फौजियों के हत्यारे, देश विरोधी, पाकिस्तान परस्त दुर्दांत आतंकियों की लाशों को सम्मान से सौंपने की वकालत करने वाले दल ने कभी देखने भी नहीं दी थी नाथूराम गोडसे की लाश उनके परिजन तक को

यकीनन आपने कुछ देशभक्त टी वी चैनलों पर , यूट्यूब पर या फेसबुक आदि पर आतंकियों के जनाजों की तस्वीरें देखी होंगी या उसके विडियो भी देखे होंगे . उसमे भारत के खिलाफ , भारत की पुलिस और सेना के खिलाफ लगते उन्मादी नारों के बीच पाकिस्तान का समर्थन कर रहे कुछ उन्मादी भी दिखे होंगे . लेकिन उसी समय टी वी पर एकाध ख़ास पार्टी के बड़े नेताओं द्वारा न सिर्फ उन भारत विरोधी नारे लगाने वालों का बचाव करते देखा होगा साथ में ही मरे आतंकी की लाश को सम्मान दे कर दफनाने आदि के लिए पैरवी करते कुछ दलों को देखा होगा जो इसको भारत की धर्मनिरपेक्षता का मूल सिद्धांत बताते हैं . यद्दपि आतंक से लड़ते बाक़ी किसी देश में ऐसा नहीं है जिस प्रकार से महाशक्ति रूस और अमेरिका सीरिया, अफगानिस्तान और ईराक के आतंक प्रभावित क्षेत्रों में लड़ाकू विमान से बम बरसा कर निकल जाते हैं बिना ये परवाह किये कि वहां उन दुर्दांत आतंकियों और मानवता के दुश्मनों का अंतिम संस्कार ठीक से हो रहा होगा या नहीं . पर भारत की राजनीति थोडा अलग हट कर पर .. लेकिन सबके लिए नहीं .. नाथूराम गोडसे के साथ ऐसी कोई रियायत नहीं बरती गयी आज विपक्ष में बैठी उस पार्टी के द्वारा जो उस समय सत्ता में पूरे जोर शोर से थी .

नाथूराम गोडसे को 15 नवंबर 1949 को एक अन्य नारायण आप्टे के साथ फांसी दी गई थी। नाथूराम गोडसे का शव सरकार ने परिजन को नहीं दिया था। जबकि अभी भी वही पार्टियाँ जिनकी तत्कालीन सरकारें थी , वो कश्मीर के दुर्दांत आतंकियों की लाशें भी बाकायदा सम्मान के साथ उनके घर वालों को देने की न सिर्फ खुली पैरवी करती हैं अपितु उसको लागू करवा कर ही मानती हैं जबकि उसमे केवल भारत विरोधी नारे और सेना पर पत्थरबाजी की जाती है . पर शायद उन पार्टियों के लिए धर्मनिरपेक्ष भारत का मतलब बस यही और इतना भर ही है जो आशा है जनता सावधानी से देख और समझ रही है..

इस मुकदमे के बारे में एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसके तीन आरोपितों का कभी कोई पता नहीं चला. ये थे गंगाधर दंडवते, गंगाधर जादव और सूर्यदेव शर्मा. वे फरार हो गए थे और आज तक कोई नहीं जानता कि उनका क्या हुआ. आज याद किया जा सकता है नजीब नाम के एक कथित छात्र के लिए उसी पार्टी द्वारा किये गये प्रयास जो कभी सीबीआई तो कभी दिल्ली पुलिस को लगातार जोर डाल डाल कर पूछ रहे थे कि खोज कर लाओ नजीब कहाँ है . पर उस समय इस मुकदमे के ये तीन अहम लोग कहाँ चले गये , जिन्दा भी बचे या नहीं , ये कोई नहीं जानता और न ही किसी को जानने दिया गया . भले ही भारत की न्यायालय भी 31 साल से ज्यादा पुराने हाशिमपुरा मामले में PAC के जवानो को पूरी सतर्कता से सजा देती रही लेकिन बाकी किसी मामले के प्रमाण न मिलने का रोना सरकारे लगातार रोती रहीं और कुछ लोग न्याय से वंचित होते रहे .

गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को हुई थी. हत्या के जुर्म में गोडसे और आप्टे को मौत की सजा हुई. सावरकर को बरी कर दिया गया और बाकियों को उम्र कैद हुई. उच्च न्यायालय में अपील के बाद दो आरोपितों परचुरे और किष्टैया की सजा माफ हो गई जबकि बाकी की सजा बरकरार रही. गोडसे और आप्टे के लिए 15 नवंबर 1949 फांसी की तारीख तय हुई. इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय का विकल्प बचता था. लेकिन देश में तब सर्वोच्च न्यायालय नहीं था. उन दिनों उच्च न्यायालय के बाद अपील करनी हो तो मुकदमा इंग्लैंड स्थित प्रिवी काउंसिल में जाता था. लेकिन नाथूराम गोडसे किसी अंग्रेज द्वारा अपने जीवन का निर्धारण नहीं चाहते थे . वो नहीं चाहते थे कि उनके जीवन का फैसला विदेशी धरती से हो .

नाथूराम ने देवदास गांधी से कहा, मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूं। आज तुमने अपने पिता को खोया है। मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुंचा है। तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुंचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है। कृपया मेरा यकीन करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत रंजिश के चलते नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कोई खराब भाव।  नाथूराम ने अपनी आखिरी भाषण में कहा था कि ‘मेरा पहला दायित्व हिंदुत्व और हिंदुओं के लिए है, एक देशभक्त और विश्व नागरिक होने के नाते। 30 करोड़ हिंदुओं की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा अपने आप पूरे भारत की रक्षा होगी, जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है। इस सोच ने मुझे हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नजदीक किया। मेरे विचार से यही विचारधारा हिंदुस्तान को आजादी दिला सकती है और उसे कायम रख सकती है।’ नाथू का कहना था कि वो गांधी से प्रेरित था लेकिन उन्होंने देश का बंटवारे में अहम भूमिका निभाई और मुस्लमानों का साथ दिया और इसके एवज में उन्होंने ना जाने कितने ही हिंदू भेंट चढ़ गए।

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