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मुखर्जी स्मृति- कभी डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने लोकसभा में नेहरू को बता दिया था कश्मीर का वो भविष्य जिसे आज प्रत्यक्ष देख रहा राष्ट्र. यद्दपि तब नेहरू ने नहीं दिया था ध्यान

भारत के इतिहास की कुछ ऐसी भूलें हैं जिन्हें सुधारने में बहुत समय लगेगा.

Rahul Pandey
  • Jun 23 2020 6:51AM
जवाहरलाल नेहरू के कई कार्यों के बारे में पूरा देश को बताने की जरूरत है और ना ही समझाने की जरूरत है। देश और देश भक्त बहुत हद तक यह जान चुके हैं कि नेहरू का भारत के इतिहास में कितना और क्या योगदान है। आज उनकी चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि आज श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का बलिदान दिवस है और उनका अतीत नेहरू के इतिहास के बिना पूरा होना संभव नहीं है ... देश हित और देश के मान सम्मान से जुड़ी एक बात को उन्होंने गंभीरता से लेने के बजायनेहरु ने गंभीरता से नहीं लिया और उस समय धारा 370 हटाने के बजाय सीधे सीधे श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को ही निशाने पर ले लिया था और उनका निशाना उनके बलिदान के बाद ही जा कर खत्म हुआ था . यद्दपि अमित शाह के अटल संकल्प ने उसको धो दिया ..

इनके नाम को तो दबाया ही गया इनके कामों को भी दबाया गया . ये दूरदृष्टा थे , इन्हे पता था की जिस नीति पर उस समय की तुष्टिकरण की सरकार चल रही थी उस नीति पर आने वाले समय में उसका अंजाम क्या होगा . आज बार बार पाकिस्तान की घुसपैठ और कश्मीर के लोगों का ही सेना के खिलाफ रक्तरंजित संघर्ष निश्चित तौर पर टाला जा सकता था अगर आज ही के दिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी की उठी आवाज को जवाहर लाल नेहरू ने गंभीरता से लिया होता तो .. लेकिन उन्होंने बस बातों को मज़ाकिया अंदाज़ में हंस कर टाल दिया और वही टालना बन गया था देश के कई कश्मीरी हिन्दुओ और जांबाज़ सैनिको के वीरगति की वजह..

ज्ञात हो की अगर इतिहास के पन्नो में झाँका जाय तो डा. मुखर्जी ने एक बार लोकसभा में एक जोरदार भाषण दिया और राष्ट्रीय एकता से संबंधित कई ऐसे प्रश्रों को उभारा जिनका श्री नेहरू और कई अन्य के पास कोई उत्तर न था। इस भाषण को अंग्रेजी के एक दैनिक समाचार पत्र ने इस सुर्खी के साथ प्रकाशित किया : बंगाल के शेर की संसद में गर्ज (Bengal Lion Roars in Parliament) इस भाषण में डा. मुखर्जी ने कई प्रश्नों को प्रमुखता से उभारा था.

उन्होंने उस समय जिन प्रश्नों को उभारा उनमें यह भी शामिल था कि अगर भारत का संविधान देश के करोड़ों लोगों के लिए लाभदायक हो सकता है तो कश्मीर के कुछ लाख लोगों के लिए हानिकारक कैसे बन सकता है? उन्होंने यह भी कहा कि विचित्र बात है कि कश्मीर के लोगों को देश के सभी भागों में समान अधिकार प्राप्त होंगे किन्तु शेष भारत के लोगों को अधिकार तो दूर की बात, वहां जाने के लिए वीजा प्राप्त करना पड़ेगा।

डा. मुखर्जी के इन प्रश्नों का कोई उत्तर न था। अंतत: श्री नेहरू को यह कहना पड़ा कि राज्य के लोगों को अलग दर्जा देने वाली धारा 370 समय के साथ घिसते-घिसते घिस जाएगी। किन्तु इसे विडम्बना ही कहना चाहिए कि छ: दशकों से भी अधिक का समय बीत जाने के पश्चात भी यह अस्थायी धारा भारत के संविधान में मौजूद थी और अलगाववाद के स्वर ऊंचा करने वाले इस धारा को राज्य और भारत के बीच एक पुल का दर्जा देने में लगे थे। इनमें कई कांग्रेसी नेता भी शामिल थे जो इसको हटाए जाने का विरोध कर रहे हैं ।

लोकसभा में अपने लाजवाब विचारों को प्रकट करने के पश्चात डा. मुखर्जी ने स्वयं जम्मू में आकर परिस्थितियों का जायजा लेना चाहा क्योंकि लोगों के साथ अन्याय से संबंधित कई शिकायतें उनके पास पहुंच रही थीं और पं. प्रेमनाथ डोगरा श्यामा बाबू के साथ लगातार सम्पर्क बनाए हुए थे। लेकिन बाद में उनकी जेल में संदिग्ध मौत हो गयी जिसका असली इतिहास आज तक किसी को नहीं पता चला है . आज उस दिन को हुई ऐतिहासिक भूल को करने वाले और उसको याद दिलाने वाले दोनों को याद करने का समय है और विचार करने का समय है की किस ने देश के लिए क्या किया ..

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