“नहीं बन सकता गौ हत्या प्रतिबन्ध क़ानून, जो हिन्दू मानते हैं वो सब माने ये जरूरी नहीं”. पहली बार ये शब्द कहने वाले गांधी थे

आज अगर सरकार पर विपक्ष हमलावर है तो वो कहीं न कहीं गाय से जुड़ा है . बीच में गौ माता को मोब लिंचिंग से जोड़ा गया , फिर गौ रक्षको को कुछ पोर्टलों ने विपक्ष में कुछ नेताओं से मिले बल से गौ आतंकी बोलना शुरू कर दिया . इतना ही नहीं , धीरे धीरे इनका दुष्प्रचार मीडिया के भी बड़े वर्गं ने शुरू कर दिया और देश में गौ रक्षको को देश से ही अलग थलग करने की मुहिम चला दी गयी . उस समय सेना से लड़ रहे आतंकियों से ज्यादा गौ रक्षको की चर्चा होती रही . यद्दपि गौ रक्षक अभी भी पूरे देश में गौ वध के खिलाफ एक कड़े कानून की मांग कर रहे हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसको सबसे पहले किस ने मना किया था .

वो प्रकरण जुड़ा है गांधी से जिसका आज जन्मदिवस कई लोग मना रहे हैं . इतिहास में थोडा पीछे जाने की जरूरत है . गांधी के जीवन पर स्कूली छात्रों को ध्यान में रखकर लिखी गई सोपान जोशी की पुस्तक ‘एक था मोहन’ से लिए गये अंश के अनुसार एक बार साबरमती आश्रम में एक बछड़े की टांग टूट गई. उससे दर्द सहा नहीं जा रहा था, ज़ोर-ज़ोर से वह कराह रहा था. आख़िरकार गांधी ने उसे मारने की अनुमति दे दी. इतना ही नहीं जब उसको जहर का इंजेक्शन दिया जा रहा था तब गांधी वहीँ खड़े थे . जहर का इंजेक्शन लगने के थोड़ी ही देर बाद वो बछडा सदा सदा के लिए शांत हो गया और गांधी अपनी कुटिया में चले गये . उस समय सावरकर जी के पक्ष के तमाम लोगों ने इसको गौ हत्या माना और गाँधी को चिट्ठियां भी लिखी थी .

उस समय गांधी ने उन हिंदूवादी विचारधारा वालों को समझाया था कि पीड़ा में फंसे प्राणी की मुक्ति हिंसा नहीं, अहिंसा ही है.  इसी पुस्तक में आगे लिखा है कि गांधी अपने धर्म के पक्के थे. वे पूजा-पाठ नहीं करते थे, मंदिर-तीर्थ नहीं जाते थे.  एक बार की बात है जब गांधी की पत्नी कस्तूरबा बीमार थीं, तब डॉक्टर ने उन्हें गोमांस का शोरबा देने को कहा. . यहाँ पर खुद कस्तूरबा ने प्रबल विरोध किया था और कहा था कि भले ही वो मर जाएँ लेकिन गौ मांस नहीं खायेंगी . यद्दपि इसमें गांधी ने खुद विरोध किया था ये नहीं लिखा गया .  पुस्तक के अनुसार गांधी गाय ही नहीं बल्कि भैंस और बकरी को भी माता ही कहते थे. . उस समय कुछ हिन्दू संगठन हिन्दुओ के बहुसंख्यक होने के चलते उनकी आराध्या गाय माता के कत्ल और मांस पर रोक लगाने के लिए क़ानून की मांग कर रहे थे. पूरे देश से तब की सत्ता में बैठे काग्रेस नेताओं को इस विषय पर अनेक चिट्टियां मिल रही थीं. . लेकिन उन सभी हिन्दुओ के के मंसूबे तब ध्वस्त हो गये जब दिल्ली में 25 जुलाई, 1947 की प्रार्थना सभा में गांधी ने कहा, “हिंदुस्तान में गोहत्या रोकने का क़ानून बन नहीं सकता. हिंदुओं का जो धर्म है, वही हिंदुस्तान में रहने वाले लोगों का भी हो, यह कैसे हो सकता है?” .

 

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