अब तो भारत का संवैधानिक चुनाव भी इस्लामिक समय और इस्लामिक सुविधाओं के हिसाब से करवाने की मांग

इस से पहले भी भारत में अनगिनत चुनाव हुए है . ये उस भारत के चुनावों की बात हो रही है जो संवैधानिक रूप से सेकुलर कहा गया है और इसी सेकुलरिज्म की दुहाई भारत के तमाम नेता आये दिन दिया करते हैं . इस से पहले ये चुनाव कई बार होली के पास, दीपावली के पास , छात्रों की परीक्षाओं के भी समय, आपदा काल में भी पड़े हैं , लेकिन ऐसी मांग कभी भी पहले नहीं उठी थी जो इस बार उठ रही है . धर्मनिरपेक्ष भारत में मजहबी आधार पर की जा रही है मांग .

ज्ञात हो कि इस बार चुनाव की तारीखों के एलान के साथ ही सबसे पहले आदेश हुआ था चुनाव आयोग का कि सभी लोग किसी भी प्रकार की धार्मिक या साम्प्रदायिक बातों और बयानों से दूर रहें . लेकिन जैसे ही चुनावों की तारिख घोषित हुई वैसे ही तत्काल इसको मजहबी आधार पर मुसलमानों के समय के अनुकूल न होने की बात बताई जाने लगी और न सिर्फ इस्लामिक जानकार इस मुद्दे पर सामने आ गये बल्कि खुद को नेता कहने वाले तमाम पार्टियों के प्रतिनिधि भी इस मुद्दे में उतर गये .

विदित हो कि इस मामले को मजहबी आधार देते हुए कहा गया है कि मुसलमानों के रमजान के समय आने वाले चुनाव हैं जिसके चलते ये चुनाव उस तारिख से हटाए जाएँ . इस मुद्दे की शुरुआत आम आदमी पार्टी में अरविन्द केजरीवाल के सबसे करीबियों में से एक विधायक अमानतउल्लाह खान ने की .. उनका ट्विट काफी वायरल हुआ जिसमे उन्होंने चुनावो को इस्लामिक समय के अनुकूल करवाने की मांग की . इसके साथ ही लगभग वही बयान रशीद फिरंगी महिली ने भी दोहराया और कहा कि रमजान होने के चलते मुसलमान अपने घरों से कम निकलेगा और इस से चुनाव परिणामो पर असर पड़ेगा … इस मामले को देख कर अंत में इस निष्कर्ष पर पहुचा जा रहा है कि ये चुनाव ये तमाम लोग इस्लामिक समय के अनुकूल करवाना चाह रहे हैं जिस पर जद्दोजहद जारी है .

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