20 मई- 2001 में आज से अफगानिस्तान में हिन्दुओ- सरदारों को फ़रमान जारी हुआ अलग कपड़े पहनने का. फिर हिन्दू- सिख 2 लाख 22 हजार परिवार से घट कर रह गए मात्र 200 घर

ये वो इतिहास है जो भविष्य बनने के लिए अग्रसर हो रहा है . उसको भुलाने की कोशिश कराई गई जिस से राजनीति की फसल लहलहाती रहे . कभी हिंदू और सिख अफगान समाज का स्मृद्ध तबका हुआ करता था. अब मुट्ठीभर ही बचे हैं. बढ़ती असहिष्णुता और शोषण का आरोप लगाकर ज्यादातर लोग अपने मुल्क को छोड़कर चले गए हैं. अफगानिस्तान में कभी दो लाख 20 हजार हिंदू और सिख परिवार थे. अब 220 रह गए हैं. इस अल्पसंख्यक समुदाय की जान, धर्म, ईमान हर चीज पर हमला हो रहा है. लिहाजा वे भाग रहे हैं.

अफगानिस्तान में रह रहे एक सरदार जगतार सिंह की  रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्ची घटना में जगतार सिंह लाघमणी काबुल में अपनी दुकान पर काम कर रहे थे. एक युवक उनके पास आया छुरा दिखाकर बोला, मुसलमान हो जाओ, नहीं तो गला काट दूंगा. जून की शुरुआत में हुआ यह हमला पहला नहीं था. अफगानिस्तान के सिख और हिंदू अक्सर इस तरह के हमलों से दो-चार हो रहे हैं. तेजी से कट्टर इस्लामिक होते जा रहे अफगानिस्तान में इस तरह के हमले आम हो रहे हैं और अल्पसंख्यकों की मुश्किलें बढ़ रही हैं.तालिबान की धमकी मिली थी कि समुदाय को दो लाख अफगानी यानी करीब तीन हजार अमेरिकी डॉलर्स हर महीने देने होंगे.. ये उनके अनुसार जजिया कर था जो उनके जीने के लिए लगाया जाता था ..

हिंदू और सिख सदियों से अफगानिस्तान में रह रहे हैं. वे वहां के व्यापार जगत का अहम हिस्सा रहे हैं. साहूकारी का काम यही तबका किया करता था. लेकिन आजकल उनकी पहचान जड़ी-बूटियों की दुकानों के लिए है. नेशनल काउंसिल ऑफ हिंदू ऐंड सिख के चेयरमैन अवतार सिंह बताते हैं कि 1992 में काबुल में तख्तापलट के वक्त दो लाख 20 हजार परिवार थे जो अब घटकर सिर्फ 220 रह गए हैं. कभी ये पूरे मुल्क में फैले हुए थे लेकिन अब बस नांगरहार, गजनी और काबुल के आसपास ही बचे हैं.

तालिबान ने अफगानिस्तान में शरिया लागू किया था. तब सार्वजनिक तौर पर लोगों को कत्ल किया जाता था. लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी थी. हिंदुओं और सिखों पर भी सख्ती थी. उन्हें पीले पट्टे पहनने पड़ते थे ताकि उन्हें पहचाना जा सके.ये नियम आज ही लगाया गया था अर्थात 20 मई सन 2001 को..इस से उनके घरों को लूटना , बलात्कार आदि का चिन्ह मिल जाया करता था ..सरकार में बैठे ताकतवर लोगों ने सिखों व हिंदुओं की जमीनें छीन ली हैं. उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं. छोटा समाज दिन ब दिन और छोटा होता जा रहा है.” इस पीड़ा को झेलने वाले जगतार बताते हैं, “हमारा दिन ऐसे ही शुरू होता है. डर और अकेलेपन के साथ. अगर आप मुसलमान नहीं हैं, तो उनकी नजरों में आप इन्सान नहीं हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं, कहां जाऊं.”

कालचा में जो कुछ हो रहा है, उससे इन अल्पसंख्यकों की स्थिति समझी जा सकती है. काबुल के साथ सटे कालचा इलाके में पहले ज्यादातर हिंदू और सिख ही रहते थे. उनके पास वहां एक श्मशान घाट है. हाल के दिनों में काबुल फैला है और बहुत से मुस्लिम परिवार कालचा में रहने आ गए हैं. लेकिन अब वे इस श्मशान घाट को लेकर विरोध कर रहे हैं. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि अंतिम संस्कार के लिए पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़ती है. अवतार सिंह कहते हैं, “वे हम पर ईंटें और पत्थर फेंकते हैं. मुर्दों पर पत्थर फेंकते हैं.”

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