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उत्तर प्रदेश पुलिस में तैयार हो चुका है एक और सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह. उसका नाम कांस्टेबल प्रशांत है

शुरुआत में थोडा पीछे जाना होगा . जब दिल्ली पुलिस निर्भया के साथ हुए वीभात्सम बलात्कार के समय पूरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के निशाने पर थी.  उस समय मीडिया के तमाम वर्ग की हेडलाइन थी कि पूरी रात एक बस दिल्ली में घूमती रही एक लड़की को ले कर और किसी पुलिस वालें  पहले दिल्ली पुलिस के किसी एक ने भी उसको रोकने की जहमत नहीं उठाई , उस समय दिल्ली पुलिस पर नकारा , सुस्त , अपराधपरस्ती , बलात्कार समर्थक , नारी विरोधी होने के आरोप हर तरफ से लगे थे जिसको आज भी पीछे जा कर गूगल में सर्च किया जा सकता है .

उस समय इन हेडलाइन को पढ़ कर सोशल मीडिया पर आज भी देखे जा सकने वाले कमेन्ट में उत्साहियो द्वारा पढ़ा जा सकता है कि नारी सुरक्षा सर्वोच्च है, उस समय जनता का कथन था कि कुछ भी कर के निर्भया को बचाना था भले ही दरिंदो के साथ कितनी भी कड़ाई से पेश आना था .. कईयों को तो आज तक मलाल है निर्भया के अंतिम बलात्कारी के अपनी उम्र को आधार बना कर बच निकलने का.. कहना गलत नहीं होगा कि मोदी और योगी सरकार को पिछले कुछ समय से SC ST , डीजल पेट्रोल , किसानो के बाद अगर विपक्ष द्वारा किसी मुद्दे पर घेरा गया है तो वो है नारी सुरक्षा .. इसको किसी भी हाल में रोकने के लिए कड़े आदेश जारी किये गये थे .

फिर थोडा समय बीता.  इलाहाबाद पुलिस का एक सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह जो कभी नारी बारी पुलिस चौकी का इंचार्ज हुआ करता था उस पर कचेहरी में प्राणघातक हमला हुआ था जिसमे उसकी जान तक जाने का अंदेशा था . हमला करने वाले का नाम नबी अहमद था जो कम से कम आधा दर्जन मुकदमों में नामजद था . कहा जाता है कि अपनी जान बचाने के लिए सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह ने गोली चला दी थी जिसमे हमलावर नबी अहमद मौके पर ही मारा गया था . इस पूरी घटना का वीडियो भी जनता में वायरल हुआ है जिसमे नबी अहमद को सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह की पिटाई करते हुए देखा जा सकता है .

इसी मामले में आगे रोल आता है इलाहाबाद परिक्षेत्र की पुलिस का जिसने अपने ही विभाग के सब इंस्पेक्टर को सलाखों के पीछे भेजने के लिए दिन रात एक कर दिया और आत्मरक्षा करने वाले उस सब इंस्पेक्टर को हत्यारा घोषित करवा कर ऐसी धाराएँ ऐसी विवेचना कर के लगा दी कि तीन साल से उसको पल भर की भी जमानत नही मिली और न ही कोई आगे आशा दिख रही है क्योंकि मुकदमे बाजी अदि के चलते उसका परिवार आर्थिक रूप से तबाह हो गया और उसकी तीन बच्चे अपनी माँ के साथ सडक पर आने की कगार पर आ गये.. पति के जीते जी भी विधवा जैसी हो चुकी उस सब इस्पेक्टर की पत्नी ने अपने पति की रक्षा के लिए ऐसी कोई चौखट नहीं थी जहाँ मत्था नहीं टेका लेकिन इसी इलाहाबाद की पुलिस के तमाम बहादुर अधिकारी सीना ठोंक कर बहादुरी दिखाते रहे कि उन्होंने अपने ही विभाग के एक सब इंस्पेक्टर पर ऐसी कार्यवाही की है कि उसको अंतिम सांस तक जेल काटना है. इस पूरी घटना के वीडियों भी हैं जिसमे एक अकेले सब इंस्पेक्टर को कई लोगों से अपनी जान बचाने के लिए जूझते देखा जा सकता है लेकिन वो पुलिस वाला है इसलिए उसके साथ हो रहे अत्याचार के वीडियो का भी शायद कोई महत्व नहीं.

इसी क्रम में अब एक नया मामला सामने आया.. यहाँ पर दो पुलिस वाले आधी रात से भी ज्यादा समय के बाद एक लक्जरी कार देखते हैं . उसमे एक महिला और एक पुरुष दिखे जो उन्हें पति पत्नी भी नहीं लगे . शीशे हर तरफ से बंद थे और उसके पिछली सीट पर कौन है कौन नहीं ये साफ़ नहीं हो पा रहा था . दिल्ली की निर्भया का मामला और दिल्ली पुलिस की हुई फजीहत उनके दिमाग में जरूर गूंजी होगी.. वैसे इतनी रात को एक कार के अन्दर तक झाँक लेना पुलिस की गलती नहीं सक्रियता मानी जायेगी . उस कार का पीछा हुआ और उसको रुकने का इशारा हुआ .. लेकिन कार नहीं रुकी , पुलिस को देख कर दोनों के चेहरे पर थोड़े हडबडाहट के भाव आये और वो अपनी कार को बेतरतीब हो कर चलाने लगे..  जिस से पुलिस को और शक होने लगा .. पुलिस ही नहीं शायद कोई भी होता उसको शक होता और वो जानने की कोशिश करता कि क्या चल रहा है वहां .

अगर वही कार वहां से साफ़ निकल गयी होती और उसके कोई बड़ी घटना घटी होती तो आज दोनों सिपाहियों का लगभग वही हाल हो रहा होता जो अभी हो रहा है . हाँ तब उनके नाम में हत्यारे के बजाय निकम्मे , नकारा , सुस्त , ठुल्ले , घूसखोर जैसे उपनाम जुड़ रहे होते .. फिलहाल कार का पीछा हुआ और बार बार उसको रुकने का इशारा होता रहा लेकिन कार नहीं रुकी .. अपने आप अंदाज़ा लगाईये कि उस समय कोई भी होता तो क्या सोच रहा होगा .. यहाँ इसके बाद विवेक की मौत की खबर आती है . गोली सर के पास लगी जिसको कम से कम कानून के अनुसार सही नहीं ठहराया जा सकता है . विवेक के परिवार वालों के रुदन और उनकी पीड़ा ने निश्चित तौर पर जनता को विदीर्ष कर दिया है और रोष पुलिस वालों के खिलाफ जनता में साफ देखा जा सकता है .

इसके बाद क्या हुआ ये सिर्फ और सिर्फ एक लड़की जिसका नाम सना बताया जा रहा है उसके बयान पर आधारित है . उस लड़की के बयान को सबसे ज्यादा सटीक और प्रमाणिक मान लिया गया जिसके आधार पर ही ये पता चला कि बाद में पुलिस वालों ने कार चला रहे व्यक्ति को गोली मार दी और वही बयान उन पुलिस वालों के लिए 302 की धारा का दोष तय कर गया .. सना का बयान सुनने के लिए कम से कम 100 कैमरे , 200 माइक दिखने लगे लेकिन वही सिपाही प्रवीन की पत्नी चीख चीख कर कह रही है कि कोई उसकी एक बात सुन ले लेकिन कैमरे माइक तो दूर उसके खुद के अधिकारियों ने उसको डांट कर खामोश करने की कोशिश की . यहाँ ये ध्यान रखना बहुत ज्यादा जरूरी है कि संसद पर हमला करने वाले दुर्दांत आतंकी अफजल गुरु के बेटे की मार्कशीट में कितने नम्बर आये वो कुछ दिन पहले इसी माइक और कैमरे की मुख्य हेडलाइन थी .. लेकिन सिपाही की पत्नी की आवाज उनके लिए मायने नहीं रखती है .

आनन फानन में फैसला कर दिया गया कि पुलिस वालों की ही गलती है जबकि सिपाहियों का बार बार कहना है कि उन्होंने आत्मरक्षार्थ ऐसा किया, यद्दपि उनकी आवाज उनके गले के अन्दर ही दम तोड़ गयी. . बटला हाऊस के आतंकियों के लिए इस देश में आज तक प्रदर्शन होते हैं और उन्हें निर्दोष बताया जाता है जबकि उन्हें भारत की सभी एजेंसियों ने आतंकी माना है . इतना ही नहीं अफजल गुरु को सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक ने दोषी मान लिया फिर भी उसके लिए कई जगहों पर प्रदर्शन होते हैं और उसकी बरसी पर बाज़ार बंद कर के अफजल हम शर्मिंदा हैं के नारे लगाए जाते है जिस पर किसी भी तथाकथित बुद्धिजीवी का एक भी बयान नहीं आता .. लेकिन यहाँ मुकदमा दर्ज होने से पहले ही बिना किसी जांच या पुलिसिया बयान के ही “हत्यारी पुलिस’ हत्यारे सिपाही जैसे हेडलाइन आने लगे जिस पर खुद पुलिस के बड़े अधिकारी ही हामी भरते दिखे .. किसी एक में भी साहस नहीं हुआ कि उन शब्दों को तब तक रोक सके जब तक कम से कम अदालत न सही जांच अधिकारी की जाँच रिपोर्ट सामने न आ जाय .

ये सच है कि किसी की भी मौत गलत है , पीड़ित परिवार विवेक के साथ सिर्फ मीडिया और राजनेताओं की ही नहीं बल्कि खुद पुलिस वालों की हमदर्दी है लेकिन जिस प्रकार से एकतरफा खबरें चलने लगी और “हत्यारी पुलिस” जैसे शब्द उन पुलिस वालों के मनोबल को जरूर तार तार कर रहे होंगे जो अपनी जान हथेली पर रख कर समाज की रक्षा के लिए खड़े रहते हैं . इतना ही नहीं , ये शब्द सब इंस्पेक्टर जे पी सिंह , सिपाही अंकित तोमर जैसे वीर बलिदानियों की आत्मा तक को कचोट गये होंगे जिन्होंने अपने जीवन को इस समाज के लिए समर्पित कर दिया.. आतंकियों की बारी आने पर सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक के फैसले तक इंतजार करने वालो ने अचानक ही सिपाहियों को जांच अधिकारी की रिपोर्ट आने से पहले ही दोषी ठहरा दिया जिसको उनके ही अधिकारी हां में हाँ मिलाते नजर आ रहे..

पुलिस की नौकरी बचपन में किसी बालक को सबसे ज्यादा आकर्षित करती है . वो सोचता है कि बड़ा हो कर वर्दी पहनेगा और अपराधियों को पस्त कर देगा . इतनी पवित्र भावना में उसको जरा सा भी एहसास नहीं होता कि ऊपर उसका कोई अधिकारी होता है और बीच में एक राजनेता जो कई बार पुलिस का उपयोग अपने स्वार्थ और वोट बैंक की फसल को उपजाऊ बनाने के लिए करता है .. पुलिस का सही काम भी गलत किस हिसाब से बनाना है उस राजनेता को बेहतर ढंग से पता होता है और जनता भी अक्सर वही समझती है जो उसको समझा दिया.. अंत में सिर्फ इतना कि –  दिवंगत आत्मा को ईश्वर शांति दे और दोनों सिपाहियों को न्याय मिले. लेकिन इतना तो तय है कि उत्तर प्रदेश पुलिस में नया सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र सिंह तैयार हो चुका है जिसको इस हालत में लाने वाले कोई और नहीं… इस सिपाही का भी अंजाम सबको पता है , ठीक शैलेन्द्र सिंह का जहाँ ३ साल से उसकी निरपराध बेटियों को हर गुजरते वर्दी वाले में यही लगता है कि-  :पापा आ रहे हैं” ..

 

#उपरोक्त विचार लेखक के स्वतंत्र विचार हैं

 

राहुल पाण्डेय

सहायक सम्पादक – सुदर्शन न्यूज

मोबाइल – 9598805228

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