30 दिसंबर – 1949 में आज ही नेहरू ने गृहयुद्ध व जापान के हमले से तहस नहस कम्युनिस्ट चीन को दी थी मान्यता.. वही चीन जो बन गया भारत का सबसे बड़ा दुश्मन

निश्चित तौर पर बहुत कम लोग परिचित होंगे आज के इतिहास से.. ये वो इतिहास है जिसको या तो किसी के दूरदर्शिता की कमी माना जा सकता है और या तो किसी के एहसान फरामोशी का सबसे बड़ा प्रमाण..आज जिस प्रकार से भारत में भाई भाई के नारे लगते हैं एक बेहतर कल की आशा में , वैसे ही कभी भारत के उन्ही नेताओं ने हिंदी चीनी भाई भाई का नारा दिया था जिसको तब सिर्फ भारतीयों ने स्वीकार किया और रट भी रहे थे.. लेकिन पीछे से छुरा उस ने घोंपा जो सामने से खडा हो कर उस नारे पर मुस्करा रहा था.. एक बात और ध्यान देने योग्य है कि जब तक चीन कम्युनिस्ट नहीं था तब तक उसने भारत पर कभी हमला नहीं किया.. लेकिन जैसे ही वो कम्युनिस्ट हुआ, उसने हर लाज, हया, संस्कार, नियम, कानून आदि को फौरन त्याग दिया ..

विदित हो कि जापान के हमले से और आंतरिक गृहयुद्ध से जूझने के बाद आज ही के दिन अर्थात 30 दिसंबर 1949 को नए कम्युनिस्ट चीन को भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद से आगे बढ़ कर अन्तराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दी थी.. इतना ही नही, लड़खड़ाते चीन को हर संभव मदद व खुद से खड़े होने के लिए सभी जरूरत भी भारत की तत्कालीन नेहरू सरकार ने पूरी की थी.. कुछ लोगों का मानना है कि ये कार्य भले ही किसी भी भावना से किया जा रहा था लेकिन दूसरे शब्दों में इसको सांप को दूध पिलाना ही माना जायेगा..ये चीन वही है जो 1914 में कमजोर होने के कारण मैकमोहन लाइन अर्थात भारत चीन की 4 हजार किलोमीटर लंबी सीमा पर चुप था लेकिन जैसे ही सबल हुआ वैसे ही इसने 1962 में भारत पर अचानक हमला कर के हमारे कई सैनिको की जान ले डाली और जमीन का एक बड़ा हिस्सा अवैध कब्जे में ले लिया ..

आज वही चीन हर दिन भारत के लिए आर्थिक और सामरिक संकट पैदा कर रहा है .. ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाकर चीन सारा पानी अपनी ओर मोड़ रहा है जिसका भारत विरोध कर रहा है। साउथ चाइना सी में प्रभुत्व कायम करने की चीनी कोशिश। पीओके में चीनी गतिविधियों में इजाफा। हाल ही में चीन ने यहां 46 बिलियन डॉलर की लागत का प्रोजेक्ट शुरू किया है जिससे भारत खुश नहीं है। हिंद महासागर में तेज हुई चीनी गतिविधि लगातार तेज हो रही हैं। भारत लगातार इसका विरोध कर रहा है। जम्मू-कश्मीर को चीन भारत का अंग मानने में आनाकानी करता है। इस मामले में भी दोनो देशों के बीच विवाद गहराया हुआ है। चीन साउथ चाइना सी में प्रभुत्व कायम करने की कोशिश करना भारत की आंख में चुभता है।

चीन, पाकिस्तान और भारत के संयोजन में तिब्बती पठार के उत्तरपश्चिम में स्थित एक विवादित क्षेत्र है। यह कुनलुन पर्वतों के ठीक नीचे स्थित है। ऐतिहासिक रूप से अक्साई चिन भारत को रेशम मार्ग से जोड़ने का ज़रिया था और भारत और हजारों साल से मध्य एशिया के पूर्वी इलाकों जिन्हें तुर्किस्तान भी कहा जाता है और भारत के बीच संस्कृति, भाषा और व्यापार का रास्ता रहा है। भारत से तुर्किस्तान का व्यापार मार्ग लद्दाख और अक्साई चिन के रास्ते से होते हुए काश्गर शहर जाया करता था। 1950  के दशक से यह क्षेत्र चीन कब्‍जे में है। भारत इस पर अपना दावा जताता है। भारत इसे जम्मू और कश्मीर राज्य का उत्तर पूर्वी हिस्सा मानता है।

चीन अरुणाचल पर अपना दावा जताता है। इसीलिए अरुणाचल को विवादित बताने के लिए ही चीन वहां के निवासियों को स्टेपल वीजा देता है जिसका भारत विरोध करता है। भारत इस मामले में कई सालों से अकेला चीन का विरोध कर रहा है और चीन है कि इस घटना से बाज नहीं आ रहा है।सितंबर 1967 में भारत और चीन के बीच सीमा पर आखिरी बार जिस इलाके में जोरदार फायरिंग हुई थी, सिक्किम के बॉर्डर का वही इलाका इस वक्त दोनों देशो के की सेनाओं के बीच जोर आजमाइश का केंद्र बन गया है। सिक्किम के बॉर्डर पर ताजा विवाद में दोनों सेनाओं के बीच हुआ विवाद इतना गंभीर है। दोनों देशों के करीब 1000-1000 सैनिकों ने इस इलाके में डेरा डाल दिया था। भारत इस मामले में चीन के खिलाफ पिछले 40 सालों से अकेले डटा हुआ है।

269 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल का यह इलाका भारत,चीन और भूटान की सीमाओं के पास है। यही वह इलाका है जहां तीनों देशों की सीमाएं मिलती हैं। 1914 की मैकमोहन रेखा के मुताबिक यह इलाका भूटान के अधिकार में है। चीन इस लाइन को मानने से ही इनकार करता है। उसके सैनिक भूटान की सीमा का अतिक्रमण करते रहते हैं। डोकलाम के पठार की रणनीतिक रूप से इस इलाके में बेहद अहमियत है। चंबी घाटी से सटा हुआ होने के चलते चीन इस पठार पर अपनी सैन्य पोजीशन को मजबूत करना चाहता है। चीन की कोशिश है कि इस इलाके में सड़कों का जाल बिछाया जाए ताकि भारत के साथ युद्ध की स्थिति में जल्द से जल्द इस इलाके में सैन्य मदद पहुंचाई जा सके। डोकलाम के पठार पर चीन की इसी मंशा ने भारत को सख्त रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है।

व्यापार में भी चीनी वस्तुओं ने भारत के तमाम उद्योग धंधों को बंद करवा दिया.. तमाम हथकरघे भी बन्द हो गए.. बाज़ार में चीनी सामान खरीदने की होड़ जैसी मच गई है जिस से भारत के तमाम व्यापारी तबाह हो गए.., आज 1949 के उस फैसले की याद दिलाते हुए भारत की आम जनता से सवाल है कि वो आत्ममंथन करें कि तब सत्ता के शीर्ष से जो किया गया था क्या वो सही था ?

 

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