14 फरवरी – आज ही रची गयी एक साजिश जिसके बाद हजारों बलिदानी क्रांतिकारियों को भुला कर याद किया जाने लगा “वैलेंटाइन” को, एक सन्त बता कर

ये साजिश नहीं तो और क्या है.. साथ समंदर पार विदेश की धरती पर कोई अगर किसी कारण से सज़ा पाता है तो पहले तो उस पर किसी को शक नहीं होता और सब कोई उसको शत प्रतिशत सत्य मान कर मन से मानने लगते हैं.. यहां ये बताना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हिंदुओं के शत प्रतिशत सत्य प्रमाणिक इतिहास रामायण व महाभारत के ऊपर सवाल उठाए जाते हैं , और कुछ लोग तो इसको सुप्रीम कोर्ट तक में बयान लगा कर दे देतें हैं कि श्रीराम का अस्तित्व ही नहीं था .. यद्द्पि बाद में वही मन्दिर मन्दिर चक्कर लगाते हुए खुद को हिन्दू साबित करने की हर संभव कोशिश करते हैं .. दोगलेपन का ये सबसे बड़ा उदाहरण है कि श्रीराम के अस्तित्व पर शक है लेकिन वैलेंटाइन पर जरा सा भी नहीं ..

ये तो बात थी इसके धार्मिक पक्ष की.. अगर चर्चा इसके समाजिक पक्ष की हो तो इस दिन को बड़ी सोची समझी साजिश के तहत न सिर्फ बड़े शहरों में बल्कि सुदूर ग्रामीण अंचल में रह रहे कई ग्रामीणों को भी संक्रमित कर डाला गया .  अगर वो इसमें लिप्त न भी हुए तो इस दिन को सबकी जानकारी में डाल ही दिया गया.. उन्होंने एक बार भी नही सोचा कि वैलेंटाइन क्या हैं उनके ? क्या रिश्ता है इस दिन से आखिर उनका ?  जिन्हें विदेश में जन्मे बाकी अन्य बड़ी बड़ी हस्तियों के बारे में नही पता वो वैलेंटाइन को कैसे जानने लगे ? वो भी एक सन्त के रूप में.जिनको सीरिया, फिलिस्तीन, इराक में चल रही खून की होली के बारे में जानकारी नही, जिनको पाकिस्तान व बंगलादेश में हो रहे हिंदुओं के नरसंहार की सूचना भी नही वो इतने साल पहले सात समंदर पार वैलेंटाइन के बारे में इतनी बारीकी से कैसे जानने लगे ?

अब चर्चा इसके राष्ट्रीय पक्ष की.. यहां सवाल ये जरूर बनता है कि क्या इस देश पर मर मिटे किसी भी क्रांतिकारी की जयंती या बलिदान दिवस इतनी श्रद्धा या इतने व्यापक स्तर पर मनाया जाता है ? भगत सिंह, मंगल पांडेय, राम प्रसाद बिस्मिल, चन्द्रशेखर आज़ाद, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, चाफेकर बन्धु, वासुदेव बलवंत फड़के आदि के नामों को क्या किसी भी दिन इतने वयापक स्तर पर लिया जाता है कि वो ट्विटर पर पूरे दिन ट्रेंड करते रहें जिस अंदाज में वो आज वैलेंटाइन डे के रूप में कर रहा है .. क्या प्रेम के प्रतीक के रूप में किसी भी और को नही जाना जा सकता है ? क्या इसके अतिरिक्त प्रेम का कोई और भी स्वरूप किसी की जानकारी में नही है ? भारत के ही लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देने वाले वीरों का बजाय एक उस व्यक्ति की चर्चा जिसका भारत से दूर दूर तक कोई नाता नहीं रहा, उनकी चर्चा करना क्या वीरों का अपमान नहीं है ?

अंत मे सवाल बनता है कि ये प्रचार किस ने किया ? किस ने एक ऐसा दिन शहर से ले कर सुदूर ग्रामीण अंचल तक कर डाला.. और उस से पहले इस दिन की खेती करने के लिए किस ने उन लोगों के मन को उपजाऊ बना डाला जो तमाम लोगों ने इसको हाथों हाथ स्वीकार कर लिया.. इसमें दोष उन तथाकथित मीडिया के वर्ग का भी है जिसने भारत का ही खा कर भारत के विरुद्ध साजिश रची..इसमें हमारे समाज के कुछ प्रमुख लोगों की निष्क्रियता भी शामिल है जो विदेशी साजिशों का प्रतिकार उचित रूप से नहीं कर सके .. फिलहाल इस जागरूक हुए समाज मे अब ये अवसर जरूर है कि एक बार फिर से हम आत्ममंथन करें और समझने की कोशिश करें कि हमारे मूल ग्रन्थ व संस्कृति को विलुप्त करवा कर हमें जो कुछ भी सौंपा या सिखाया जा रहा है उसके पीछे आखिरकार साजिश किस की है ? और वो हमें किस तरफ ले जा रही है ..

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