मनमोहन सरकार की कश्मीर पर वो नीति जिसका लाभ ले रहे हैं केवल और केवल मुसलमान.. जबकि कांग्रेस जानती थी कि कश्मीर हो चुका है हिन्दू विहीन

महर्षि कश्यप की पावन भूमि कश्मीर में व्याप्त वर्तमान समस्याओं को हम देखते हैं तो जेहन में स्वतः ही जवाहरलाल नेहरू का नाम आ जाता है. और ये सच भी है कि आज की कश्मीर समस्या नेहरू की ही देन है. लेकिन संभवतः ज्यादातर लोग नहीं जानते होंगे कि जिस तरह नेहरू ने कश्मीर में दर्दनाक में धकेला था, ठीक उसी राह पर चलते हुए पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने भी कश्मीर को लेकर एक ऐसी नीति बनाई थी जिसका लाभ सिर्फ और सिर्फ मुस्लिमों को मिलता है. मनमोहन सरकार ने ये नीति उस समय बनाई थी जब कश्मीर हिन्दू विहीन हो चुका था.

आपको बता दें कि ये समय था 2007 का, जब देश में कांग्रेस नीत UPA की सरकार थी तथा डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमन्त्री थे. 2007 में मनमोहन सरकार ने एलओसी परमिट लागू किया था. वर्ष 2007 से लागू एलओसी परमिट के तहत जम्मू कश्मीर के मुसलमान बिना रोक टोक नियंत्रण रेखा पार बिना रोक टोक अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं और वहां के लोग जम्मू कश्मीर में अपने रिश्तेदारों से मिलने आते हैं. चूँकि कश्मीर पूरी तरह से हिन्दू विहीन है तथा वहां न के बराबर हिन्दू हैं तथा उनका एलओसी के पार कोई सगा संबंधी नहीं है, कोई रिश्तेदार नहीं है इसलिए एलओसी परमिट का लाभ सिर्फ मुसलामानों को मिलता है.

मनमोहन सरकार द्वारा कश्मीर को लेकर बनाई गई इस नीति पर हमारा सवाल इसलिए है क्योंकि आज कश्मीर में हो रहे आतंकवाद, पत्थरबाजी में कहीं न कहीं इस नीति का एक बड़ा हाथ है. लोगों के जेहन में अक्सर एक सवाल आता है कि तमाम प्रयासों के बाद भी कश्मीर में आतंकी घटनाएँ रुकने का नाम क्यों नहीं ले रही हैं? तमाम दावों तथा कोशिशों के बाद भी आखिर भारतीय सेना के जांबाज जवानों पर पत्थरबाजी क्यों नहीं रुक रही हैं? अगर हम इसकी जड़ में जायेंगे तो पता चलेगा कि संबंध कहीं न कहीं 2007 में लागू किये गये एलओसी परमिट से है.

सिर्फ हम ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया ये बात जानती है पाक अधिकृत कश्मीर(POK) में आतंकी कैंप सक्रिय हैं. आतंकी मुल्क पाकिस्तान की शह में इस्लामिक आतंकी संगठन POK में ट्रेनिंग सेंटर चलाते हैं तथा यहीं से तैयार आतंकी कश्मीर में घुसपैठ करके हिदुस्तान में आतंकी घुसपैठियों को अंजाम देते हैं. इन आतंकियों तथा आतंकियों के आकाओं के लिए ये एलओसी परमिट एक संजीवनी की तरह है, जिसका उपयोग करके वह कश्मीर से POK तथा POK से कश्मीर में आवाजाही करते हैं तथा आतंकी वारदातों को अंजाम देते हैं.

अक्सर सवाल ये भी खड़ा होता है कि आखिर कश्मीर में आतंकियों के पास हथियार तथा विस्फोटक सामग्री तथा पैसा कहाँ से आता है तो इसका आसान जवाब है एलओसी परमिट. जी हाँ, सीमापार से आतंकी, आतंकियों को हथियार-विस्फोटक सामग्री तथा पत्थरबाजों के लिए पैसा लाने के लिए एलओसी परमिट सबसे आसान तथा कारगर उपाय है तथा ये निश्चित है कि हिंदुस्तान विरोधी ताकतें एलओसी परमिट का प्रयोग हिंदुस्तान में आतंक फैलाने के लिए करती हैं.

इसमें एक आश्चर्य की बात ये है कि एलओसी परमिट का लाभ उसी को मिलता है जिसके रिश्तेदार POK में हैं तो स्पष्ट है कि कश्मीरी हिन्दू एलओसी परमिट का लाभ नहीं उठा सकते. कश्मीरी हिन्दू रविंदर पंडित ने बताया, ‘पाक अधिग्रहित कश्मीर में हमारा कोई रिश्तेदार नहीं है. इसलिए हम ‘एलओसी परमिट’ के लाभ से वंचित हैं. हमारी मांग है कि भारत सरकार एलओसी परमिट में संशोधन कर कश्मीरी हिन्दुओं को शारदा पीठ की यात्रा करने की अनुमति दे और इसके बाद देशभर से हिंदुओं को शारदा पीठ की यात्रा करने की अनुमति दे.’ मुसलमान अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए एलओसी परमिट का लाभ उठाता है लेकिन उसी कश्मीर में रहने वाला हिन्दू माँ शारदा पीठ जाने के लिए एलओसी परमिट का लाभ नहीं उठा सकता. इससे एक बात साफ़ साबित होती है कि एलओसी परमिट लागू करने का मुख्य उद्देश्य ही ये रहा होगा कि इसका फायदा मुसलमानों को मिले, कश्मीरी हिन्दुओं को नहीं. बता दें कि माँ शारदा पीठ उड़ी से 80-90 किलोमीटर दूर जिला नीलम, शारदा गांव में स्थित है जो पाक अधिग्रहित कश्मीर में है.

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