एक किन्नर के संघर्ष की कहानी जान कर मिलेगी हर किसी को प्ररेणा… जानिए कौन है वो और क्या किया ऐसा ?

किन्नर को दुनिया में इंसानों का दर्जा नहीं दिया जाता है। किन्नर यानि ट्रांसजेंडर इन्हें बिल्कुल भी इंसानों में नहीं गिना जाता है। आज के दौर में भी हमारा समाज

लिंगभेद में ही उलझा पड़ा है। इससे अभी तक बाहर नहीं निकला है। किन्नर लोग अपनी जिंदगी में कैसी-कैसी परेशानियों का सामना करते हैं शायद ही हम इस

बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं।
किन्नरों को हम सबने सड़कों पर भीख मांगते हुए देखा हैं।

ये लोग अपने जीवन में हर तरह की परेशानी को झेलते हैं । और अपने जीवन में अनेक सघर्ष का

सामना करते है। कुछ इसी तरह का संघर्ष करके सब किन्नरों के लिए मिसाल बनकर निकली हैं जोइता मंडल । बता दे कि पश्चिम बंगाल की 30 वर्षीय जोइता

मंडल की पहचान आज देश की पहली ‘किन्नर’ न्यायाधीश के रूप में की जा रही है। अपनी मेहनत और लगन की वजह से जोइता आज सम्पूर्ण समाज के

किन्नरों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है।

बता दे कि वह वृद्धाश्रम के संचालन के साथ रेड लाइट इलाके में रह रहे परिवारों की जिंदगियों को सवारने में लगी हुई हैं। उनके सेवा और समर्पण भाव से प्रभावित

होकर पश्चिम बंगाल सरकार ने उनका सम्मान करते हुए उन्हें लोक अदालत का न्यायाधीश बना दिया
मध्य प्रदेश की व्यावसायिक नगरी में ट्रेडेक्स द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं जोइता ने आईएएनएस से कई मुद्दों पर और खासकर किन्नर समाज

तथा रेड लाइट इलाके में रहने वाले परिवारों की समस्याओं पर खुलकर चर्चा की। और इसी के साथ जोइता ने अपनी आपबीती को भी साझा किया।

जोइता ने अपने बीते दिनों को याद करते हुए कहा कि वे एक आम लड़की की जिद्गी जी रही थी , और उनका बचपन इसी तरह व्यतीत हुआ, जब वे 18 साल की

थी , तब उन्होंने मां दुर्गा की पूजा के समय ब्यूटी पार्लर में जाकर मेकअप करा लिया, जब वे वापस आई तो घरवालों ने उनकी जमकर पिटाई कि क्योकि घर

वाले उन्हें लडक़ा मानते थे
उन्होंने अपनी यादों को साझा करते हुए आगे कहा कि जब ने कॉलेज जाती थी तो सभी उनका मजाक उड़ाते थे, जिसके कारण उन्होंने अपनी पढ़ाई तक छोड़ दी।

वर्ष 2009 में उन्होंने घर छोडऩे की तैयारी कर ली। और वे दिनाजपुर जा पहुंची ।
जोइता ने आगे बताया कि दिनाजपुर में उन्होंने किन्नरों के डेरे में जाने का फैसला किया और फिर वही सब करने लगीं जो आम किन्नर करते हैं, बच्चे के पैदा होने

पर बधाई गाना, शादी में बहू को बधाई देने जाना। नाचने गाने का दौर शुरू हो गया। उसके बाद अपनी पढ़ाई दोवारा से शुरु कर दी।

इसी के साथ जोइता ने बताया कि वर्ष 2010 में दिनाजपुर में एक संस्था बनाई जो किन्नरों को उनका हक दिलाने का काम करती है। औऱ इसी के साथ बुजुर्गों के

लिए एक वृद्धाश्रम भी बनाया । जोइता ने रेड लाइट इलाके में रहने वाली महिलाओं, उनके बच्चों के राशन कार्ड, आधार कार्ड बनवाए और पढ़ाई के लिए उन्हें

जागरुक किया।
अनेक कष्टों को सेहते हुए भी जोइता ने अपने अभियान को जारी रखा, एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें ताकत दी तो आठ जुलाई 2017 का दिन उनके लिए

यादगार बन गया , जब राज्य सरकार ने उन्हें लोक अदालत का न्यायधीश नियुक्त कर दिया।
जोइता कहती हैं कि उसने हालात का डटकर सामना किया। और आज उन्हें इस बात बिलकुल भी दुख नहीं है कि वे किन्नर हैं।

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