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18 अप्रैल- बलिदान दिवस पर नमन है क्रांतिवीर दामोदर हरी चापेकर जी को, जिन्होंने अत्याचारी अंग्रेज अफसर रेंड का वध कर आज ही चूमा था फांसी का फंदा

ये चर्चा आजादी की थी जिसकी बार बार कुछ लोगों द्वारा ठेकेदारी ली जाती है और दूसरों पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया.

Sudarshan News
  • Apr 18 2020 11:59AM
जिस नाम का उल्लेख भारत के वर्तमान प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भरी संसद में पूर्ववर्ती सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए किया था और कहा था कि इनको भुला दिया गया क्योकि चर्चा में केवल एक ही परिवार को केन्द्रित रखना था . ये चर्चा आजादी की थी जिसकी बार बार कुछ लोगों द्वारा ठेकेदारी ली जाती है और दूसरों पर आरोप लगाया जाता है कि उन्होने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया . असल में आज़ादी के असली सूर्यो कोई भुला देने का महापाप केवल एक ही प्रकार और प्रवित्ति के लोगो द्वारा किया गया है जिसका सच हर हाल में जानना जरूरी है आम जनता को .

विदित हो कि चाटुकार इतिहासकारों और झोलाछाप कलमकारों द्वारा भुला दिए गये तमाम क्रांतिवीरों में से एक हैं आज अमरता को प्राप्त करने वाले दामोदर हरी चापेकर जी. दामोदर हरि चाफेकर उस बलिदानी परिवार के अग्रज थे, जिसके तीनों पुष्पों ने स्वयं को भारत माँ की अस्मिता की रक्षा के लिए बलिदान कर दिया. आज़ादी की आज़ादी की लड़ाई में प्रथम क्रांतिकारी धमाका करने वाले वीर दामोदर हरी चापेकर का जन्म 24 जून, 1869 को महाराष्ट्र में पुणे के ग्राम चिंचवाड़ में प्रसिद्ध कीर्तनकार हरिपंत चापेकर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में हुआ था. दामोदर के बाद 1873 में बालकृष्ण और 1879 में वासुदेव का जन्म हुआ.

बचपन से ही सैनिक बनने की इच्छा दामोदर हरी चापेकर के मन में थी। विरासत में कीर्तन का यश-ज्ञान उनको मिला था। महर्षि पटवर्धन और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उनके आदर्श थे।’चापेकर बंधु’ (दामोदर हरी चापेकर, बालकृष्ण चापेकर तथा वासुदेव चापेकर) तिलक जी को गुरुवत सम्मान देते थे.दामोदर को गायन के साथ काव्यपाठ और व्यायाम का भी बहुत शौक था। उनके घर में लोकमान्य तिलक का ‘केसरी’ नामक समाचार पत्र आता था। उसे पूरे परिवार के साथ-साथ पास पड़ोस के लोग भी पढ़ते थे। तिलक जी को जब गिरफ्तार किया गया, तो दामोदर बहुत रोये। उन्होंने खाना भी नहीं खाया। इस पर उसकी माँ ने कहा कि तिलक जी ने रोना नहीं, लड़ना सिखाया है। दामोदर ने माँ की वह सीख गाँठ बाँध ली.

सन 1897 का साल था, पुणे नगर प्लेग जैसी भयंकर बीमारी से पीड़ित था. अभी अन्य पाश्चात्य वस्तुओं की भांति भारत के गाँव में प्लेग का प्रचार नहीं हुआ था। पुणे में प्लेग फैलने पर सरकार की और से जब लोगों को घर छोड़ कर बाहर चले जाने की आज्ञा हुई तो उनमें बड़ी अशांति पैदा हो गई। उधर शिवाजी जयंती तथा गणेश पूजा आदि उत्सवों के कारण सरकार की वहां के हिन्दुओं पर अच्छी निगाह थी। वे दिन आजकल के समान नहीं थे। उस समय तो स्वराज्य तथा सुधार का नाम लेना भी अपराध समझा जाता था।लोगों के मकान न खाली करने पर सरकार को उन्हें दबाने का अच्छा अवसर हाथ आ गया। प्लेग कमिश्नर. रेन्ड की ओट लेकर कार्यकर्ताओं द्वारा खूब अत्याचार होने लगे. चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई और सारे महाराष्ट्र में असंतोष के बादल छा गए। इसकी बाल गंगाधर तिलक व आगरकर जी ने बहुत कड़ी आलोचना की, जिससे उन्हें जेल में डाल दिया गया. इससे चापेकर बंधुओं का खून खौल उठा.

एक बार दामोदर हरि चापेकर  मुम्बई गये। वहाँ लोग रानी विक्टोरिया की मूर्ति के सामने हो रही सभा में रानी की प्रशंसा कर रहे थे। दामोदर ने रात में मूर्ति पर कालिख पोत दी और गले में जूतों की माला डाल दी। इससे हड़कम्प मच गया. अत्याचार-अन्याय के सन्दर्भ में एक दिन तिलक जी ने चाफेकर बन्धुओं से कहा, “शिवाजी ने अपने समय में अत्याचार का विरोध किया था, किन्तु इस समय अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में तुम लोग क्या कर रहे हो?’ इसके बाद इन तीनों भाइयों ने क्रान्ति का मार्ग अपना लिया। संकल्प लिया कि इन दोनों अंग्रेजश् अधिकारियों को छोड़ेंगे नहीं। संयोगवश वह अवसर भी आ गया.

22 जून, 1897 को रानी विक्टोरिया का 60वाँ राज्यारोहण दिवस था। शासन की ओर से पूरे देश में इस दिन समारोह मनाये गये। पुणे में भी रात के समय एक क्लब में पार्टी थी. इसमें वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट भी शामिल हुए. दामोदर हरि चापेकर अपने भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर भी एक दोस्त विनायक रानडे के साथ वहां पहुंच गए और इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों के निकलने की प्रतीक्षा करने लगे. रात १२ बजकर, १० मिनट पर रैण्ड और आयर्स्ट निकले और अपनी-अपनी बग्घी पर सवार होकर चल पड़े. योजना के अनुसार दामोदर हरि चाफेकर रैण्ड की बग्घी के पीछे चढ़ गया और उसे गोली मार दी. उधर बालकृष्ण हरि चाफेकर ने भी आर्यस्ट पर गोली चला दी। आयर्स्ट तो तुरन्त मर गया, किन्तु रैण्ड तीन दिन बाद अस्पताल में चल बसा। पुणे की उत्पीड़ित जनता चाफेकर-बन्धुओं की जय-जयकार कर उठी.

गुप्तचर अधीक्षक ब्रुइन ने घोषणा की कि इन फरार लोगों को गिरफ्तार कराने वाले को २० हजार रुपए का पुरस्कार दिया जाएगा. इसी लालच में आकर इनके दो साथी द्रविड़ बंधुओं के विश्वासघात करते हुए चापेकर बंधुओं का सुराग अंग्रेजों को दे दिया. इसके बाद दामोदर पकड़े गये. बाद में उनके भाई बालकृष्ण भी पकड़े गये. सत्र न्यायाधीश ने दामोदर हरि चाफेकर को फांसी की सजा दी और उन्होंने मन्द मुस्कान के साथ यह सजा सुनी. कारागृह में तिलक जी ने उनसे भेंट की और उन्हें “गीता’ प्रदान की. १८ अप्रैल १८९८ को प्रात: वही “गीता’ पढ़ते हुए दामोदर हरि चाफेकर फांसीघर पहुंचे और हँसते हुए स्वयं ही फाँसी का फन्दा गले में डाल दिया. जिन्होंने विश्वासघात कर उन्हें पकड़वाया था, वासुदेव और रानाडे ने उन्हें गोली से उड़ा दिया. आगे चलकर बालकृष्ण, वासुदेव और रानाडे को भी फाँसी पर चढ़ा दिया गया. सुदर्शन परिवार अमर बलिदानी दामोदर हरि चापेकर को उनके बलिदान दिवस पर शत-शत नमन करता है तथा अनंतकाल   तक उनके शौर्य, राष्ट्रभक्ति तथा पराक्रम की यशगाथा को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लेता है.

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