेकर चलने की स्व.जा. मंच की भावना होती है। ऐसी वैचारिक दिशा के कारण स्व. जा. मंच के पहले संयोजक बने थे डॉ. मधुकर गोविंद बोकरे, जो नागपूर विश्वविद्यालय के कुलपती और कट्टर साम्यवादी थे। इन्होने "हिंदू अर्थशास्त्र" नामक ग्रंथ की रचना कर डाली। "उत्पादन शुल्क पर आधारित भाव" यह उनका आग्रह का विषय था। पूर्ण विश्व जब पूंजीवाद और साम्यवाद इन दो फाडो मे बटा था तब अपना विश्व कल्याण का जिसे तिसरा मार्ग भी है कहते, दत्तोपंतजीने "the third way " नाम से भारतीय विकल्प प्रस्तुत किया। 1964 से 1976 तक राज्यसभा सदस्य रहने वाले और 35 देशोंकी यात्रा कर 38 पुस्तके लिखनेवाले और अनगिनत विचार प्रतिप्लुत भाषण करने वाले दत्तोपंतजी इतने निस्पृह एवं निगर्वी थे कि उन्होंने पद्म पुरस्कार तक स्वीकारने को मना कर दिया था। हम सब कार्यकर्ता है। "कार्यकर्ता" नाम से ही उनकी पुस्तक सभी सामाजिक कार्यकर्ताओंके लिए सदा पाथेय रहेगी। कार्यकर्ता सामर्थ्यवान हो, व्यासंग करे, अध्ययन की तपस्या करे, परंतु तपस्या से चिडचिडा न बने। परिश्रमी और गुणवान बने, अपनी क्षमता जानकर विनम्र हो, समयदान हेतू तत्पर हो, लोकसंग्राहक हो और सर्वसाधारण हेतू सदा सहज सुलभ रहे। दत्तोपंतजी को समझना है तब dbthengadi.in इस वेबसाइट पर उनका बहुतसा साहित्य संकलित है। युट्यूब पर उनके बौद्धिक हम सुन सकते है । हमे अवश्य लाभ उठाना चाहिये। दत्तोपंत की शिक्षा को अपनाकर आदर्श कार्यकर्ता बनना, दत्तोपंतका प्रतिरूप बनने का प्रयास करते रहना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी | स्थानीय खरिदो, स्वरोजगारी बनो, जैविक कृषी अपनाओं | भारत को विश्व मे अग्रणी बनाने हेतु पर्यावरण संरक्षण और "वसुधैव कुटुम्बकम्" पर चर्चा और कृती करना ही, यह जन्मशताब्दी वर्ष मनाने का साकार रूप होगा। यही हमारा भविष्य का ध्येय होगा.

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