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जनवरी 2020 में UP पुलिस को क्रूर बताते हुए कांग्रेस गई थी मानवाधिकार आयोग... कानपुर में उसी पुलिस से इतना प्रेम कैसे

अचानक ही आया ये बदलाव या इसमे भी है कुछ राजनीति ?

Rahul Pandey
  • Jul 4 2020 11:51AM

कानपुर मामले में जिस प्रकार से पुलिस के वीरों ने बलिदान दिया   उसके बाद पूरे देश से उनके प्रति सहानुभूति और अपराधियों के प्रति आक्रोश साफ देखा जा सकता है लेकिन इस बीच में कहीं कुछ तो ऐसा है जो राजनीति की तरफ साफ तौर पर इशारा करता है यदि उसको समझने का प्रयास करेंगे तो हमें इसी साल अर्थात 2020 के जनवरी माह में जाना होगा।यह बात ज्यादा समय पहले की नहीं है। घटना भी इसी 2020 की है जब सीएए और एनआरसी विरोध प्रदर्शन के नाम पर देश के विभिन्न हिस्सों में मजहबी उन्माद और दंगे जैसे हालात बनाए गए थे।

जगह-जगह सड़कों को घेरा जा रहा था और लोगों का आवागमन बाधित करने के साथ-साथ सरजील इमाम जैसे आतंकियों ने तो यहां तक साजिश रच डाली थी कि आसाम और सिक्किम के पास पडने वाला स्थान भारत के अन्य हिस्सों से काट देना है। यद्यपि धीरे-धीरे इसके तमाम परतें खुली और अपराधी व आतंकी अपने तमाम नापाक मंसूबों के साथ जेल भेज दिए गए। खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन घटनाओं को संयोग नहीं बल्कि एक प्रयोग बताया था। यद्यपि CAA और NRC के नाम पर हिंसा देश के हर हिस्से में की गई लेकिन उसको सबसे ज्यादा प्रभावी ढंग से काबू किया उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिनके समय काल में उत्तर प्रदेश पुलिस ने अदम्य साहस का परिचय दिखाते हुए प्रदेश को दंगाई और मजहबी उन्माद जैसे हालातों से दूर रखा।

ताबड़तोड़ लाठियां बरसी,  कई दंगाई जेल भेजे गए और कुछ अपने ही हथियार से आपसी विवाद में मारे गए . यद्यपि यह हथियार वह थे जिनको भारत के आम जनमानस पर प्रयोग करने के लिए सहेजा गया था , पर पुलिस ने उन तमाम नापाक मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया । लेकिन उसके बाद कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश पुलिस की शिकायत मानवाधिकार से करते हुए राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ अभिषेक मनु सिंघवी को लेकर मानवाधिकार आयोग से उत्तर प्रदेश पुलिस के खिलाफ शिकायत की थी । अपनी शिकायत में उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश पुलिस का रवैया अमानवीय है।

असल में उत्तर प्रदेश पुलिस ने प्रदेश को जलने से बचाया था बरसते पत्थरों के बीच में खुद को आगे कर कर प्रदेश की जनता का बाल भी बांका नहीं होने दिया था लेकिन उसके बावजूद भी सवाल यहां तक उठाए गए की पुलिस की तरफ से कोई घायल क्यों नहीं हुआ ? सवाल यह भी उठाए गए थे कि पुलिस वालों पर f.i.r. क्यो नही की गई है ? सीना ठोक कर दंगाइयों का समर्थन किया गया और पुलिस के बलिदान पर सवाल उठे , फिर भी पुलिस ने अपना काम किया। आज उत्तर प्रदेश पुलिस के 8 वीरों के Kanpur में हुए बलिदान के बाद जिस प्रकार से राजनीति करते हुए पुलिस वालों को शहीद बताने की होड़ मची हुई है उसकी वास्तविकता यदि देखनी है तो थोड़ा सा पहले इतिहास में जनवरी 2020 के आसपास जाना होगा। निश्चित तौर पर देश प्रदेश या जनमानस की सुरक्षा कभी भी राजनीति का विषय नहीं होनी चाहिए लेकिन ऐसा हुआ है .

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