6 जनवरी – 1947 में आज ही “कांग्रेस” ने स्वीकार किया था अखण्ड भारत का विभाजन जिसके बाद गिरी असंख्य लाशें व सबसे ज्यादा नुकसान हिंदुओं का हुआ

बहुत कम ही लोगों को याद होगा आज का दिन, खैर याद भी कैसे हो जब बताया ही नहीं गया कभी..बताया क्या गया अगर इस पर नजर दौड़ाया जाय तो बाबर की महानता, अलाउद्दीन खिलजी का भारत पर उपकार, हिन्दू सम्राटो की कमियां, अकबर की उदारता और भी न जाने क्या क्या.. उस से जब समय मिला तो आज़ादी के पूरे अभियान में मात्र 1 या 2 लोगों की ही चर्चा जिसमें1857 व आज़ाद हिंद फौज का कहीं से कोई भी बात नही..इसको लिख कर कुछ तथाकथित गौ भक्षक भी नामी व पुरष्कार प्राप्त इतिहासकार हो गए और कुछ लोग भारत की स्वतंत्रता के इकलौते ठेकेदार.. स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद उनके नाम सिर्फ राजनीति के मैदान तक ही नहीं, खेल, रेल, जेल हर कहीं आ गए और आधा भारत उन्ही के नाम पर रख डाला गया..

विडंबना ये रही कि उन गलियों के नाम भी आज़ादी के कुछ गिने चुने ठेकेदारों के नाम पर पड़ गए जो गलियां किसी बहुत बड़े क्रांतिवीर के जन्म या बलिदान की गवाह रही हैं ..खैर इतिहास के पन्नो को अगर कुरेदा जाय तो साजिश की परत के नीचे ये साफ साफ नजर आएगा कि आज ही के दिन अर्थात 6 जनवरी सन 1947 को भारत की सबसे प्राचीन राजनैतिक पार्टी व भारत पर सबसे लंबे समय तक शासन में रहा राजनैतिक दल कांग्रेस ने अखण्ड व शस्य शयमला भारत के बंटवारे अर्थात टुकड़े होना स्वीकार कर लिया था .. कुछ इतिहासकारों के अनुसार ये मात्र 2 लोगों की महत्वाकांक्षी सोच का परिणाम था जिसके बाद भारत अखण्ड नहीं रह गया था..इसमें से एक थे जवाहरलाल नेहरु तो दूसरे थे मोहम्मद अली जिन्ना.. इन दोनों की व्यक्तिगत जिद आख़िरकार कामयाब ही हो गयी लेकिन तब तक बहुत बड़ा नुकसान हो चुका था.

यदि इस पूरे घटनाक्रम को देखा जाय तो इन सब में सबसे ज्यादा हानि हिन्दू समाज ने उठाई.. उनके पूर्वजो के हिस्से की भूमि सदा के लिए चली गयी और मुस्लिमों को भारत के 2 बड़े टुकड़े मिलने के बाद भी भारत मे सम्मान व सुरक्षा के साथ अल्पसंख्यक नाम से अतिरिक्त अधिकार भी प्राप्त हुए थे लेकिन वहीं हिंदुओं को क्या मिला ये सवाल आज भी ज्यों का त्यों है जिस पर कभी भारत का विभाजन स्वीकार करने वाली पार्टी ने बयान नही दिया .. उस समय का अधिकांश मुस्लिम जिन्ना को अपना नेता मान चुका था और उनके हाँ में हाँ मिला रहा था.. जिन्ना भी खुल कर मुस्लिमों की पैरवी करता था लेकिन हिंदुओं ने अपना प्रतिनिधित्व जवाहरलाल नेहरू व गांधी को सौंपा था जिसमें गांधी सेकुलर व नेहरू खुद के हिंदुत्व के बारे में अपनी किताब में लिखते थे कि वो सिर्फ जन्म से हिन्दू हैं..उस समय हिंदुओं के पास हिन्दू महासभा व वीर सावरकर जैसे विकल्प थे लेकिन हिंदुओं का एक बड़ा तबका गांधी से प्रभावित रहा और सेकुलर सिद्धांतो पर ही चलता रहा ..

वीर सावरकर उस समय भी लोगों को समझाते रहे कि हिन्दू व मुस्लिम 2 अलग अलग संस्कृतियां हैं जो एक साथ रहने में समस्या महसूस करेंगी पर उनकी बातों को मात्र साम्प्रदायिक शब्द बोल कर अनसुना कर दिया गया ..यद्द्पि उनके द्वारा उस समय बताए गए कई शब्द आज कश्मीर , असम, बंगाल आदि के हालात को देख कर सही साबित हो रहे हैं ..उस समय भारतीय राजनीति 2 धुरो में सीमित रह गयी थी.. पहली कट्टर मुस्लिमो का प्रतिनिधित्व करने वाली मुस्लिम लीग तो दूसरी सेकुलर लोगों का प्रतिनिधित्व करती कांग्रेस.. हिंदुत्व की बात करने वाली हिन्दू महासभा के स्थान लगभग गौड़ ही रह गया था क्योंकि उसके ऊपर साम्प्रदायिक ताकत का ठप्पा लगा कर वीर सावरकर जी जैसे सूरमाओं को झूठे आरोपो से थोपा जा रहा था जो कमोबेश आज भी जारी है . फिर आखिरकार आज कांग्रेस की सहमति के बाद राष्ट्र आगे चल कर बंट गया और हिंदुओं का अभूतपूर्व नरसंहार हुआ..मुस्लिमों को इसी देश के 2 खंड मिले लेकिन हिन्दू समाज को एक सेकुलर देश मिला जिसमें सेना के दम पर मिला कश्मीर भी शामिल है जहां हिन्दू मुख्यमंत्री बनने की संभावना लगभग न के बराबर मानी जाती है और उनके ही मूल निवासियों को वहां उन्मादी नारे लगा कर खदेड़ दिया जाता है ..

उस समय मोतीलाल नेहरू कमेटी ने अन्य बातों के अलावा इस बात की भी सिफ़ारिश की थी कि सेंट्रल एसेम्बली में मुसलमानों के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित हों.लेकििन हिन्दू महासभा ने इसे लागू नही होने दिया. आज 6 जनवरी को उस दिवस की याद कांग्रेस को दिलाते हुए सुदर्शन परिवार दंगों, विभाजन में हुतात्मा हुए सभी हिंदुओं को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि समर्पित करता है व हिंदुओं को उनकी कथित धर्मनिपेक्षता से हुई लाभ हानि के आँकलन की सलाह देता है..

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