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कमजोर नहीं है महाराष्ट्र पुलिस.. इसी पुलिस ने तथाकथित वीरता दिखाते हुए तोड़ डाली थी साध्वी प्रज्ञा की रीढ़ , कर्नल पुरोहित की हड्डियाँ और मेजर उपाध्याय की नसें. भला ये क्यों बचाती संतों को

इतिहास के बारे में जानिये , क्या है इसी पुलिस का इतिहास.

Sudarshan News
  • Apr 23 2020 9:02PM
यदि आप अपने हाथों से साधुओं को भीड़ या दूसरे शब्दों में कहें तो मौत के हवाले कर देने वाली महाराष्ट्र पुलिस को कमजोर समझ रहे हैं तो आपकी गलती है. हां यह अलग बात है कि इसकी ताकत की असली नुमाइश साधुओं पर ही होती है. इस महाराष्ट्र पुलिस की ताकत अगर देखनी है तो थोडा इतिहास में जाना पड़ेगा और किसी भगवाधारी को सामने खड़ा करिए, तो शायद अपनी ताकत का एहसास तुरंत ही करा देगी. ये बात बहुत ज्यादा पुरानी नहीं है, मालेगांव ब्लास्ट के नाम पर ताबड़तोड़ हुई गिरफ्तारियों में कर्नल श्रीकांत पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की गिरफ्तारी इसी महाराष्ट्र पुलिस ने की थी. अपने पूरे जीवन भर भारत की सेना में सेवाएं देने वाले मेजर रमेश उपाध्याय की भी गिरफ्तारी इसी महाराष्ट्र पुलिस ने की थी.

इस मामले में अंतहीन प्रताड़ना झेलने वाले कर्नल श्रीकांत पुरोहित को भारत का नया जेम्स बॉन्ड कहा जाता था, जिन्होंने अपने खुद के दम पर हूजी नाम के इस्लामिक आतंकी संगठन को खत्म करने के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्ही जांबाज़ कर्नल श्रीकांत पुरोहित साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और मेजर रमेश चंद्र उपाध्याय के खिलाफ इसी महाराष्ट्र पुलिस ने वह क्रूर रूप दिखाया था जो आज  भी जन - जन के दिल और दिमाग में वह दास्तान ज्यों की त्यों याद है. साध्वी प्रज्ञा की रीढ़ की हड्डी मार - मार कर इसी महाराष्ट्र पुलिस ने तोड़ दी थी. कई आतंकियों को अपने पैरो तले कुचल चुके कर्नल श्रीकांत पुरोहित के पैरों की हड्डी भी इसी महाराष्ट्र की पुलिस ने बेरहमी से तोड़ डाली थी. मेजर रमेश चंद्र उपाध्याय के साथ में जो निर्ममता की गई थी उसको मेजर रमेश उपाध्याय ने खुद ही सुदर्शन न्यूज़ को बताते हुए कहा था कि किसी विदेशी आतंकी के साथ में भी संभवत भारत के पुलिस ऐसा ना करती.

लेकिन जब बात आई थी पालघर में हिंसक भीड़ से संतों को बचाने की तो वहीं महाराष्ट्र पुलिस 17 जवान होने के बावजूद भी ज्यों की त्यों खड़ी रही . यहाँ तक कि हिल भी नहीं पाई अपनी जगह से. और तो और उसने अपने खुद के हाथों से संतों को उनका खून पीने के लिए उतावली भीड़ को सौंप दिया. संतो के मृत शवों तक को उसी महाराष्ट्र पुलिस के सामने बेरहमी से पीटा गया और वही महाराष्ट्र पुलिस खड़ी हो कर तमाशा देखती रही. असल में महाराष्ट्र पुलिस कमजोर बिल्कुल भी नहीं है लेकिन शायद उसकी वीरता और उसका साहस आप सिर्फ और सिर्फ भारत के संतों के खिलाफ और भारत की सेना के सैनिकों के खिलाफ ही देख पाएंगे. 

जब बात उन्ही संतो की हत्या करने के लिए उन्मादी भीड़ की होगी तो महाराष्ट्र पुलिस को आप ठीक उसी रूप में पाएंगे जिस रूप में आप ने पालघर में हाथ छुड़ा के और हाथ झटक के और फिर को अपने हाथों से देते देखा था. इस पुलिस को किस आधार पर विश्व की दूसरे नंबर की पुलिस गिना गया यह एक बहुत बड़ा सवाल है ? निश्चित रूप से ऐसा गिनने वाले भी उसी सोच उसी मानसिकता के होंगे जिन्होंने कभी इसी महाराष्ट्र पुलिस के इन्हीं अत्याचारों के समर्थन में भगवा आतंकवाद जैसे शब्द बोले थे. इस मामले में सबसे खास बात यह है कि आज वही लोग इस पुलिस के मुखिया हैं. इसी से अपने आप समझा जा सकता है कि संतों की या सनातनी की रक्षा कैसे हो पाएगी महाराष्ट्र में ? 

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