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क्या भारत के नेताओं को "सोशल डिस्टेंसिंग" का चैप्टर पढ़ने की ज़रूरत है ?

बीते सप्ताह की बात करें तो भारत में 7 अक्टूबर को कुल 72059 केस निकले, तो वहीं 8 अक्टूबर को 78524 पॉज़िटिव केस निकले। यह मामला यहीं नहीं रुका, अगले तीन दिनों में क्रमश: 70496, 73272, और 74383 केस मिले।

Abhishek Lohia
  • Oct 18 2020 8:30PM

पूरा विश्व कोविड-19 महामारी से जूझ रहा है, यह सत्य कि कोविड सिक्के का एक पहलू है लेकिन भारत अभी भी राजनीतिक घेराबंदी और अनर्गल बातों से भी जूझ रहा है। जब भी कभी लगता है कि इस देश के जुझारू नागरिकों में कोरोना वायरस नामक महामारी के प्रति जागरूकता आएगी, तभी कुछ-ना-कुछ ऐसी घटना घट जाती है, जिससे लगता है कि भोलेभाले भारतवासी को शायद को लगता है कि गोबर को शरीर में लगाने से इस महामारी का इलाज हो जाएगा।

ताज़ा उदाहरण बिहार से

पूरा देश जानता है कि बिहार में विधानसभा चुनाव हैं। चुनाव की घोषणाओं के साथ-साथ चुनाव आयोग ने कोरोना वायरस की सभी नियमित गाइडलाइन्स को पालन करने का भी आदेश दिया है लेकिन इन सबके बीच भी नेता इन सब नियमों को ताक पर रखकर जमकर प्रचारबाज़ी में जुट गए हैं।

इसकी शुरुआत किसी और ने नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी पार्टी यानि कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा ने कर दी है। गया के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में जनसभा को संबोधित कर जे पी नड्डा कैंपेनिंग का आगाज़ तो कर गए लेकिन वो यह भूल गए कि आज कल इस देश में राजनीति के साथ-साथ कोरोना भी अपने चरम पर है।

भाजपा की इस जनसभा में सोशल डिस्टेंसिंग की जमकर धज्जियां उड़ती दिखीं। नड्डा को देखने और सुनने के लिए भारी संख्या में जनता उमड़ी। भाजपा की इस रैली में उमड़ी भीड़ ने भारत सरकार को कई सवालों के घेरे में ला खड़ा किया।

  1. क्या कोरोना वायरस भारत में खत्म हो गया है?
  2. क्या इस जनसभा में आए सभी लोगों की पहले जांच हुई थी?
  3. क्या सोशल डिस्टेंसिंग महज़ एक शब्द है, वह भी आम जनता के लिए?
  4. यदि इस जनसभा के बाद बिहार में कोरोना की स्थिति बिगड़ती है, तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
  5. महत्वपूर्ण क्या है, व्यक्ति का जीवन या नेताओं की रैली?

हालांकि इस कड़ी में भाजपा अकेली ऐसी पार्टी नहीं है, जो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं कर रही। काँग्रेस, तृणमूल काँग्रेस, स्वराज इंडिया और अकाली दल भी इसी रीत का अनुपालन कर रही हैं।

उदाहरण के तौर पर आप इस बात को ऐसे समझें कि जब से अनलॉक की घोषणा की गई है, तब से देश के तमाम बड़े नेता प्रदर्शन के नाम पर राजनीतिक मंच खोजते नज़र आ रहे हैं। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि उससे पूर्व के बीते तीन महीनों में इस देश में पूर्ण लॉकडाउन था। फिर चाहे वह राहुल गाँधी का ग्रेटर नोएडा में पुलिस के साथ असहयोग हो या बंगाल में ममता बनर्जी की रैली।

दोनों ही जगह खूब भीड़ देखने को मिली। इस दौरान इन ड्रामों में ना तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हुआ और ना ही नेताओं में कोरोना के प्रति कोई खास डर दिखा।

वर्तमान आंकड़े सचेत रहने की तरफ इशारा करते हैं

बीते सप्ताह की बात करें तो भारत में 7 अक्टूबर को कुल 72059 केस निकले, तो वहीं 8 अक्टूबर को 78524 पॉज़िटिव केस निकले। यह मामला यहीं नहीं रुका, अगले तीन दिनों में क्रमश: 70496, 73272, और 74383 केस मिले। इसी दौरान देश में कुल 4765 लोगों की मौत (7 से 11 अक्टूबर में) हुई। यानि हर घंटे तकरीबन 40 लोगों को अपनी जान इस जानलेवा महामारी के चलते गंवानी पड़ी।

सोशल डिस्टेंसिंग के पालन को लेकर नेता ट्विटर पर अकसर ज्ञान देते हुए नज़र आते हैं। अगर वही इसका पालन नहीं करेंगे तो इसको क्या समझा जाए? क्या यह महज़ एक ढकोसलेबाज़ी है? इस बात की अगर जनता सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं करे तो उस पर महामारी अधिनियम 188 के तहत कार्रवाई और अगर नेताजी करें तो चुनाव प्रचार।

फिलहाल भारत में कोरोना के कुल मामले 72 लाख का आंकड़ा पार कर चुके हैं। वहीं, बिहार में यह आंकड़ा 2 लाख की संख्या को छूने जा रहा है। बिहार में आगामी 28 अक्टूबर को प्रथम चरण की वोटिंग होगी, वहीं 10 नवंबर को चुनाव का परिणाम घोषित किया जाएगा।

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