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मिर्च पाउडर को “राष्ट्रीय आपदा” बताने वालों ने सैनिकों पर बरसते पत्थर घोषित कर रखा है “बच्चों की शरारत”

एक बार फिर से चर्चा में है राजनीति भारत की .. एक मिर्च पाउडर के हमले ने पहले दिल्ली सरकार को सक्रिय कर दिया तो उसके बाद इसी माध्यम से केंद्र सरकार की गर्दन पकड़ने की कोशिश की जाने लगी .. नेता जी के हिसाब से उन पर हुआ हमला प्राणघातक था और घुमा फिरा कर इसमें दोषी पुलिसकर्मियों को ठहराया जाने लगा जिसने बिना समय गंवाए उस व्यक्ति को हिरासत में ले कर सवाल जवाब शुरू कर दिए हैं ..सवाल ये भी खड़े हो रहे हैं कि अतिसुरक्षित स्थल पर कोई मिर्ची ले कर कैसे पहुँच गया जबकि इसी देश की संसद पर हुए हमले व मुम्बई के शेयर बाज़ार पर हुए ब्लास्ट के दोषियों के लिए राजनीति के दांव पेंच अपनाए गए थे ..

फिलहाल अचानक ही गर्म व मिर्च से भी ज्यादा लाल हुई राजनीति ने याद दिला दी देश के अखंडता की रक्षा अपने प्राण दे कर कर रहे सैनिको की..वो योद्धा जो 2 या 4 की संख्या में होते हैं और उन्हें 4 हजार से ज्यादा की भीड़ घेर कर पत्थरो से बींधना शुरू कर देती है .. उस समय भारत माता की आन मान शान की रक्षा का संकल्प लिया योद्धा 2 मोर्चो पर लड़ रहा होता है .. सीने पर गोलियां व पीठ पर पत्थर.. लेकिन इन दोनों दर्दो से ज्यादा एक और दर्दनाक पीड़ा झेलता ही वही जवान और वो पीड़ा सीने पर लग रही गोली या पीठ पर लग रहे पत्थर से ज्यादा दर्दनाक होती है ..

वो तीसरी पीड़ा होती है उस जवान के कानों में पड़ थी नेताओं की आवाजें जिसमे भारत विरोधी, पाकिस्तान परस्ती के नारे लगाती उस उन्मादी व जान लेने पर उतारू भीड़ के लिए बच्चे व मासूम शब्द के प्रयोग किये जाते हैं ..यही नहीं, आत्मरक्षा करते हुए अगर उस जवानों के हाथों उस उन्मादी भीड़ का कोई घायल भी हो जाता है तो दिल्ली में बैठे वो कथित नेता उस वीर को ही देश का दुश्मन साबित करने पर तुल जाते हैं जिसकी वर्दी भारत के स्वाभिमान का प्रतीक है . इसमे से अधिकतर सफेदपोश तो वो होते हैं जो दुबई तक भले ही घूम आये हैं पर कुपवाड़ा, शोपियां, किश्तवाड़ किस दिशा में है ये ठीक से जानते भी नहीं होंगे ..

फिलहाल इस मामले में राजनीति करते सभी विद्वत जनों से आशाव अपेक्षा है कि भले ही दिल्ली की मिर्च को राष्ट्रीय आपदा खुद से घोषित करें लेकिन राष्ट्र की अस्मिता बचा रहे योद्धाओं के मनोबल पर वार न करें .. उन्हें ठुल्ला जैसे शब्दों से सम्बोधित न करें, बटला के आतंकियों के बजाय इंसपेक्टर मोहनचंद शर्मा के बलिदान को याद कर के आंसू बहाएं ..साथ ही दुबई घूमने के बजाय अनंतनाग, नौशेरा, कारगिल जैसी जगहों पर जाएं औरस स्थिति को करीब से देखें जिस पर वो दिल्ली से ही बयान जारी कर दिया करते हैं ..

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