मोदी सरकार का फिर बजा डंका.. ब्रिटिश गृह सचिव का बयान – “भारत भेजा जाएगा भगोड़ा विजय माल्या”

ये वो बहुप्रतीक्षित खबर थी जिसका इंतज़ार देश को एक लंबे समय से था.. ये एक चुनौती थी जिसको भारत के अंदर से ही दिया जा रहा था भारत की ही सरकार को भले ही उसका मखौल उड़ाया जा रहा था विदेश में  . जी हां, देशवासियों का पैसा लूट कर भागे विजय माल्या को लेकर आखिरकार ब्रिटेन ने भारत की तमाम दलीलें मान ली हैं और अब वो भारत भेजा जाएगा अपने तमाम गुनाहों की सज़ा को झेलने के लिए .  इस खबर के आते ही आम जनमानस में मोदी की चर्चा एक बार फिर सब शुरू हो गयी और न सिर्फ देश में ही बल्कि विदेश में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक मजबूत विदेश नीति की जमकर सराहना शुरू हो गयी है ..

ध्यान देने योग्य है कि दिवालिया हो चुकी किंगफिशन के मालिक विजय माल्या को भारत लाने का रास्ता साफ हो गया है. माल्या को भारत भेजने को लेकर ब्रिटेन के गृह मंत्रालय ने मंजूरी दे दी है. ऐसा माना जा रहा है कि माल्या अब ब्रिटेन हाईकोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील दायर कर सकते हैं. कोर्ट में अपील करने के लिए उनके पास 14 दिन का समय है.विदेश भागे शराब कारोबारी विजय माल्या के भारत लाने का रास्‍ता साफ हो गया है. माल्या पीएनबी समेत देश के कई बड़े बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपये लेकर फरार हो गए थे. लंदन की वेस्टमिनिस्टर कोर्ट ने विजय माल्‍या को भारत भेजने की पहले ही इजाजत दे दी थी और अब ब्रिटेन के गृहमंत्रालय से भी मंजूरी मिल गई .

विजय माल्या को  भगोड़ा घोषित करने के लिए प्रवर्तन निदेशालय ने कोर्ट में याचिका दायर की थी. इस याचिका पर आज फैसला आया है. PMLA कोर्ट के बाद माल्या नए कानून के तहत देश का पहला आर्थिक भगोड़ा बन गया. बता दें कि कोर्ट ने इस फैसले को 26 दिसंबर 2018 को 5 जनवरी 2019 तक के लिए सुरक्षित रखा था. माल्या ने पीएमएलए कोर्ट ने दलील थी कि वह भगोड़ा अपराधी नहीं है और न ही मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध में शामिल है.

साल 2004 में आई यूपीए सरकार के समय विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर को एयरलाइंस शुरू करने के लिए पहली बार सरकार से लोन मिला। माल्या की कंपनी को दूसरी बार यह लोन साल 2008 में यूपीए सरकार के दौरान ही मिला। दोनों बार के लोन मिलाकर माल्या ने करीब 8040 करोड़ का लोन ले लिया मगर अब भी यह एयरलाइंस नहीं चल सकी जिसका सबसे प्रमुख कारण है कि यह एयरलाइंस एक लग्जरी एयरलाइंस के तौर पर पेश की गई इस लिहाज से किंगफिशर सस्ती उड़ानों को टक्कर नहीं दे पाया और ज्यादा हवाई यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करने में असफल रहा।

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