जय किसान से जय कसाई तक – भारत की राजनीति

भारत की इस से बड़ी विडम्बना क्या होगी कि जय जवान – जय किसान का नारा लगा कर कभी सत्ता के सारे सुख लेने वाले लोग अब जय कसाई के नारे लगा रहे हैं .

जिस समय जंतर मंतर पर तमिलनाडु से आया भूख और रोता किसान अपनी उधड़ी खाल दिखा रहा है ठीक उसी समय किसी एक के मुह से उनके लिए एक शब्द न निकलना और अवैध कत्लखानों के क़त्ल के कारोबारियों के साथ धरना प्रदर्शन और बन्द इत्यादि में हिस्सा लेना भारत के गौरवमयी अतीत के साथ मात्र एक खिलवाड़ है.

अपनी सालों से बर्बाद हुई फसलों पर खून के आंसू बहाते किसानों को अनदेखा कर के खून बहाते कसाइयों के साथ खड़े वही लोग हैं जो आये दिन सरकार पर किसान विरोधी होने आदि का आरोप लगा कर अपने वोटबैंक की रोटी सेंकते हैं . जिन किसानों का सालों से कर्ज का बोझ उन्हें प्राण त्यागने पर मजबूर कर रहा है उनका साथ छोड़ कर मात्र 1 हफ्ते से तालाबंदी का रोना रो रहे अवैध मीट कारोबारियों के साथ कुछ लोगों का खड़ा होना संवेदनहीनता का पराकाष्टा ही माना जाएगा .

एक रचनात्मक राजनीति भले ही वो सत्ता पक्ष की हो या विपक्ष की वही हो सकती है जिसमे प्राथमिकता तय हो . प्राथमिकता का अर्थ है कि किस के साथ खड़ा होना है – ?

अपना पसीना बहा कर लोगों का पेट भर रहे किसानों के साथ खड़े होने की या खून बहा कर जान ले रहे लोगों का पक्ष लेने की ?

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