सुदर्शन के राष्ट्रवादी पत्रकारिता को सहयोग करे

Donation

7 मार्च- सन 321 में आज से ही शुरू हुई थी रविवार अर्थात Sunday की छुट्टी.. जानिए उस ईसाई शासक के बारे में जिसकी प्रथा आज भी ढो रहा सेक्युलर समाज

बहुत कम ही लोगों को पता हो आज के इतिहास के बारे में..

Rahul Pandey
  • Mar 7 2021 11:41AM

शिक्षा के भगवाकरण की तमाम दुहाईयाँ आप ने सुनी होंगी . महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी का इतिहास पढ़ाना भारत के राजनेताओं के हिसाब से शिक्षा का भगवाकरण बताते भी सुना होगा . स्कूलों में परमपिता परमात्मा से अपने जीवन को सफल बनाने की मांग करना भी हिंदुत्व को बढ़ावा देने की बातें भी आपके कानों में आई रही होंगी .. 

अभी कुछ समय पहले पवित्र श्रीमद्भागवत गीता के श्लोकों को भी स्कूलों में पढाने के खिलाफ लामबंदी देखी होगी आप ने .. उपरोक्त सभी के पीछे दलील दी जाती है कि भारत एक सेकुलर देश है जिसमे किसी मत मजहब या धार्मिक नियमों से नहीं बल्कि भारत के सेकुलर संविधान के हिसाब से कार्य होंगे .. 

यहाँ तक कि कुछ स्टाफ पर कार्यवाही केवल इसलिए कर डाली गयी है कि वो आफिस में तिलक लगा कर जाते थे यद्दपि नमाज़ के लिए पार्कों तक की मांग होती रही . लेकिन जब बात ये आती है कि कर्मचारियों को साप्ताहिक अवकाश रविवार को ही क्यों दिया जाता है तो उस पर खामोशी छा जाती है .

ज्ञात हो कि रविवार के अवकाश के पीछे का इतिहास आज से शुरू होता है . रोमन साम्राज्य के शासक कांटेसटाईन प्रथम ने वर्ष 321 ईसवी में इसकी शुरुआत करवाई थी . इसकी मान्यताये भी ईसाइयत से जुडी हुई थीं . उसके बाद इसको एक ईसाई शासक के आदेश के तहत पूरी दुनिया भर में फैलाया गया . 

भारत में जब तक हिन्दू सम्राटो का शासन रहा तब तक ये भारत में लागू नहीं हो पाई थी और तब भारत में वैदिक नियमो से कार्य होते रहे थे. लेकिन जब भारत में ब्रिटिश शासन आया तब से भारत में रविवार की छुट्टियाँ लागू कर दी गयी जिसके मूल में सन 321 में ईसाई परम्परा से जारी हुआ रोमन सम्राट कांटेसटाईन का आदेश ही था . 

यद्दपि भारत को आज़ाद करवाने का दम्भ भरने वालों ने बाद में भारत को एक ऐसे सेकुलर मुल्क के रूप में स्थापित करना चाहा जिसमे सबसे ज्यादा उपेक्षा बहुसंख्यक हिन्दू समाज की ही रही .. सेकुलर देश बनने के बाद भी उनको ईसाई परम्परा के हिसाब से रविवार के अवकाश का पालन करने में किसी प्रकार की दिक्कत नहीं आई और आज भी वो उसी अंदाज़ में लागू है जिस अंदाज़ में ये वर्ष 321 में शुरू हुआ था . 

लेकिन किताबों में श्रीराम , श्रीकृष्ण , गीता , रामायण के एक भी शब्द जोड़ने को शिक्षा का भगवाकरण कहने वालों ने आज तक कभी ईसाई मत के इस परम्परा पर एक भी शब्द नहीं बोला है जो ये साबित करता है कि उनके खुद से रचे गये सेकुलरिज्म के सिद्धांतों में सबसे बड़ी रुकावट हिन्दू समाज , उसके संस्कार , उसकी मान्यताएं , उसके रीति रिवाज़ आदि ही हैं.

सवाल ये है कि क्या आगे इस पूरी व्यवस्था में सुधार या बदलाव की संभावना है ? या आगे भी लम्बा समय तक तक चलता रहेगा इसी प्रकार से अंधानुकरण ? प्रश्न ये भी है कि अवकाश के साथ अवकाश पाने वालों को ये जानने क्यों नही दिया गया कि उनको मिल रहे अवकाश का इतिहास क्या है..

भारत में आज भी विवाह से ले कर तमाम शुभकर्म सनातनी वैदिक गणना से किये जाते हैं. तमाम विधि विधान के लिए वैदिक गणना के जानकार ज्योतिषियों की सहायता ली जाती है. ऐसे में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर उन तमाम नियमो का अंधानुकरण क्यों किया जा रहा है जो कहीं से भी भारत की परम्परा से कोई सम्बन्ध नही रखते..

सुदर्शन न्यूज़ भारत की धर्मपरायण जनता से एक बार फिर से अपने मूल सिद्धांतो और परम्परा की तरफ लौटने की अपील करता है और भटकाव से वापस फिर से सही राह पर आने में हर प्रकार से सहायता का संकल्प भी लेता है.. आशा ये भी है कि वर्तमान में हरिद्वार में चल रहे कुम्भ में पूज्यनीय साधू संतो द्वारा इस पर गहन मंथन और तदुपरांत क्रियान्वयन अवश्य किया जाएगा.

 

सहयोग करें

हम देशहित के मुद्दों को आप लोगों के सामने मजबूती से रखते हैं। जिसके कारण विरोधी और देश द्रोही ताकत हमें और हमारे संस्थान को आर्थिक हानी पहुँचाने में लगे रहते हैं। देश विरोधी ताकतों से लड़ने के लिए हमारे हाथ को मजबूत करें। ज्यादा से ज्यादा आर्थिक सहयोग करें।
Pay

ताज़ा खबरों की अपडेट अपने मोबाइल पर पाने के लिए डाउनलोड करे सुदर्शन न्यूज़ का मोबाइल एप्प

1 Comments

धन्यवाद इस आवश्यक जानकारी के ऊपर लेख लिखने के लिए । सम्पूर्ण राष्ट्र में रविवार के दिन अवकाश को समाप्त कर देनी चाहिए

  • Guest
  • Mar 16 2021 4:19:06:707PM

संबंधि‍त ख़बरें

ताजा समाचार