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संविधान की मर्यादा की बात है, इसमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय भी हैं, जिसमें ये साफ कहा गया है कि गवर्नर इस बात में देरी नहीं कर सकता, कपिल सिब्बल

संविधान की मर्यादा की बात है, इसमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय भी हैं, जिसमें ये साफ कहा गया है कि गवर्नर इस बात में देरी नहीं कर सकता, कपिल सिब्बल

Gaurav Mishra
  • Jul 24 2020 7:21PM
कपिल सिब्बल ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि कल शाम को राजस्थान में कैबिनेट की बैठक हुई, उसमें ये फैसला लिया गया कि राजस्थान का सत्र, सेशन सोमवार को बुलाना चाहते हैं, तो राज्यपाल को सरकार की ओर से एक चिट्ठी लिखी गई कि आप सत्र की नोटिफिकेशन निकालिए और सोमवार को सत्र की शुरुआत कीजिए। कोई इस पर निर्णय नहीं हुआ। 
वहाँ राजभवन में हमारे विधायक बैठे हुए हैं और गवर्नर साहब से कोई ऐसा फैसला अब तक नहीं आया, बड़े अचंभे की बात है। इस कैबिनेट सिस्टम में जब भी कैबिनेट सरकार आग्रह करे कि सत्र की शुरुआत होनी चाहिए, तो उसमें गवर्नर साहब को कोई देरी नहीं करनी चाहिए। ये संविधान की बात है, संविधान की मर्यादा की बात है, इसमें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय भी हैं, जिसमें ये साफ कहा गया है कि गवर्नर इस बात में देरी नहीं कर सकता, जब–जब भी सत्र की मांग हो, यह गवर्नर साहब का कर्तव्य है। लेकिन मैं समझता हूं कि पिछले कुछ सालों में लोकतंत्र की जो डेफिनेशन है, परिभाषा है, वो बदल चुकी है। आज लोकतंत्र की परिभाषा में राज्यपाल सरकारों की सलाह नहीं लेंगे, कहीं और से सलाह लेंगे और इस देश में जो चुनी गई सरकारें हैं, उसे राज्यपाल गिराने में मदद भी करेंगे। जिस दल को बहुमत है, उसके कुछ लोग एक प्राइवेट चार्टेड़ प्लेन में बाहर ले जाएंगे। वहाँ उसको होटल में ठहराएंगे, वहाँ लेन-देन की बात होगी और सरकारें गिराएंगे। मतलब कि लोकतंत्र की जो नई परिभाषा है- ‘उसमें चुनी हुई सरकारें गिराना, उसमें लोगों को लोभ देना, चाहे वो पैसे का लोभ हो या कोई और लोभ हो। इसी तरीके से उस बहुमत को अल्पमत बना देना, माईन्योरिटी गवर्मेंट बना देना और सरकार गिरा कर अपने मुख्यमंत्री को शपद दिला देना।
आपको याद होगा कि महाराष्ट्र में क्या हुआ था, यही हुआ था कि राष्ट्रपति शासन लागू था, फिर भी गवर्नर सुबह 4-5 बजे उठकर किसी को शपथ दिला दी, उसका नतीजा आप जानते हैं क्या हुआ, आप जानते हैं। मध्यप्रदेश में क्या हुआ- मध्यप्रदेश में उन्हीं कुछ डिसिडेंट लोगों को ले जाया गया, कर्नाटक ले जाया गया। वहाँ होटल में ठहराया गया और आपको मालूम है उस समय कोरोना का दौर भी था, ये मार्च की बात है। जब चीफ मिनिस्टर ने कहा कि सत्र की बैठक 26 मार्च को होनी चाहिए, उसका भी विरोध हुआ और फिर 17 मार्च को कमलनाथ जी को इस्तीफा देना पड़ा। उत्तराखंड में क्या हुआ- ऐसे ही डिसिडेंट लोगों को एक चार्टेड हवाई जहाज में बाहर ले जाया गया। गोवा में जब सबसे ज्यादा सीटें कांग्रेस पार्टी की थी, फिर भी गवर्नर साहब ने किसी और पार्टी को शपथ दिला दी। मणिपुर में जब हम कांग्रेस पार्टी की ज्यादा संख्या था, गवर्नर ने किसी और को शपथ दिला दी। तो कहने का मतलब ये है कि लोकतंत्र की अब ये नई परिभाषा है।
एक दूसरी बात इसमें जो आज के दिन हमें कहनी पड़ती है, हम कभी नहीं कहते, लेकिन ऐसा भी लगता है कि जो सुप्रीम कोर्ट फैसले करती है, हाईकोर्ट्स भी उसको किनारे रख देती हैं। अभी किहोटो होलोहों (Kihoto Hollohon vs. Zachillu) का फैसला है, 5 जजिस सुप्रीम कोर्ट का फैसला है, जिसमें ये साफ तौर से कहा गया है कि जब तक स्पीकर साहब किसी भी डिसक्वालिफिकेशन पेटिशन का फैसला नहीं करते, तब तक कोई भी कोर्ट उसमें दखलअंदाजी नहीं दे सकता। कोई भी कोर्ट इस पर ऑर्डर नहीं कर सकती। क्यों नहीं ऑर्डर कर सकती, क्योंकि जो प्रोसिडिंग है, जब तक स्पीकर साहब डिसक्वालिफिकेशन पेटिशन का फैसला नहीं करते, those proceeding are proceeding with in the house, मतलब कि वो कार्यवाही असेंबली की कार्यवाही मानी जाएगी। वह असेंबली के बाद की कार्यवाही नहीं मानी जाएगी, क्योंकि असेंबली की कार्यवाही मानी जाएगी तो इसका मतलब है कि कोर्ट में इसमें कोई दखलंदाजी नहीं कर सकता। ये 5 जजिस सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया। अब हाईकोर्ट में बैठकर किसी जज को ये कह देना कि स्पीकर साहब आप कार्यवाही नहीं करेंगे, तो ये लोकतंत्र की एक नई परिभाषा है कि जो भी सुप्रीम कोर्ट कहे, जितने भी जज कहें, हमें कुछ लेना-देना नहीं है। हम खुद अपने फैसले करेंगे। राष्ट्रपति का कोई मतलब नहीं, तो फिर हम वकील वहाँ किस लिए बहस करें? अभी अगर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की जजमेंट का फैसला नहीं मानना, तो किस लिए वकील बहस करें?  मुझे खेद से कहना पड़ता है कि वकील लोग भी आजकल निराश हो चुके हैं और कहीं ऐसा वो दिन तो नहीं आ जाए कि वकील लोगों को अपनी रोब्स उतारनी पड़े और कहना पड़े कि क्या फायदा, जो कानून के रक्षक हैं, अगर वो अपनी ही जजमेंट का पालन नहीं करेंगे तो हमें वकालत करने का क्या फायदा है? छोड़ दें वकालत, कुछ और काम करें।
लोकतंत्र का मतलब क्या है कि पार्लियामेंट संविधान के मुताबिक जो उस की कार्यवाही होगी, उसके मुताबिक चलेगी, पार्लियामेंट्री रुल्स के मुताबिक चलेगी, वो नहीं हो रहा। पार्लियामेंट में बिना बहस के बिल पास नहीं होंगे, वो नहीं हो रहा। सरकारें, जो फैसला करेंगे, कानून के अंतर्गत करेंगी, वो नहीं हो रहा। अदालतें फैसला करेंगी, जो अदालतों ने पहले फैसले किए हैं, सुप्रीम कोर्ट ने फैसले किए हैं, उनके विरोध में नहीं जाएंगी, वो नहीं हो रहा। संस्थाओं को केप्चर किया जा रहा है, चाहे वो चुनाव आयोग हो और जहाँ कोई विरोध करता है, उसके पीछे एजेंसी लगाई जा रही हैं, ताकि कोई विरोध ना करे। तो अगर इस स्थिति में, अगर लोकतंत्र की यही परिभाषा है कि जो सरकार कहे, सबको मान लेना चाहिए, कोई विरोध नहीं होना चाहिए। अगर यही लोकतंत्र की परिभाषा है, तो फिर किस लिए संस्थाएं काम कर रही हैं? क्या जरुरत है संस्थाओं को काम करने की?  जो प्रधानमंत्री जी कहें, जो ये सरकार कहे, उसको मान लेना चाहिए?
अब हो क्या रहा है– वकीलों को बंद किया जा रहा है, उनके खिलाफ फेरा के केस लगाए जा रहे हैं। लोगों को कश्मीर में पब्लिक सेफ्टी एक्ट के अंतर्गत बंद किया जा रहा है, कश्मीर के बच्चों को 4-जी नहीं मिलता। शाह फैसल को बंद कर दिया, हालांकि वो आईएएस में टॉपर थे। कश्मीरी जर्नलिस्ट बिलाल भट्ट को फ्लाइट नहीं लेने दी। भीमा, कोरेगांव में क्या हो रहा है, आपको मालूम है। बच्चों के खिलाफ सेडिशन केस लगाए जा रहे हैं। अखिल गोगोई को यूएपीए के अंतर्गत उनके खिलाफ केस कर दिया। सफूरा जरगर के खिलाफ कर दिया, हालांकि वो रिसर्च स्कोलर हैं जामिया के। उमर खालिद, कवल प्रित कौर, शार्जिल इमाम, क्या-क्या उदाहरण हम आपको नहीं दें?
इस नई परिभाषा, जो लोकतंत्र की बन चुकी है, उस परिभाषा के अंतर्गत वकीलों का क्या रोल है, ये भी हमें सोचना चाहिए और विपक्ष के नेताओं का क्या रोल है, इस पर भी सोचना पड़ेगा। क्योंकि जब तक हम अहिंसा को अपनाकर, जब तक हम सड़कों पर नहीं उतरेंगे, जब तक जनता को ये नहीं बताएंगे कि इस देश में हो क्या रहा है। तब तक वो लोकतंत्र की लड़ाई कभी लड़ नहीं पाएंगे।
जहाँ तक सचिन पायलट जी का सवाल है, मैं आज इस मंच से उनको कुछ याद दिलाना चाहता हूं और आपके द्वारा देश की जनता को भी बताना चाहता हूं कि पायलट साहब 23-24 साल के थे, पॉलिटिक्स में आए और 2003 में मेरे ख्याल से आए और 2004 में वो चुनाव लड़े। पार्लियामेंट मेंबर बन गए, कांग्रेस पार्टी ने टिकट दिया। 2004 से लेकर 2009 तक वो पार्लियामेंट के मेंबर थे। 2009 में 30 साल की कम उम्र में उन्हें मंत्री बना दिया गया, मेरे मंत्रालय में काम करते थे। 5 साल मंत्री रहे। 2014 में हार गए, उसके बाद जब चुनाव हुए राजस्थान असेंबली के चुनाव हुए तो डिप्टी मुख्यमंत्री बना दिया गया, उनके पास शायद 5-6 पोर्टफोलियो थे। अब चाहते क्या हैं सचिन पायलट साहब? मैं पूछना चाहता हूं, आप मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं तो बताइए?  कुछ और चाहते हैं तो वो बताइए? विरोध किस बात का है? हरियाणा में जाकर बैठे हुए हैं और अगर आप कहते हैं कि आप पार्टी में हैं, हम आपकी बात मानते हैं तो कांग्रेस की मीटिंग में क्यों नहीं आते हैं? अगर आप कहते हैं कि कांग्रेस से हम बाहर नहीं गए, हम बीजेपी को ज्वाइन नहीं करना चाहते, तो हरियाणा में क्यों बैठे हैं? आप कांग्रेस की मीटिंग जो बुलाई जाती है, दो मीटिंग बुलाई गई 13 जलाई को और 14 जुलाई को, आप आए क्यों नहीं? मीटिंग में आकर अपनी बात क्यों नहीं रखी? अगर आपको कुछ और तकलीफ है तो बताइए? आपके मन में क्या बात है, ये तो हमें बताइए, आप चाहते क्या हैं? इतनी छोटी उम्र में आपको इतना कुछ, शायद ही इस देश में किसी को मिला हुआ। कांग्रेस पार्टी में तो शायद ही किसी को मिला हो, तो हम पूछना चाहते हैं कि आप और क्या चाहते हैं? अगर भाजपा को ज्वाइन ही करना चाहते हैं तो बता दीजिए? अगर आप अपना एक अलग दल बनाना चाहते हैं, तो वो भी बता दीजिए? हमें बताइए तो सही, देश की जनता को बताइए तो सही कि आपके साथ क्या अन्याय हो रहा है? हमें मालूम है कि आप मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। अब आप खुद ही कहते हैं कि आपके साथ 20 हैं, हो सकता है कहते हैं कि आपके 30 हो जाएं, तो कांग्रेस पार्टी की संख्या राजस्थान असेंबली में 100 से ज्यादा है। ऐसे में 20-25 लोग होने से आप मुख्यमंत्री कैसे बन सकते हैं? अगर कोई और आपकी बात है तो हमें बताइए, खुलेआम जनता को बताइए? बिन बोले, होटल में बैठकर, चुप होकर तो काम नहीं चलेगा।

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