30 अगस्त- जन्म दिवस, अमर बलिदानी कनाईलाल. फांसी के दिन गहरी नींद से जब जगाया गया तो बोले- चलों, कहाँ चढना है फांसी ?

उस अमर बलिदानी कनाई लाल दत्ता जी का जन्म दिवस है आज जिसने दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल वाले गाने पर ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है जो शायद ही कोई आज़ादी का ठेकेदार जवाब के रूप में दे सके . वो वीर जिसे हर कोशिश की गयी इतिहास के पन्नो से हटा देने की . वो वीर जिसके नाम को यूं भुला दिया गया जैसे इन्होने कभी कुछ किया ही नहीं हो जबकि आज़ादी की आज ठेकेदारी लेने वाले और हर दिन संसद में किस सन्गठन ने क्या किया जैसे सवाल करने वाले क्यों नहीं बताते कि उन्होंने उग्र जवानी में फांसी चढ़ गए ऐसे वीरों के लिए क्या किया . अगर उनकी फांसी के समय ये परतंत्र थे तो आज़ादी के बाद 70 साल तक उन्होंने इनके परिवार के लिए क्या किया ?

अमर बलिदानी कनाई लाल जी का जन्म आज ही के दिन अर्थात 30 अगस्त 1888 को उस बंगाल के हुगली में हुआ था जो आये दिन बंगलादेशी घुसपैठयों से कहीं न कही घायल किया जा रहा है . 1905 ई. के ‘बंगाल विभाजन’ विरोधी आन्दोलन में कनाईलाल ने आगे बढ़कर भाग लिया तथा वे इस आन्दोलन के नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के भी सम्पर्क में आये। बी.ए. की परीक्षा समाप्त होते ही कनाईलाल कोलकाता चले गए और प्रसिद्ध क्रान्तिकारी बारीन्द्र कुमार घोष के दल में सम्मिलित हो गए और यहाँ वे उसी मकान में रहते थे, जहाँ क्रान्तिकारियों के लिए अस्त्र-शस्त्र और बम आदि रखे जाते थे। अप्रैल, 1908 ई. में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफ़ोर्ड पर आक्रमण किया। इस हमले में कनाईलाल दत्त, अरविन्द घोष, बारीन्द्र कुमार आदि पकड़े गये।

इनके दल का एक युवक नरेन गोस्वामी अंग्रेज़ों का सरकारी मुखबिर बन गया। कनाईलाल दत्त और सत्येन बोस ने नरेन गोस्वामी को जेल के अंदर ही अपनी गोलियों का निशाना बनाने का निश्चय किया। पहले सत्येन बीमार बनकर जेल के अस्पताल में भर्ती हुए, फिर कनाईलाल भी बीमार पड़ गये। सत्येन ने मुखबिर नरेन गोस्वामी के पास संदेश भेजा कि मैं जेल के जीवन से ऊब गया हूँ और तुम्हारी ही तरह सरकारी गवाह बनना चाहता हँ। मेरा एक और साथी हो गया, इस प्रसन्नता से नरेन्, सत्येन से मिलने जेल के अस्पताल जा पहुँचा। फिर क्या था, उसे देखते ही पहले सत्येन ने और फिर कनाईलाल दत्त ने उसे अपनी गोलियों से वहीं ढेर कर दिया।

दोनों पकड़ लिये गए और दोनों को मृत्युदंड मिला। कनाईलाल के फैसले में लिखा गया कि इसे अपील करने की इजाजत नहीं होगी। 10 नवम्बर, 1908 को मात्र 20 वर्ष की आयु में कनाईलाल कलकत्ता में फांसी के फंदे पर लटक कर शहीद हो गए। जेल में उनका वजन बढ़ गया था।फांसी का नाम सुनकर ही शायद किसी को नींद भी ना आये लेकिन फांसी के दिन जब जेल के कर्मचारी उन्हें लेने के लिए उनकी कोठरी में पहुँचे, उस समय कनाईलाल दत्त गहरी नींद में सोये हुए थे। और आराम से सो कर उठे उस बलिदानी ने अपने हाथ से महज 20 साल की उम्र मे फांसी का फंदा अपने हाथो से चूम लिया .. भारत की आज़ादी के ऐसे असली हकदार अमर और वीर बलिदानी को आज उनके पावन जन्म दिवस पर सुदर्शन न्यूज शत शत नमन करते हुए उनकी गौरव गाथा को सदा जन मानस तक पहुचने के अपने संकल्प को दोहराता है .

बलिदानी कनाई लाल जी अमर रहें .. 

Share This Post

Leave a Reply