अब जज साहब ने गुजरात सरकार से पूंछा- “सिर्फ हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिए सरकारी खजाने क्यों खोले?”

गुजरात हाईकोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट से एक ऐसा सवाल किया है जिससे सरकार पेशोपेश में आ गयी है. गुजरात हाईकोर्ट के जज साहब ने गुजरात सरकार से पूंछा है कि उसने अपना खजाना सिर्फ हिन्दू तीर्थस्थानों के लिए क्यों खोला गया है. गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है कि गैरहिंदू तीर्थ स्थानों के विकास के लिए क्यों फंड आवंटित नहीं किया जा रहा है. आपको बता दें कि अहमदाबाद के रहने वाले मुजाहिद नफीस नाम के शख्स ने गुजरात हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है. जिसमें याचिकाकर्ता ने गुजरात सरकार के पवित्र यात्राधाम विकास बोर्ड के जरिए केवल हिंदू तीर्थ स्थानों के विकास के लिए ही फंड आवंटित किए जाने को लेकर बोर्ड के सामने सवाल किए हैं.

गुजरात हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस आरएस रेड्डी और जस्टिस वीएम पंचोली ने गुरुवार को जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए गुजरात सरकार को जवाब देने के लिए कहा है. याचिकाकर्ता मुजाहिद नफीस ने एक आरटीआई दायर की थी. जिसमें उन्होंने जवाब मांगा था कि पवित्र यात्राधाम विकास बोर्ड के जरिए कितने तीर्थ स्थानों के लिए फंड आवंटित किए गए. आरटीआई के जवाब में 358 तीर्थ स्थान शामिल हैं, जबकि दूसरे धार्मिक स्थान जैसे इस्ताम इसाई जैन, सिख, बौद्ध और पारसी धर्म के तीर्थ स्थलों को इस सूची से अलग रखा गया है. मुजाहिद नफीस का कहना है कि एक धर्म के पवित्र स्थलों के लिए फंड आवंटित करना और दूसरे धर्मों को नजरअंदाज करना गैरकानूनी और संविधान का उल्लघंन है.

याचिका में कहा गया है कि एक धर्मनिरपेक्ष सरकार से उम्मीद की जाती है कि सभी नागरिकों से इकट्ठा किए गए टैक्स से किसी एक समुदाय के धार्मिक स्थलों को ही प्रमोट न किया जाए. जनता का पैसा किसी एक धर्म विशेष के ही तीर्थ स्थलों के रखरखाव में नहीं लगाया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा केवल हिंदू धार्मिक स्थानों के लिए व्यय करना बोर्ड के नियम-कानून के खिलाफ है. गैरतलब है कि 1995 में पवित्रयात्रा धाम विकास बोर्ड सरकार के जरिए बनाया गया था. जिसमें अब तक 358 मंदिर शामिल हैं. हालांकि अगर सरकार सबका साथ और सबके विकास की बात करती है, तो हर धर्म के धार्मिक स्थान इसमें आने चाहिए. गुजरात हाईकोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 12 दिसंबर को होगी.

Share This Post

Leave a Reply