26 जनवरी- नागालैंड की “रानी गाइदिन्ल्यू” जयंती.. साथी वीरगति पाए, फिर भी लड़ती रहीं गुलामी व धर्मान्तरण के खिलाफ युद्ध

यकीनन 26 जनवरी अर्थात गणतंत्र दिवस की चर्चा उन वीरो व वीरांगनाओं का नाम लिए बिना अधूरी होगी जिन्होंने अपने रक्त से सींच कर भारत को स्वतंत्रता दिलाई थी .. राष्ट्र आज उन्हें भी याद करे जो पहले तो अंग्रेजो के निशाने पर रहे और बाद में बन गए स्वतन्त्र भारत के गुलाम मानसिकता वाले वो तथाकथित नकली कलमकार जिनकी बिकी कलम उनके ही गुण गाती रही जो भारत को बर्बाद कर के चले गए थे .  नकली कलमकारों की साजिश की शिकार एक वीरांगना का जन्मदिवस आज अर्थात 26 जनवरी को है जिनका नाम रानी गाइदिन्ल्यू है . नागालैंड में जन्मी इस वीरांगना को पूर्वोत्तर की रानी लक्ष्मीबाई भी कहा जाता है जिनकी जंग थी ब्रिटिश सत्ता व धर्मान्तरण के खिलाफ ..और शायद यही बात रास नही आई नकली कलमकारों को .

नागालैण्ड की रानी लक्ष्मीबाई’ रानी गाइदिनल्यू का जन्म आज ही के दिन 26 जनवरी 1915 को हुआ था , पूर्वोत्तर की रानी लक्ष्मीबाई बोली जा सकने वाली इस वीरांगना के नाम को इतिहास में शामिल न करने के बहुत बड़े कारणों में से एक ये भी है कि आजादी के नकली ठेकेदारों को धीरे धीरे पूर्वोत्तर को भारत से आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से इतना अलग कर देना जो आज नागालैंड की चर्च वोट देने के फतवे जारी कर रही ..अपनी कुत्सित सोच में काफी हद तक कामयाब भी रहे आज़ादी के नकली ठेकेदार जिन्हें इस कार्य मे चाटुकार और झोलाछाप इतिहासकारों का पूरा साथ और सहयोग मिला ….

रानी नगा आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता थी जिन्होंने नगालैंड में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत की थी। महज़ 13 साल की उम्र में वे अपने चचेरे भाई जादोनाग के ‘हेराका’ आन्दोलन में शामिल हो गयीं। आन्दोलन का लक्ष्य प्राचीन नगा धार्मिक मान्यताओं की बहाली और पुनर्जीवन करना था। धीरे-धीरे यह आन्दोलन ब्रिटिश विरोधी हो गया। गाइदिनल्यू मात्र 3 साल में ब्रिटिश सरकार के विरोध में लड़ने वाली एक छापामार दल की नेता बन गयीं। धीरे-धीरे कई कबीलों के लोग इस आन्दोलन में शामिल हो गए और इसने ग़दर का रुप धारण कर लिया।वे नागाओं के पैतृक धार्मिक परंपरा में विश्वास रखती थीं इसलिए जब अंग्रेज़ों ने नगाओं का धर्म परिवर्तन कराने की मुहिम शुरु की तो गाइदिनल्यू ने इसका जमकर विरोध किया।

हेराका पंथ में रानी गाइदिनल्यू को चेराचमदिनल्यू देवी का अवतार माना जाने लगा। सन 1931 में जब अंग्रेजों ने जादोनाग को गिरफ्तार कर फांसी पर चढ़ा दिया तब रानी गाइदिनल्यू उसकी आध्यात्मिक और राजनीतिक उत्तराधिकारी बनी। उन्होंने अपने समर्थकों को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खुलकर विद्रोह करने के लिया कहा। उन्होंने अपने लोगों को कर नहीं चुकाने के लिए भी प्रोत्साहित किया। कुछ स्थानीय नागा लोगों ने खुलकर उनके कार्यों के लिए चंदा दिया।ब्रिटिश प्रशासन उनकी गिरफ़्तारी की ताक में था लेकिन रानी असम, नागालैंड और मणिपुर के एक-गाँव से दूसरे गाँव घूम-घूम कर प्रशासन को चकमा दे रही थीं।

असम के गवर्नर ने दो टुकड़ियाँ उनको और उनकी सेना को पकड़ने के लिए भेजा। इसके साथ-साथ प्रशासन ने रानी गाइदिनल्यू को पकड़ने में मदद करने के लिए इनाम भी घोषित कर दिया और अंततः 17 अक्टूबर 1932 को रानी और उनके कई समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया।रानी गाइदिनल्यू को इम्फाल ले जाया गया जहाँ उनपर 10 महीने तक मुकदमा चला और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। प्रशासन ने उनके ज्यादातर सहयोगियों को या तो मौत की सजा दी या जेल में डाल दिया। सन 1933 से लेकर सन 1947 तक रानी गाइदिनल्यू गौहाटी, शिल्लोंग, आइजोल और तुरा जेल में कैद रहीं। अपनी रिहाई से पहले उन्होंने लगभग 14 साल विभिन्न जेलों में काटे थे। रिहाई के बाद वे अपने लोगों के उत्थान और विकास के लिए कार्य करती रहीं।

सन 1972 में उन्हें ‘ताम्रपत्र स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार’, 1982 में पद्म भूषण और 1983 में ‘विवेकानंद सेवा पुरस्कार’ दिया गया। सन 1991 में वे अपने जन्म-स्थान लोंग्काओ लौट गयीं जहाँ 17 फरवरी 1993 को 78 साल की आयु में उनका निधन हो गया।रानी धर्मांतरण की जिन मशीनों के खिलाफ जीवन भर लड़ी उन्ही का आज नागालैंड पर ऐसा बोलबाला है कि उन्होंने वोट किसे देना है किसे नहीं या सरकार किसकी बनवानी है और किस की गिरवानी है जैसे फतवे जारी करने शुरू कर दिए हैं ..आज रानी की जयंती पर उन्हें बारम्बार नमन करते हुए उनकी यश गाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प सुदर्शन परिवार लेता है …
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