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अखंड भारत के प्रबल पक्षधर थे नाथूराम गोडसे जिनकी अस्थियां भी कर रही हैं प्रतीक्षा.. गांधी को मारा था राष्ट्र विभाजन के गुस्से में

वो इतिहास जिसकी चर्चा किये बिना अधूरा है आज का दिन.

Rahul Pandey
  • Aug 14 2020 9:09AM
अखंड भारत दिवस पर अगर निष्पक्षता से विचार किया जाय तो ऐसे कई नाम निकलेंगे जिन्होंने इस स्वप्न के साथ जीवन बिताया अथवा इसी स्वप्न के लिए जीवन का बलिदान कर दिया... बाला साहेब ठाकरे , डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी , वीर सावरकर  जैसे अनगिनत नाम ऐसे हैं जिन्होंने हिंदुओं को बार बार प्रेरणा दी कि वो अखंड राष्ट्र को भगवा ध्वज के तले फिर से लाएं और उन्ही महापुरुषों का ही आज  सत्कर्म है जो देश को अपना असली इतिहास याद रहा और अखंड भारत की संकल्पना ज्यों की ज्यों जीवित है..

अगर बात थोड़ा हट कर की जाय तो अखंड भारत जैसे शब्द के साथ एक नाम और जुड़ा है जो सँभवतः सदा जुड़ा भी रहे.. यद्द्पि वामपंथी कलमकारों ने अपनी तरफ से हर प्रयास कर डाले सत्य को बदलने के लिए..हालांकि वो कई दशक तक अपने मंसूबों में कामयाब भी रहे थे पर कहा जाता है कि साँच को आंच नही. जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे वैसे लोगों को ऐसी बहुत चीजें जानने को मिली जो एकदम नई और अप्रत्याशित थीं.. उन्ही अनगिनत अप्रत्याशित बातों में एक नाम है नाथूराम गोडसे का जिनका एक ही पक्ष हमेशा आगे रखा गया..

गोडसे द्वारा गांधी की हत्या के बाद देश का धर्मनिरपेक्ष वर्ग एकजुट हो गया था और गोडसे शब्द तक को संसद में असंसदीय घोषित कर दिया गया जो मोदी सरकार में जा के खत्म हुआ..यकीनन आज के स्वघोषित धर्म निरपेक्ष माहौल में संसद पर हमला करने वाले दरिन्दे अफजल गुरु की बरसी मनाना एक संवैधानिक अधिकार माना जाता हो . लाखों निर्दोषों के हत्यारे लेनिन , चे ग्वेरा, फिदेल कास्त्रो आदि की मूर्तियाँ भारत में लगाये रखने के संघर्ष होते हो , आज भी भारत के कई कोनो में पाकिस्तान के लिए पटाखे फूटते हों , सैनिको पर पत्थर मारे जाते हो , दुर्दांत आतंकी बुरहान वाणी के लिए नारे गूंजते हों जिसको न सिर्फ नेताओं बल्कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग संगीत जैसे आनंद से आराम से सुन कर आनंद लेता हो लेकिन एक नाम ऐसा भी है जिसको मात्र हिन्दू समाज को कटघरे में खड़ा करने के लिए ऐसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया जैसे अब तक के स्वतंत्र भारत में गलती सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति ने की हो और वो है नाथूराम गोडसे.

इस देश मे अलगाव की बात करने वालों को Z सुरक्षा दी जाती रही, राष्ट्र के रक्षको को घायल करते पत्थरबाज़ों को पुचकारा जाता रहा, दुर्दांत आतंकियों के लिए आधी रात अदालतें लगती रहीं , बौद्धों की हत्या कर के दूसरे देश से आये कातिलों को बसाया जाता रहा लेकिन सिर्फ एक नाम से इतनी चिढ़ बनाये रहे कि 75 साल से उसको ही नफरत का प्रतीक घोषित किये रहे..कम लोगों को पता है कि कश्मीर के कुख्यात आतंकियों तक के शव उनके परिवार को दे दिया जाता है जिसमे सेना विरोधी, भारत विरोधी नारे लगते हैं और आतंकी उन्हें बन्दूकों की सलामी देते हैं लेकिन नाथूराम गोडसे का शव इन्ही तथाकथित मानवता के ठेकेदारों ने उनके घर वालों को नही दिया था बल्कि तत्कालीन सरकार के आदेश पर जेल के अधिकारियों ने घग्घर नदी के किनारे पर उन्हें जला दिया था ..

इस देश मे अलगाव की बात करने वालों को Z सुरक्षा दी जाती रही, राष्ट्र के रक्षको को घायल करते पत्थरबाज़ों को पुचकारा जाता रहा, दुर्दांत आतंकियों के लिए आधी रात अदालतें लगती रहीं , बौद्धों की हत्या कर के दूसरे देश से आये कातिलों को बसाया जाता रहा लेकिन सिर्फ एक नाम से इतनी चिढ़ बनाये रहे कि 75 साल से उसको ही नफरत का प्रतीक घोषित किये रहे..कम लोगों को पता है कि कश्मीर के कुख्यात आतंकियों तक के शव उनके परिवार को दे दिया जाता है जिसमे सेना विरोधी, भारत विरोधी नारे लगते हैं और आतंकी उन्हें बन्दूकों की सलामी देते हैं लेकिन नाथूराम गोडसे का शव इन्ही तथाकथित मानवता के ठेकेदारों ने उनके घर वालों को नही दिया था बल्कि तत्कालीन सरकार के आदेश पर जेल के अधिकारियों ने घग्घर नदी के किनारे पर उन्हें जला दिया था.

1 नवंबर 1947 को गोडसे के अखबार ‘हिंदू राष्ट्र’ के नए कार्यालय का उद्घाटन कार्यक्रम रखा गया. इस कार्यक्रम में पुणे (तब का पूना) के तमाम प्रतिष्ठित लोगों और खासकर हिंदुवादी नेताओं को आमंत्रित किया गया था. उस शाम गोडसे ने अपने भाषण में बंटवारा का पूरा ठीकरा गांधी के सिर पर फोड़ा. इतिहासकार डोमिनिक लॉपियर और लैरी कॉलिन्स अपनी किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखा है कि हैं, “गोडसे ने गरजकर कहा, भारत माता के दो टुकड़े कर दिये गए हैं. गिद्ध मातृभूमि की बोटियां नोच रहे हैं. कितनी देर कोई यह सहन करेगा?”

सीनियर बीजेपी लीडर और कद्दावर शख्सियत राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी ने संसद में मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या पर खुली चर्चा कराने की पैरवी की है। कहना न होगा कि गाहे-बगाहे स्वामी ने क़रीब सात दशक पुराने गांधी हत्याकांड के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। दरअसल, गांधी की हत्या से जुड़े कई पहलू ऐसे हैं, जिन पर आज तक कई वर्षो के बाद कभी चर्चा तक नहीं हुई। लिहाज़ा, यह सुनहरा मौक़ा है, जब उस घटना के हर पहलू की चर्चा करके उसे सार्वजनिक किया जाए और देश के लोगों का भ्रम दूर किया जाए कि आख़िर वास्तविकता क्या है और देश जान सके कि आखिर गाँधी की हत्या क्यों और किस परिस्थिति में गोडसे ने की ?

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4 Comments

Ha nathuram godse sahi the des bata gaya nahi bTna chahiye tha unki fansi ke bad unka family ko kitana sahna pada hoga

  • Guest
  • Aug 16 2020 12:24:36:347PM

और भारत विभाजन के बाद गांधी की गैर-हिंदू तुष्टिकरण की नीतीयो के विरोधी थे पंडित नाथूराम जी उनको क ई और पाकिस्तान के लिए १९४७ वाला कुचक्र भविष्य में पुनः रचने की संभावना व पाक से आ रहे हिंदुओं का कत्कीले आम लूटपाट और गांधी का चुप रहना व गैर हिंदू ओ के पक्ष में खड़ा रहना महाअन्याय लगा और यही भविष्य का परिदृश्य उनका विचार और डर था जो वर्तमान में भी हम ७४ सालों से भुगथ्त रहे कथित आजादी के बाद देश इस्राम के नाम पर खंडित होने के बाद भी

  • Guest
  • Aug 14 2020 11:20:24:150AM

सुरेश जी ये जो आज तक मुगल-अंग्रेजी आक्रांताओं के चंगुल और अंग्रेज- गांधी-नेहरू-गैरहिंदू -कम्यूनिस्ट गठजोड़ के काल में पढ़ाया लिखाया गया ये इतिहास नहीं एक राष्ट्र और उसके मूल धर्म के साथ महा अपराध है इतिहास का एक पहलू ही दिखाना अपराध हिंद में तो सिर्फ इनलोगो और सनातन के विरुद्ध नेरेटिव परोस कर कई पीढ़ियों के मनोमष्तिक को विकृति युक्त कर दिया पंगु कर दिया मानसिक सामाजिक कानूनी व तार्किक व बोद्धिक रूप से हिंद की जनता सचे इतिहास पर वाद चाहती है निष्पक्ष इतिहास चाहती है और इतिहास वही कहलाता है जो सच या सच के करीब सच को छुपा उसपे गढ़े किस्से कहानियां नहीं ऐसु चर्चा है हुतात्मा पंडित नाथूराम जी की गांधी वध की योजना थी न के हत्या जैसा स्वामी जी का कहना है के शायद वध नहीं हुआ हत्या नहीं हुई शायद गांधी की और हत्या में सबसे पहला शक उसी पर जाता है जिसे हत्या का सबसे ज्यादा फायदा जैसा के सर्वविदित है सर्वसम्मति से सरदार पटेल प्रधानमंत्री पद के लिए सब की पसंद थे और नेहरू प्रधानमंत्री पद पर कब्जा जमाना चाहता था इस समस्या का समाधान के लिए गांधी ने कांग्रेस को खत्म करने की ठान ली पर गांधी कांग्रेस के खात्डमे के बाद सरदार पटेल का प्रधानमंत्री बनना सुनिश्चित था पर गांधी की कांग्रेस को खत्म करने की घोषणा से पहले ही गांधी की हत्या हो गई शायद वध नहीं गाहे बगाहे पुराने लोगों की कहीं इतिहासिक बातें और घटनाओं का जिक्र कहीं न कहीं आ जाता है ऐसा सुनने में आया के गांधी वध का प्रयास पंडित नाथूराम जी ने पहले भी किया परन्तु वो विफल हो गया अगर वो सफल हो गया होता तो जवाहर प्रधानमंत्री नहीं बनता और दूसरा प्रयास जब करा उस समय ही गांधी हत्या हो गई मैं गांधी का प्रशंसक नहीं बल्कि उसकी गैर-हिंदू तुष्टिकरण नीतियों का विरोधी व आलोचक हूं काश गांधी की हत्या जैसा इल्जाम लगाया गया उस समय जो संशय में है के वो पंडित नाथूराम जी द्वारा नहीं हुआ किसी और के हाथों हुआ का दूसरा प्रयास उस समय न हुआ होता तो शायद नेहरू प्रधानमंत्री न बना पाता खुद को क्योंकी गांधी कांग्रेस को खत्म करने की घोषणा करने वाला था और फिर सरदार पटेल के साथ में हिंद की कमान आना सुनिश्चित था मतलब दूसरे प्रधानमंत्री सरदार पटेल होते

  • Guest
  • Aug 14 2020 11:08:21:380AM

Godse was real hero

  • Guest
  • Aug 14 2020 10:48:31:120AM

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