5 फरवरी- 22 अंग्रज पुलिसकर्मियों को मार कर आज ही हुई थी चौरीचौरा क्रांति.. लेकिन उन क्रान्तिकारियो को गांधी ने ही ठहरा दिया था गलत

सबसे बड़े अफ़सोस की बात ये है कि उस क्रांति को आज भी काण्ड कहा जाता है . ये शब्द उन तथाकथित इतिहासकारों की देन है जिन्होंने भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के बारे में भी काफी कुछ ऐसा लिखा जो एक देशभक्त पढ़ भी नहीं सकता है . उन्होंने मात्र कुछ लोगों की चाटुकारिता के चलते भारत के इतिहास को ऐसा विकृत कर दिया कि देश आज भी मोहताज है उन वीरों के नाम तक जानने से जो हमारे लिए अपना सर्वोच्च बलिदान यानी प्राण तक दे कर चले गये .

जी हाँ , आज ही वो दिवस है जब गोरखपुर के पास स्थित चौरी चौरा थाने को भारत के क्रांतिकारियों ने घेर लिया और अत्याचार की सभी हद पार कर चुके 22 अंग्रेज या उनके गुलाम पुलिसकर्मियों को आग के हवाले कर दिया . इस क्रांति की आग की लपटें ब्रिटेन तक गयी थी जिसके बाद वहां तक हलचल मची थी और उन्होंने इसके दमन के लिए सख्त आदेश दिए थे . लेकिन अगर भारत एक उन शूरवीरों की बात की जाय तो उनका साथ यहाँ देने वाला कुछ लोगों को छोड़ कर कोई नहीं बचा .

हद तो तब हुई जब यही के कुछ बड़े नामो ने उन वीरो का खुला विरोध किया और उनके कार्य को एकदम सिरे से गलत बताया जिसके बाद तमाम समर्थक भी पीछे हट गये थे .  आज ही के दिन अर्थात 5 फरवरी 1922 के दिन की यादें आज भी दिलों में जिंदा है। इस दिन चौरी चौरा के सपूतों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। पुलिस ज्यादती से क्षुब्ध क्रांतिकारियों ने चौरी-चौरा थाने में आग लगा दी थी। ये एक ऐसा प्रतिरोध था जिसकी कल्पना तक अंग्रेजो ने नहीं की थी .

इस घटना में थानाध्यक्ष समेत 23 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए थे। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत ने 19 को फांसी और 14 को काला पानी की सजा सनाई थी। आजाद भारत में आज उन्हीं सपूतों का सिर कहीं और धड़ कहीं और पडा हुआ है। उनकी याद में बना शहीद स्मारक अपनों की लापरवाही से उपेक्षा का शिकार है। चौरी-चौरा उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले में एक गांव हैं. जो ब्रिटिश शासन काल में कपड़ों और अन्य वस्तुओं की बड़ी मंडी हुआ करता था. अंग्रेजी शासन के समय गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी. जिसका उद्देश्य अंग्रेजी शासन का विरोध करना था. इस आन्दोलन के दौरान देशवासी ब्रिटिश उपाधियों, सरकारी स्कूलों और अन्य वस्तुओं का त्याग कर रहे थे और वहाँ के स्थानीय बाजार में भी भयंकर विरोध हो रहा था. इस विरोध प्रदर्शन के चलते 2 फरवरी 1922 को पुलिस ने दो क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया था.

अपने साथियों की गिरफ़्तारी का विरोध करने के लिए करीब 4 हजार आन्दोलनकरियों ने थाने के सामने ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाजी की. इस प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने हवाई फायरिंग की और जब प्रदर्शनकारी नहीं माने तो उन लोगों पर ओपन फायर किया गया. जिसके कारण तीन प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए. इसी दौरान पुलिसकर्मियों की गोलिया खत्म हो गई और प्रदर्शनकारियों को उग्र होता देख वह थाने में ही छिप गए. अपने साथी क्रांतिकारियों की मौत से आक्रोशित क्रांतिकारियों ने थाना घेरकर उसमे आग लगा दी. इस घटना में कुल 23 ब्रिटिश पुलिसकर्मियों की जलकर मौत हो गई थी.

यह घटना जब गांधी को पता चली तो वो थाने में आग लगाने वाले तमाम क्रांतिकरियो से बहुत नाराज हुए थे . उन्होंने उनके लिए कठोर शब्दों का उपयोग किया था और इतना ही नहीं , चौरी चौरा के क्रांतिकारियों को ही दोषी बताते हुए उन्होंने अपना असहयोग आंदोलन वापस ले लिया. इसी के चलते चौरी चौरा के वो बलिदानी समाज की नजर में उपेक्षित हो गये और उनको ऐसे देखा जाने लगा जैसे गांधी का कहा न मान कर उन्होंने देश का कोई बहुत बड़ा नुक्सान कर दिया हो . 9 जनवरी 1923 के दिन चौरी-चौरी कांड के लिए 172 लोगों को आरोपी बनाया गया था. आज क्रांति के उस दिवस पर उन तमाम ज्ञात अज्ञात क्रांतिकारियों को बारंबार नमन करते हुए सुदर्शन परिवार उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प लेता है और साथ ही सवाल करता है उन तमाम बुद्धिजीवियों से कि उन्हें उस समय अकेला क्यों छोड़ दिया गया था ?

 

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