वर्दी वाले योद्धाओ पर झूठे आरोप केवल कश्मीर में नहीं बल्कि UP और बिहार में भी लगे हैं .. वर्दी के खिलाफ साजिश आज से नहीं, इतिहास गवाह है .. पढिये

कश्मीर में आये दिन पहले तो खुद से पत्थरबाजी और फिर गोलियां बरसा कर सैनिको को पहले तो घायल किया जाता है और उसके बाद कुछ की जान भी ले ली जाती है उसी के बाद एक वर्ग सामने आता है और तमाम मानवता , धर्मनिरपेक्षता आदि की बातें करते हुए सेना और पुलिस को आरोपी बना डालता है . वो उल्टा वर्दी वालों पर ही अपने साथ अत्याचार करने वाला एक क्रूर चेहरा घोषित करने की कोशिश करता है . यद्द्पि वर्तमान परिदृश्य में इस प्रकार के आरोप सबसे ज्यादा कश्मीर में ही दिखाई और सुनाई दे रहे हैं लेकिन इस से पहले ये बहुत बार हो चुका है जब इसको तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दबा दिया गया और जनता जानने से रह गयी उस सोच को जो अपनी ही रक्षा में तैनात वीर जवानो को देश के नागरिको का शत्रु घोषित करने की इच्छा रखते हैं .

वर्तमान समय में कश्मीर में सैनिको के साथ साथ ये आरोप उत्तर प्रदेश की पुलिस पर भी लगे हैं जिसने अपने सब इंस्पेक्टर जे पी सिंह और सिपाही अंकित तोमर जैसे रत्न खो कर अपराध के दमन में दिन रात एक कर रखा है . हैरानी की बात ये है की उस पुलिस पर उन्ही मुठभेड़ों पर सवाल उठाये जा रहे हैं जिसमे मरने वाला अपराधी कोई मुसलमान है .. ख़ास कर जान मुहम्मद और मुकीम काला जैसे वो दुर्दांत अपराधी जिनके चलते कैराना जैसे क्षेत्रों से हिन्दुओ को पलायन करना पड़ा था . इस मामले में मानवाधिकार आयोग ने भी आश्चर्यजनक रूप से तत्काल ही संज्ञान ले लिया और पुलिस को नोटिस जारी कर दिया ..

इन आरोपों का सिलसिला यहीं नहीं रुकता .. इतिहास में नोवाखली और मोपला जैसे नरसंहारों को सीधे सीधे भुला देने वालों ने उत्तर प्रदेश के हाशिमपुरा और बिहार के भागलपुर के दंगो को बेहतर ढंग से याद रखा है और उसमे न सिर्फ हिन्दू समाज को गलत ठहराने की कोशिश की जाती रही अपितु पुलिस को भी दंगाई के रूप में दिखाने और एकतरफा कार्यवाही व् सामूहिक नरसंहार का दोषी बताने व् बनाने की बातें की जाती रही .. हद तो ये रही की कुछ मामलों में पुलिस वालों को अदालत में खींच लिया गया और अपने जीवन भर समाज की रक्षा करने वाले पुलिस के जवानो को अंत में जीवन भर अदालतों के चक्कर लगाने पड़े ..

इन सभी दंगो में कहीं से भी एक भी लाईन अपनी गलती नहीं ली गयी . उनके एक भी लाईन में आज तक कहीं ये नहीं लिखा की उनकी भी दोष या गलती होना तो दूर , रही भी होगी . पहली घटना है बिहार के भागलपुर की जहाँ 1989 में करीब दो महीने तक भागलपुर जिला जलता रहा. बताया जाता है की इस दंगे की शुरुआत उन्होंने ही की थी जिन्होंने बाद में पुलिस तक को आरोपित कर डाला .. शहर और आसपास के करीब 250 गांव दंगे में झुलसते रहे. सरकारी दस्तावेजों में मरने वालों की गिनती 1,000 पर जाकर रुक जाती है. मगर लोग कहते हैं कि इन दस्तावेजों के बाहर करीब 1,000 लोग और मरे थे. इस मामले में भी पुलिस वालों को दोषी बताया गया था जबकि इन्ही चरमपंथियों से लड़ते हुए इसी दंगे में न जाने कितने पुलिस के जवान बुरी तरह से घायल हुए थे .

इसी प्रकार की घटना घटी थी अतिचर्चित हाशिमपुरा मामले में . ये हाशिमपुरा मेरठ में स्थित है जहाँ भीषण दंगा हुआ था सन १९८७ में . हिन्दुओ के घरों पर भयानक हमले हुए थे और हर तरफ बह रहा था खून . उसमे PAC के जवानो ने अपनी जान पर खेल कर लोगों को बचाया था और उसमे इन जवानो का खून भी बहा था . लेकिन बाद में उनके अंतिम सांस तक उनको अदालतों के चक्कर लगवाए गये और उन्हें दोषी घोषित कर दिया गया लगभग 40 मुसलमानों की हत्या का . पर आखिरकार एक लम्बी लड़ाई और मानसिक के साथ अर्थित दिक्कतों को झेलने वाले इन वीरों को दिल्ली की एक अदालत ने बरी कर दिया था . इतना ही नहीं , इन जवानों को ज्यादा दौड़ना पड़े इसके लिए इस मामले को मेरठ से ट्रांसफर कर के दिल्ली करवा लिया गया था … उक्त घटनाएँ ये बताती हैं की भारत के सहिष्णु लोग ही नहीं बल्कि भारत की सेना और पुलिस तक कुछ ऐसे कट्टरपंथी मानसिकता वाले लोगों के निशाने पर रही है जो आज भी उसी अंदाज़ में सक्रिय हैं . *

 

*- उपरोक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार हैं ..

लेखक –

राहुल पाण्डेय

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज

मोबाइल – 9598805228

 

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