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चीन और तालिबान के बीच हुई मुलाकात का भारत पर कितना असर

पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जाहिद हफीज चौधरी ने बयान दिया है कि 'हमारा मानना है कि अफगानिस्तान के पड़ोसी देश होने के नाते चीन की अफगान शांति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका है'।

Geeta
  • Jul 30 2021 4:30PM
तालिबान और चीन के बीच 28 जुलाई को एक मुलाक़ात हुई थी. मुलाकत में चीन के विदेश मंत्री वांग यी और तालिबान के एक प्रतिनिधिमंडल शामिल थे. वहीँ अब पकिस्तान ने तालिबान और चीन के बीच हुई इस मुलाकात को महत्वपूर्ण बताते हुए इसका स्वागत किया है जहाँ पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जाहिद हफीज चौधरी ने बयान दिया है कि 'हमारा मानना है कि अफगानिस्तान के पड़ोसी देश होने के नाते चीन की अफगान शांति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका है'।

जानकारों ने बताया कि यह बातचीत अफगानिस्तान में शांति और सुलह और पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट सहित अन्य आतंकी समूहों के साथ तालिबान के संबंधों पर केंद्रित थी। वहीँ पाकिस्तान ने यह भी कहा है कि 'पाकिस्तान, अफगानिस्तान का एक करीबी पड़ोसी देश है, और एकमात्र ऐसा देश है जिसने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया है कि अफगान संघर्ष का कोई सैन्य समाधान नहीं है।

बीते दिनों भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बयान जारी कर कहा था कि, 'पिछले दो दशकों में अफगान नागरिक समाज, विशेष रूप से महिलाओं, अल्पसंख्यकों और सामाजिक स्वतंत्रता के अधिकारों को मिले लाभ स्पष्ट हैं। अफगानिस्तान को कभी भी आतंक का घर नहीं होना चाहिए और न ही शरणार्थियों का स्रोत बनना चाहिए।'

विदेश मंत्री एस जय शंकर ने कहा कि शांति वार्ता को सभी पक्षों द्वारा गंभीरता से लिया जाना चाहिए। दुनिया अफगानिस्तान को एक स्वतंत्र, संप्रभु, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तौर पर देखना चाहती है। यह तभी संभव है जब यह दुर्भावनापूर्ण प्रभाव से मुक्त हो। चीन और तालिबान के बीच यह मुलाकत इसलिए भी ख़ास है क्योंकि अगर तालिबान ने अफगानिस्तान पर अपना कब्ज़ा जमा लिया या वहां अपनी सरकार कायम कर ली तो भारत को बेहद ही नुक्सान का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि भारत ने अफगानिस्तान में अपने कई निवेश कर रखे है जो कि अगर तालिबान का कब्ज़ा होगा तो भारत का निवेश डूब जाएगा। 

 

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