जिस ईराक को ISIS से बचाने के लिए सैकड़ों अमेरिकी सैनिको ने दी जान अब उसी ईराक ने अमेरिका को दिया ये जवाब.. आखिर बात थी मजहब की

ये वही ईराक है जो अभी भी यदा कदा ISIS के आतंकियों द्वारा किये जाने वाले ब्लास्ट आदि से थर्रा जाता है . वही ईराक है जिस पर कभी ISIS पूरा कब्ज़ा करने ही वाला था अगर बीच में अमेरिकी सैनिक न आये होते . ईराकी फौजें घुटने टेक चुकी थी लेकिन अमेरिकी सैनिको के जाने के बाद उनमे एक नई ऊर्जा का संचार हुआ और उन्होंने ISIS के पाँव उखाड़ दिए . उसी अमेरिका को आख़िरकार उसी ईराक ने दिया ऐसा जवाब कि सिर्फ अमेरिका को ही नहीं पूरी दुनिया को एक झटका लगा .

ज्ञात हो कि ईराक और ईरान में युद्ध पहले भी हो चुका था जब सद्दाम हुसैन ने ईरान पर धावा बोल दिया था . तब से ईरान और ईराक के रिश्ते सामान्य नहीं हो पाए थे . इसी बीच अमेरिका ने भी ईरान पर तमाम प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए थे और इजरायल के साथ मिल कर ईरान पर हमला करने तक के हालात पैदा हो गये थे . इसी के चलते बड़ी उम्मीद से अमेरिका ने ईराक से अपने सैनिको के ठिकाने और हवाई जहाजो के उड़ने आदि के लिए जगह देने की मांग की थी ..

लेकिन इस्लामिक मुल्क ईराक ने इस्लामिक मुल्क ईरान के खिलाफ अमेरिका के उस निवेदन को ठुकरा दिया. अमेरिका अपने सैनिको द्वारा ईराकियो को अपना बलिदान दे कर बचाने के बाद आश्वस्त था लेकिन जब बात एक मजहब के ईरान की आई तो ईराक अमेरिका से नाराज हो गया . जबकि ईराक और ईरान का युद्ध भी पहले हो चुका था .. इराक़ के राष्ट्रपति बरहम सालेह ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उस बयान की निंदा की है जिसमें ट्रंप ने कहा था कि वो ईरान पर नज़र रखने के लिए इराक़ में अमरीकी सेना की मौजूदगी बनाए रखना चाहते हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने रविवार को एक साक्षात्कार में कहा था कि जिहादी समूह इस्लामिक स्टेट से मुक़ाबले के लिए अमरीकी सैनिक जिस ठिकाने का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो उसे बनाए रखना चाहते हैं. वो इसके जरिए ‘ईरान पर नज़र बनाए रखना चाहते हैं.’उन्होंने आगे कहा कि अमरीका को ISIS से ही संघर्ष तक ही सीमित रहना चाहिए और दूसरे एजेडों को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए.  इराक़ में अमरीका के करीब पांच हज़ार सैनिक हैं. ये सैनिक आईएस से संघर्ष में इराक़ के सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण और सलाह देते हैं. साथ ही उन्हें सहयोग भी करते हैं.

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