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जातिवाद के विरोध में अपने नाम में श्रीवास्तव से शास्त्री जोड़ लिया था कभी जिस कांग्रेस पार्टी लाल बहादुर जी ने आज क्या उसी कांग्रेस की राजनीति का केंद्र बन चुका है जातिवाद ?

कहना गलत नहीं होगा कि देश आज जिन अति संवेदनशील मुद्दों से गुजर रहा है उसमे जातिवाद सबसे प्रमुख है. ये ऐसा मुद्दा है जिसने युगों युगों से एक ही परिवार के जैसे बंधे समाज को उसके अलग अलग होने का एहसास दिलाया है और इसमें अगर सच में किसी का सबसे ज्यादा हाथ है तो वो है भारत की वो राजनीति जिसकी भूख केवल कुर्सी की है भले ही वो कितने निर्दोष लोगों की लाशो को सीढ़ी बना कर आई रही हो . आने वाले समय को कभी दूरदृष्टा लाल बहादुर जी ने देख लिया था ..

शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 1965 में भारत पाकिस्तान का युद्ध हुआ जिसमें शास्त्री जी ने विषम परिस्थितियों में देश को संभाले रखा। सेना के जवानों और किसानों महत्व बताने के लिए उन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा भी दिया।जन्‍म से लाल बहादुर शास्‍त्री जाति प्रथा के घोर विरोधी थे. इसलिए उन्‍होंने कभी भी अपने नाम के साथ अपना सरनेम नहीं लगाया. इसलिए उन्होने उनके नाम के आगे न सिर्फ अपना उपनाम लिखना बंद कर दिया बल्कि अपने तमाम जीवन काल में उन्होंने हिन्दुओं में जहर की तरह फैले जातिवाद को भी खत्म करने के लिए जीवन भर के लिए प्रयास किया जिसमे वो काफी सफल रहे थे .

पर आज उनके ही प्रयासों को चुनौती मिल रही उस पार्टी से जो उनके सत्कर्मो से कभी देश की संसद से ले कर गाँव के प्रधानी तक काबिज़ रहती थी . आज कभी दलित के नाम पर आन्दोलन को समर्थन तो कभी सवर्ण के नाम पर हंगामा और उस हंगामे को परोक्ष रूप से समर्थन कांग्रेस का . अभी हाल में ही पुलिस द्वारा लखनऊ में चली गोली को जातिवाद का रूप देते हुए कांग्रेस की संभावित गठबंधन की साथी मायवती ने ब्राह्मण को निशाना बनाने जैसी बातें बोली तो एहसास होता है कि कहीं न कहीं उनकी वो पार्टी उस राह पर है जिस राह से कभी शास्त्री जी का कोई रिश्ता तक नहीं था .  लाल बहादुर शास्त्री जी को उनकी जयंती पर बारम्बार नमन और निवदेन है कि जातिवाद उन्मूलन पर पर उनके किये कार्यों को प्रेरणा बनाया जाय जिस से देश की समरसता और अखंडता कायम रहे .

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