10 फरवरी- बलिदान दिवस क्रांतिवीर सोहनलाल पाठक.. जब कहीं चल रहा था चरखा तब हांगकांग, मनीला, अमेरिका से ला रहे थे हथियार और बर्मा में झूल गये फांसी

कभी एक दौर था जिसको गुलामी कहा जाता था, उस समय इंसानों को दास बना कर रखने की प्रथा थी और उसको दुनिया को दिखाने के लिए एक बड़ा स्टेट्स सिम्बल कहा जाता था . ये मुगलों और ईसाई शासको में सबसे ज्यादा था जिन्होंने एक प्रकार से दूसरे देशो पर हमला कर के उन्हें जीत कर अपना दास बनाने के लिए सबसे ज्यादा ख़ून बहाया है . भारत तो इन दोनों का शिकार हुआ और एक बड़ा भूभाग सदियों की गुलामी में रहा . इस सदियों की परधीनाता को खत्म करना इतना आसान भी नही था ..

जिस हिसाब से कुछ इतिहासकारों ने लिख दिया कि भारत को आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल के आई वो अगर जमीनी स्तर पर देखा जाय तो सम्भव ही नहीं है . संसार को रौंद देने वालों ने भारत में वैसे ही हथियार डाल दिए क्या ये किसी भी रूप में तार्किक प्रतीत होता है .. शयद किसी भी हालत में नहीं , फिर भी ये आम धारणा बन गयी कि देश को आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल मिली है . इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव हुआ नई युवा पीढ़ी पर जो वीरों का इतिहास पढने से वंचित रह गयी .

उन तमाम ज्ञात और अज्ञात वीर बलिदानियों में से एक हैं आज अमरता को प्राप्त करने वाले क्रन्तिकारी सोहनलाल पाठक जी . यकीनन इस नाम से आप ठीक से परिचित नहीं होंगे .. ये भी साजिशो के शिकार उन तमाम वीरों में से हैं जिनको अंग्रेजो से ज्यादा भारत के उन नकली कलमकारों ने पीड़ा दी है जिनकी स्याही अक्रान्ताओ की जयकार में ही खत्म हो गयी . सोहनलाल पाठक भारत के वो वीर बलिदानी हैं जिन्होंने संसार के तमाम देशो से हथियार जमा किये और खुद भी स्वाहा हो गये देश को स्वतंत्र करवाने के लिए .

उनका जन्म पंजाब के अमृतसर जिले के पट्टी गाँव में सात जनवरी, 1883 को श्री चंदाराम के घर में हुआ था। पढ़ने में तेज होने के कारण उन्हें कक्षा पाँच से मिडिल तक छात्रवृत्ति मिली थी। मिडिल उत्तीर्ण कर उन्होंने नहर विभाग में नौकरी कर ली। फिर और पढ़ने की इच्छा हुई, तो नौकरी छोड़ दी। नार्मल परीक्षा उत्तीर्ण कर वे लाहौर के डी.ए.वी. हाईस्कूल में पढ़ाने लगे। एक बार विद्यालय में जमालुद्दीन खलीफा नामक निरीक्षक आया। उसने बच्चों से कोई गीत सुनवाने को कहा। देश और धर्म के प्रेमी पाठक जी ने एक छात्र से वीर हकीकत के बलिदान वाला गीत सुनवा दिया। इससे वह बहुत नाराज हुआ।

इन्हीं दिनों पाठक जी का सम्पर्क स्वतन्त्रता सेनानी लाला हरदयाल से हुआ। वे उनसे प्रायः मिलने लगे। इस पर विद्यालय के प्रधानाचार्य ने उनसे कहा कि यदि वे हरदयाल जी से सम्पर्क रखेंगे, तो उन्हें निकाल दिया जाएगा। यह वातावरण देखकर उन्होंने स्वयं ही नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। जब लाला लाजपतराय जी को यह पता लगा, तो उन्होंने सोहनलाल पाठक को ब्रह्मचारी आश्रम में नियुक्ति दे दी। पाठक जी के एक मित्र सरदार ज्ञानसिंह बैंकाक में थे। उन्होंने किराया भेजकर पाठक जी को भी वहीं बुला लिया।

दोनों मिलकर वहाँ भारत की स्वतन्त्रता की अलख जगाने लगे; पर वहाँ की सरकार अंग्रेजों को नाराज नहीं करना चाहती थी, अतः पाठक जी अमरीका जाकर गदर पार्टी में काम करने लगे। इससे पूर्व वे हांगकांग गये तथा वहाँ एक विद्यालय में काम किया। विद्यालय में पढ़ाते हुए भी वे छात्रों के बीच प्रायः देश की स्वतन्त्रता की बातें करते रहते थे। हांगकांग से वे मनीला चले गये और वहाँ बन्दूक चलाना सीखा। अमरीका में वे लाला हरदयाल और भाई परमानन्द के साथ काम करते थे।

एक बार दल के निर्णय के अनुसार उन्हें बर्मा होकर भारत लौटने को कहा गया। बैंकाक आकर उन्होंने सरदार बुढ्डा सिंह और बाबू अमरसिंह के साथ सैनिक छावनियों में सम्पर्क किया। वे भारतीय सैनिकों से कहते थे कि जान ही देनी है, तो अपने देश के लिए दो। जिन्होंने हमें गुलाम बनाया है, जो हमारे देश के नागरिकों पर अत्याचार कर रहे हैं, उनके लिए प्राण क्यों देते हो ? इससे छावनियों का वातावरण बदलने लगा। पाठक जी ने स्याम में पक्कों नामक स्थान पर एक सम्मेलन बुलाया। वहां से एक कार्यकर्ता को उन्होंने चीन के चिपिनटन नामक स्थान पर भेजा, जहाँ जर्मन अधिकारी 200 भारतीय सैनिकों को बर्मा पर आक्रमण के लिए प्रशिक्षित कर रहे थे।

एक दिन पाठक जी गुप्तरूप से जब फौज़ के जवानों को देशभक्ति और अंग्रेजों के विरुद्ध मरने-मारने का पाठ पढ़ा रहे थे, अचानक एक भारतीय जमादार ने उनका दांयाँ हाथ पकड़ लिया और अपने अफ़सर के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए ले जाने का बलात् प्रयास करने लगा। पाठकजी को यह आशंका न थी। उन्होंने जमादार को काफी समझाया पर वह नहीं माना। यद्यपि पाठकजी उस समय सशस्त्र थे, जमादार का काम तमाम कर सकते थे। लेकिन एक भारतीय भाई का खून अपने हाथों से बहाना उन्होंने उचित नहीं समझा । उन्हें लगा कि इस कृत्य से उनका क्रांतिकारी संगठन कलंकित हो जायेगा । वे स्वयं गिरफ़्तार हो गए। मुक़दमा चला और उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गयी। जेल में उन्होंने कभी जेल के नियमों का पालन नहीं किया। उनका तर्क था कि जब अंग्रेज़ नियमों को नहीं मानते तो उनके नियमों का बन्धन कैसा ? बर्मा के गवर्नर जनरल ने जेल में उनसे कहा- ‘अगर तुम क्षमा मांग लो तो फांसी रद्द की जा सकती है।’

पाठकजी ने जवाब दिया- ‘अपराधी अंग्रेज हैं, क्षमा उन्हें मांगनी चाहिए. देश हमारा है। हम उसे आज़ाद कराना चाहते हैं। इसमें अपराध क्या है?’ यद्यपि उन्होंने किसी को मारा नहीं था; पर शासन विरोधी साहित्य छापने तथा विद्रोह भड़काने के आरोप में उन पर मुकदमा चला। उनके साथ पकड़े गये इनके 4 सहयोगी क्रांतिकारियों को कालेपानी की सजा दी गयी; पर पाठक जी को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त जान कर आज के ही दिन अर्थात 10 फरवरी, वर्ष 1916 को सुभाष चन्द्र बोस जी की कर्म स्थली बर्मा की मांडले जेल में फाँसी दे दी गयी। बर्मा जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि फांसी के समय पाठकजी ने जल्लाद के हाथों से फांसी का फंदा छीन कर स्वयं अपने गले में डाल लिया था.  आज राष्ट्र की स्वतंत्रता के उस महानायक को उनके बलिदान दिवस पर शत शत नमन करते हुए उनकी यशगाथा को सदा सदा के लिए अमर रखने का संकल्प सुदर्शन परिवार लेता है .

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