30 नबम्बर – स्वदेशी आंदोलन के प्रणेता व आयुर्वेद पद्धति के पुनरुद्धारक श्रद्धेय राजीव दीक्षित जी बलिदान दिवस.. जिनके एक एक शब्द में छिपी है क्रांति की प्रेरणा

उनका जीवन समाज के लिए एक ऐसी प्रेरणा थी जो किसी को भी अपने देश के गौरवशाली अतीत की तरफ स्वतः ले जाती थी. भारत के प्राचीन पद्धति के सहारे से भले ही कोई विकसित कहा जाने लगा हो लेकिन राजीव दीक्षित जी के व्याख्यानों से दुनिया ने जाना कि जहां आज तथाकथित विकसित लोग हैं वहां से भी आगे हम हजारों वर्ष पहले थे .. ओजस्वी वक्ता, क्रांतिकारी विचारधारा के प्रणेता व आयुर्वेदिक पद्धति के पुनरुद्धारक श्रद्धेय राजीव दीक्षित जी का आज बलिदान दिवस है. उनके असामयिक स्वर्गवास ने कई सवाल खड़े किए थे जो अब तक अनुत्तरित ही हैं लेकिन इतना तो तय है कि उनके स्वर्गवास से भारत को वो अपूरणीय क्षति हुई है जो शायद ही वापस भरी जा सके .. आईये आज देते हैं उस महान व्यक्तित्व को भावभीनी श्रद्धांजलि व याद करते हैं उनके व्याख्यानों को ..

पश्चिमी आधुनिकता की अंधी दौड में भाग रहे कुछ कथित आधुनिकों ने शायद ही राजीव दीक्षित का नाम सुना होगा लेकिन आपको बता दें कि ये एक वैज्ञानिक, प्रखर वक्ता और आजादी बचाओ आन्दोलन के संस्थापक थे. बाबा रामदेव ने उन्हें भारत स्वाभिमान के राष्ट्रीय महासचिव का दायित्व सौंपा था, इस पद पर वो अपनी मृत्यु तक रहे थे. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि राजीव भाई ने हमेशा ही स्वदेशी चीजें इस्तेमाल करने की बात कही थी.राजीव दीक्षित का जन्म 30 नवंबर 1967, यूपी के अलीगढ़ में राधेश्याम और मिथिलेश कुमारी के घर हुआ. बताते है कि उन्होनें डॉ. अब्दुल कलाम के साथ भी काम किया.

राजीव भाई शुरू से ही आयुर्वेद पर पूरी तरह से भरोसा करते थे. राजीव दीक्षित अंगूठे पर मेथी का दाना बांधकर जुकाम ठीक कर लिया करते थे. उनका कहना था कि वे 20 सालों मे एक बार भी बीमार नहीं पड़े. राजीव दीक्षित बचपन में हर महीने 800 रूपए सिर्फ मैगजीन और अखबार पढ़ने में खर्च करते थे. इस शख्स की रूचि बालकपन से ही देश की समस्याओं को जानने में थी.

राजीव दीक्षित जी ‘स्वदेशी’ के प्रखर प्रवक्ता थे. उनके मन में बस एक बात बैठी हुई थी ‘स्वदेशी’ चीजों का लोग इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा करें. राजीव दीक्षित, विदेशी कंपनियों को देश से भगाना चाहते थे. वो भारत के मेडिकल सिस्टम को आयुर्वेद पर आधारित करना चाहते थे. राजीव भाई का कहना था कि वो भारत के एजुकेशन सिस्टम को मैकॉले की देन बताते थे. उनके अनुसार शिक्षा के लिए गुरूकुल का तरीका ही सबसे अच्छा होता है.

राजीव दीक्षित ने पूरे देश में घूम-घूमकर स्वदेशी का प्रचार किया. और अपने जीवन में 13 हजार से ज्यादा व्याख्यान दिए. इनके व्याख्यान आज भी इंटरनेट पर उपलब्ध है. राजीव दीक्षित जी की मौत उसी दिन हुई जिस दिन जन्म हुआ था. 30 नवंबर, मतलब उनकी जयंती और पुण्यतिथि एक ही दिन है. उनका निधन 30 नवंबर 2010, को छतीसगढ़ के भिलाई में हुआ. आज यद्द्पि उनकी असामयिक मृत्यु कई ऐसे सवाल छोड़ गई जो आज भी जवाब की प्रतीक्षा में हैं .. स्वदेशी आंदोलन के उस महान प्रणेता को उनके बलिदान दिवस पर बारम्बार नमन करते हुए उनके यशगान व शिक्षाओं को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प सुदर्शन परिवार दोहराता है ..

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