वो उलेमा है इस्लामिक मजहबी नाम.. लेकिन वो दे सकता है जैश के आतंकियों को मदद.. समस्या सिर्फ पुलवामा में ही नहीं, देवबंद में भी

बड़े जोरों से एक नारा लगाया जाता है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है. चलो मान लेते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता लेकिन जब आतंक का कोई धर्म नहीं होता तब आखिर क्यों इस्लामिक उलेमा आतंकियों के पैरोकार बनाए नजर आते हैं, क्योंकि उन्हें कानूनी मदद देने का खुलेआम ऐलान करते हैं? हाल ही में सहारनपुर के देबवंद से UP ATS ने इस्लामिक आतंकी दल जैश ए मोहम्मद के दो आतंकियों को गिरफ्तार किया है तथा इस्लामिक संगठन जमीयत उनको कानूनी मदद देने को तैयार हो गई है.

जमीयत उलेमा ए हिन्द के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने रविवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि महज मीडिया ट्रायल या पुलिस के कह देने भर से किसी को आतंकी नही माना जा सकता, जब तक कि उसे न्यायालय से सजा न मिल जाय. उन्होंने कहा कि जमीयत ने पहले भी ऐसे युवाओ के केस लड़े हैं, और उन्हें बाइज्जत रिहा कराया है. देवबंद के पास से गिरफ्तार दोनों युवाओं के मामले में जरूरत पड़ी तो जमीयत उनके केस लड़ेगा.

पूंछताछ में दोनों आतंकी इस बात को कबूल कर चुके हैं कि वह जैश के आतंकी हैं. लेकिन इसके बाद भी जमीयत उनको कानूनी मदद देने को मैदान में आ गई है. अगर आतंक का कोई धर्म नहीं होता तो जमीयत को क्यों देबवंद से गिरफ्तार दोनों आतंकियों की चिंता हो रही है. हम लोगों को लगता है कि हमारी समस्या पाकिस्तान है लेकिन अगर हम जमीयत जैसे मजहबी संगठनों के क्रिया कलापों पर गौर करें तो हमें समझ आएगा कि समस्या सिर्फ पाकिस्तान नहीं बल्कि देबवंद में भी है. या तो हम इसको देख नहीं पा रहे हैं या फिर जानबूझकर इसको अनदेखा कर रहे हैं. दोनों में से कारण कोई भी हो लेकिन अगर समय रहते इस समस्या का निदान नहीं किया गया तो ये समस्या एक फोड़े से नासूर बन जायेगी.

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